खुसरो मेरी समझ में :

सात सौ साल पहले एक आदमी भारत की सरज़मी पर हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच जिस भाषा,कविता,संगीत के उभरते तस्वीर में अपने रंगो से उसमे जान डाल रहा था, उस बुनियाद को आज सात सौ साल बाद उनके संगीत,साहित्य के उपलब्द्ध सामग्री के माध्यम से उन्हें कहाँ तक समझ पाया यह विचारणीय है। 
यह महज इत्तफ़ाक़ है या फिर सोचा समझा प्रयास कि आज ही के दिन अर्थात जिस दिन गांधी की हत्या हुई थी खुसरो के ऊपर मुझे कुछ कहने का अवसर आप लोगों के बीच मिला |
गांधी जिस भारत के तस्वीर की आस लिए हमसे जुदा हुए ,वह आज तक घटित नहीं हुआ और खुसरो जिस हिंदुस्तान की तारीफ़ एक तुर्क हिन्दुस्तानी की हैसियत से कर गयें,उसे केवल खुसरो जैसा दिल अगर हमारा कभी हो पाया तो समझ सकेगा। 
एक आठ साल के बच्चे को क्या कारण था कि अपना पैतृक निवास छोड़ना पड़ा;पिता की मृत्यु से उत्पन्न केवल रोजी-रोटी का जुगाड़ ही कारण नहीं रहा होगा। बहुत से असामाजिक तथ्य रहे होगें जिससे मजबूर हो कर खुसरो अपनी माँ के साथ अपने नाना के घर दिल्ली चले आयें होंगे |एक आम बालक के लिए यह कोई महत्व की बात नहीं हो सकती पर खुसरो जैसे बालक के मन में अपने पटियाली गाँव की वह तस्वीर जहाँ उनका बचपन जिन बागीचों में खेलते,जिन गलियों में खाक छानते बीता उसे ऐसे ही नहीं छोड़ दिया होगा,छुड़ाया गया होगा।पता नहीं वह अपने गाँव कभी वापस लौट कर गए या नहीं पर मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि उस तड़प से हम लोंगो को बहुत सारे ऐसे गीत मिल पाएं जिनको हम गाते नहीं अघाते। उसमे से एक गीत तो हमेशा ही जुबां पर शहद की तरह लिपटा रहता है-:

काहे को ब्याहे बिदेश 
अरे लखिय बाबुल मोरे 

हम तो बाबुल तोरे 
खूँटे की गैया 
जित हाँके हंक जैहे 
अरे लखिय बाबुल मोरे। …… 

खुसरो 22 -23  वर्ष के ही थें तभी उनके नाना का 651 हि. में इंतकाल हो गया। यहीं से जो उनके नौकरी का सिलसिला अलाउद्दीन किशलू उर्फ़ मलिक छज्जू के रहमो-करम से शुरू हुआ वह अंत तक तमाम सल्तनतों के उतार-चढ़ाव को देखता "बल्ख" में तमाम कैदियों के जेल की हवा छानता और फिर बाहर निकल कर नए-नए सुल्तानों की ख़ुशामदीद करता अंत तक 73 साल के आस-पास अपने गुरु के बिछड़ने की याद में ख़त्म हुआ। 
अमीर खुसरो के पिता तुर्क और माता हिन्दुस्तानी नस्ल से थी। उनके नाना इमादुलमुल्क न सिर्फ हिन्दुस्तानी थे बल्कि गोरे रंग के भी न थे। तत्कालीन भारतीय समाज में मुसलमानों को जिस रूप में हिन्दुस्तानी देखते थें और उसमे भी वह परिवार जहाँ पर धर्म-परिवर्तन जैसी चीज हुई हो,इसको किस नजरिये से देखा जाता रहा होगा यह हम आज अंदर से महसूस कर सकते हैं। यह नजरिया केवल हिन्दुस्तानियों का ही था ऐसा नहीं कहा जा सकता। मुसलमानों में भी असल नस्ल के बन्दे को ही तरजीह दिया जाता था।वही लोंग सल्तनतों के ऊचे-ऊचे पदों पर कायम रहा करते थे यह बात इतिहास में छिपी नहीं है।पर इसके बावजूद उसी हिंदुस्तान में 
