वसुंधरा जी के बहाने से

कबीर ने जिस धरातल पर “उड़