ऐसे भी लोंग मेरे ख्याल से बहुतायत में थे जिनके लिए हमेशा मानवता महत्वपूर्ण रही है,कला महत्वपूर्ण रहा है।इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सूफी मत जिस श्रद्धा के साथ तुर्क सत्ता से भी पहले भारत की धरती पर शान्ति के साथ अपनी आध्यात्मिकता की साधना कर रहा था उसे हिंदुस्तान की असल रूह पहचानने का मौका तो मिला ही साथ ही साथ उनके इस  विश्वास  की जड़े और गहरी हो गयीजिंसमे कहा जाता है कि मानवता से बड़ा किसी और विचारधारा का कोई मोल नहीं हो सकता।जब-जब ऐसा कोई समय आया जिसमे मानवता शर्मसार होती नजर आ रही थी तो इन फकीरों ने अपने कर्ज-अदायगी के साथ अपने विरोध को बड़े वजन के साथ रखा है। इसका एक उदहारण खुसरो के ही गुरु औलिया के रूप में देखा जा सकता है |इतिहास में ऐसे तथ्य प्राप्त हैं जिसमे बताया गया है कि, औलिया तत्कालीन सुलतान के बात की भी अवहेलना कर दिया करते थे अगर वह वाजिब न ठहरती हो। 
खुसरो के लिए अपनी बिरादरी जो कि असल में पूरी तरह उनकी नहीं थी तथा हिंदुओं के बीच ताल-मेल बिठा कर चल पाना बड़ा मुश्किल रहा होगा। 693 हि. में खुसरो की उम्र तैतालीस के आस-पास थी उस वक्त उनका जो दीवान संकलित हुआ वह कुछ मायनों में बड़ा महत्वपूर्ण है। उसमे एक जगह उन्होंने बड़ा जोर दे कर कहा है कि :
तुर्क-ए हिंदुस्तनेम मन हिन्दवी गोयम चु आब 
शक्कर-ए-मिसरी न दारम क़ज़ अरब गोयम सुखन।।

"मैं हिंदुस्तान में जन्मा तुर्क हूँ। मैं हिन्दवी धारा प्रवाह बोल सकता हूँ। मेरे पास अरबी की मिठास नहीं है कि उसमे बात-चीत करूँ। 
उपरोक्त कथन में दो महत्वपूर्ण तथ्य हैं जिस पर मैं आप का ध्यान आकर्षित कराना चाहता हूँ। पहला- यह कथन हिंदुस्तान के लिए नहीं कहा गया है और दूसरा- खुसरो जिस हिन्दवी की बात धारा प्रवाह के रूप में कर रहे हैं वह उस वक्त लोक में जिसमे की खुसरो भी शामिल हैंपूरी तरह से बोली जा रही थी। 
संस्कृत,अरबी,तुर्की ,पारसी के अतिरिक्त तत्कालीन बहुसंख्यक आवाम जिस भाषा में बात-चीत कर रही थी वह उसी लोक से अपने आप जन्मी वह भाषा थी जिसमे प्रयोग के साथ-साथ बहुत सारे शब्दों का आना अभी बाकी था। खुसरो का काव्य केवल मौलवी और सुल्तानो के ख़ुशामदीद का ही काव्य नहीं माना जाना चाहिए। उनका काव्य ज्यादातर आम जनता के मनोभावों से प्रेणना लेता जीवन के गहराइयों को समझने-समझाने का काव्य माना जाना चाहिए। अपने साहित्य को खुसरो को गढ़ने में जिन शब्दों के प्रयोग किया वह उनकी अपनी निजी प्रतिभा थी|उन्होंने लोक से अपनी तमाम भाषाओं की जानकारी की सहायता लेते हुए उसे पूरा किया,इससे जो काव्य उभर कर आम जनता और सुल्तानो के सामने आया वह अद्भुत था। 
मेरी समझ से खुसरो इस मायने में पहले प्रयोगकर्ता दिखते हैं जिनके माध्यम से काव्य चलती भाषा के समानांतर खड़ा हो पाया। इस प्रयोग से यह नहीं माना जा सकता कि जिस भाषा का प्रयोग आज हम बात-चीत के रूप में कर रहे हैं ,उसका इजाद खुसरो ने किया। हाँ काव्य भाषा की तरह इतने नजदीक और सहज भी हो सकता है यह हमें खुसरो ने ही सिखाया। 
भाषा के साथ-साथ खुसरो को संगीत के क्षेत्र में भी बहुत महत्व दिया जाता है। दिया जाना भी चाहिए परन्तु बिना तथ्यों की ऐतिहासिकता परखे "परमवाक्य" के रूप में कोई भी बात ऐसी नहीं चलायी जानी चाहिए खासकर अगर वह किसी विशिष्ट पुरुष के विषय में होइतिहास के विषय में होधरोहरों के विषय में हो।खुसरो निश्चित रूप से संगीत के महान साधक थें और उन्होंने संगीत को जो दिशा दिया उसके लिए स्वयं भारत ही नहीं विश्व के तमाम देश ऋणी हैं। परन्तु वह क्या दिशा थी जिसके लिए खुसरो को याद किया जाना चाहिए ? तथा वह कौन सा परमवाक्य है जिस पर प्रश्नचिन्ह लगाया जाना चाहिए ?
दिशा पर तो मैं बाद में आउंगा पर परमवाक्य से ही अपनी बात आप के सामने रखता हूँ।
ऐसा नहीं है कि मुझसे पहले इस पर प्रश्न चिन्ह नहीं खड़ा किया गया पर फिर भी बहुतायत में संगीत विद्यार्थी और खुसरो के विषय में पढ़ने-पढ़ाने वाले लोगों के बीच यह "परमवाक्य "  "प्रमाणसूत्र " के रूप में स्वीकार कर लिया गया है कि खुसरो सितारतराना गायनकौल ख्याल गायनऔर बहुत सारे रागों जैसे राग-  मुजीर,साजगिरीऐमनसरपर्दा,फरगाना इत्यादि के आविष्कर्ता हैं।इसके अतिरिक्त कुछ ताल के ऐसे प्रकार भी हैं जिनको खुसरो द्वारा इजाद बताया जाता है। इन किंवदंतियों तथा सन्दर्भों को सरकारी स्तर पर बहुत पहले ही प्रमाणित क्र दिया गया है| आई.ए.एस.,पी.सी.एस. आदि अनेक इम्तहानों में लगातार खुसरो के ऊपर बनाये जा रहे प्रश्न और उनके उत्तर जो की विद्यार्थियों द्वारा रटें जा रहें हैं उसकी जांच-परख करे तो समझा जा सकता है 


 
मैं इन तमाम शास्त्रीयता के बारीक रास्तों में न जा कर मोटे स्तर पर अपनी बात रखना चाहूंगा। जैसा कि आप सब को यह विदित ही होगा कि मौजूदा इतिहासकारों ने सबसे बड़े प्रमाण के रूप में जो बात चलाई वह खुसरो के लिखे स्वयं के ग्रन्थ है।  इतिहासकारों ने बार-बार यह बात दोहराया है कि खुसरों कहीं भी अपने ग्रन्थ में इन सब गान विधाओं और वाद्य यंत्रो के आविष्कर्ता के रूप में अपने आप को स्थापित नहीं करते लिहाजा उनको इसका आविष्कर्ता नहीं माना जाना चाहिए। अपनी बात को और आगे बढ़ाते हुए इन इतिहासकारों का कहना है कि अबुल फजल की  "आइने अकबरी" जिसका प्रकाशन सन 1601 में हुआ उसमे इन तमाम ईजादों को  खुसरो के माथे मढ़ दिया। इसी श्रृंखला में 300 साल बाद फकीरउल्ला सैफ अली खां का "राग दर्पण"
ने तो इस तथ्य को अपने किताब के माध्यम से बाकायदे जनता और इतिहासकारों के बीच प्रतिष्ठित कर दिया और यह जो सिलसिला आगे बढ़ा वह रोकने से नहीं रुक रहा।
मेरी समझ से इस स्थापित दृस्टि ने जो सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाया वह है हम लोंगो का  खुसरो के प्रति एक छिद्रानुवेशी दृस्टि अख्तियार कर लेना। खुसरो की संगीत यात्रा तथा उनके उन समस्त योगदानो को इस दृष्टि से कभी परखा नहीं जा सकता। यह बड़े दुख के साथ मुझे कहना पड़ रहा है कि संगीत और साहित्य के बहुसंख्यक विद्वान इसी दृष्टि को अपना कर खुसरो की समीक्षा करते हैं। खुसरो को जिस ख्याल ,राग एवं ताल के विषय में आविष्कर्ता के रूप में देखा और नहीं भी देखा जाता है वह इसी दृष्टि के दोष का परिणाम है। 
सबसे मुख्य बात तो यह है कि जिस ख्याल,तराना और विभिन्न वाद्ययंत्रों को हम खुसरो के साहित्य में अपने जरुरत के अनुसार खोज लेना चाहते हैं वह कभी भी खुसरो के लिए महत्व की बात नहीं रही है। उनकी सम्पूर्ण दृष्टि ही अनेक बिखरावों जिसमे कि प्राचीन शास्त्रों के विलुप्त होते उन तमाम आधारों को लोक में स्वतः परिस्थितियों से उपजे नए विधाओं से जोड़ने के साथ रहा है।आचार्य बृहस्पति द्वारा भरत की श्रुति सारणा का2000 साल बाद प्रमाण सहित उदघाटन और उद्घोषणा इन तमाम अटकलों पर एक नया प्रश्नचिन्ह लगा गया जिसमे यह साफ़ तौर पर माना गया की भारतीयों अर्थात भरत की मूर्छनाओं से उत्पन्न स्वर जो कि उस समय प्रयोग में लाया जाता था वह आज का स्वर नहीं है और यह परिवर्तन छठवी-सातवी शताब्दी के आस पास से शुरू हो गया था। अगर इस तथ्य को मान लिया जय तो खुसरो के समय तक आते-आते जिन विधाओं के प्रयोग में रागों का गान किया जाता रहा होगा वह कैसा होगा यह एक शोध का विषय है।खुसरो के समय में ध्रुपद गान विधा अपने चरमोत्कर्ष पर था इस विधा की बुनियाद ही पदों के गान के रूप में प्रतिष्ठित थी। ऐसा नहीं है कि इस विधा में ख्याल जैसी आलापचारी,और गान में प्रयुक्त तमाम विकल्प न थे पर क्यों कि पदों का महत्व इसमें ज्यादे था अतः सामान्य जनता के साथ-साथ राजदरबारों में भी इससे हट कर एक अलग प्रकार का गायन-वादन चलाया जा रहा था जिसमे संस्कृत के पदों के इतर लोक भाषा,विदेशी भाषा और तमाम नए सांगीतिक स्वर-विकल्पों का प्रयोग किया जा रहा था। खुसरो इस प्रयोग के महान द्रष्टा के रूप में देखे जा सकते हैं क्यों कि खुसरो अपने समय के एक ऐसे विलक्षण प्रतिभाशाली व्यक्ति थे जिनके पास तमाम भाषाओं की जानकारी के साथ-साथ संगीत के हिन्दुस्तानी और ईरानी तकनीक का बहुत गहरा इल्म था। साथ-साथ उनके पास अपनी बात रखने के लिए जो सुल्तानो के बीच दरबारों का मंच प्राप्त था वह अपने आप में काफी महत्व रखता था। खुसरो इस बात को बहुत गहराई से समझते थे कि यह जो गान विधा इस समय हिंदुस्तान में गाया-बजाया जा रहा है वह महज पदों की गायकी न हो कर स्वरों के एक अद्भुत प्रयोग की गायकी विकसित हो रही है जिसमे स्वरों के ख़ास बर्ताव का एक सिद्धांत हैसाथ ही साथ  बहुत सारे प्रयोग की गुंजाइश अभी इसमें शेष  बची रह गयी है।इस प्रवाह में खुसरो ने भी अपने प्रयोगों की आजमाइश लोक संगीत से ले कर ईरानी संगीत के मेल -मिलाप से की जिसके फलस्वरूप बहुत सारे रागों के स्वरुप में परिवर्तन आया। यह लोक से खुदबखुद उत्पन्न वह शैली कही जा सकती है जिसे आज हम " फ्यूज़न " संगीत के थोड़े बदले रूप में देखते है।इस दृष्टि से यह प्रश्न उठाना ही अपने आप में बेबुनियाद है कि राग और ख्याल गान का आविष्कर्ता कौन है और बाकी सभी तत्व जिनके विषय में खुसरो को आविष्कर्ता के रूप में कहा गया है कमोबेश इसी के आसपास समझा जा सकता है। भाषा के ही समानांतर संगीत का भी विकास होता है। यह एक दुसरे पर अनिवार्यतः प्रभाव डालते है।इस प्रभाव से प्रार्थना ,विचार ,दृष्टि सभी कुछ प्रभावित होते हैं ।तराना गायन इसी परिवर्तन के फलस्वरुप सीधे सीधे संगीत और प्रार्थना से निकला एक बाय-प्रोडक्ट है जिसको खुसरो ने एक विशेष गति प्रदान की। इतिहासकारो में ख़ासकर ठाकुर जयदेव सिंह ने तराना गायन के परिपेक्ष में वेदों के स्तोभाक्षरों का वर्णन किया है। मैं इसमें एक और बात जोड़कर अपनी बात को विराम देना चाहता हुँ कि दुनिया के तमाम प्रार्थनाओ को गाते-गाते सिर्फ गूंज और लय के सहारे ध्यान में उतर जाने की बड़ी पुरानी परंपरा रही है।तंत्र ने इस प्रयोग को काफी तर्ज़ीह दी है।वेदों में जो स्तोभक्षर थे वह शब्द और लय की एक विशेष मानसिक मुद्रा प्रकट करते थे जिसका प्रयोग तंत्र में आगे चल कर विभिन्न मुद्राओ के विकास में देखा जा सकता है।  
       सूफी संत लोग अल्लाह के प्रेम में गाते गाते जिस तल्लीनता के पराकाष्ठा पर पहुंचते  हैं  वहाँ शब्द या फिर भाषा का कोई महत्व नहीं रह  जाता। खुसरो जिस तराना को गा रहे थे वह वही विशेष मुद्रा थी जिसका साक्षात्कार हर पंहुचा हुआ संत करता है। हम क्योंकि खुसरो नहीं है इसीलिए आज भी उसके आविष्कर्ता,शब्द और विधा के पीछे तर्क पे तर्क गढ़े जा रहे है।खुसरो का काव्य और संगीत इस मायने में आविष्कर्ता के रूप से कही ऊपर स्थापित है जिसकी खोज करना अभी बाकी है। आज के समय में खुसरो को याद करना काफी महत्वपूर्ण शायद इसलिए भी हो गया है क्यों कि ये जो बदहवासी और इंसानियत के बीच कट्टरवादिता तथा गैर बराबरी का फर्क लगातार बढ़ाया जा रहा है उसको मिटाने के लिए खुसरो का संगीत और काव्य काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। 


(अप्रमेय )

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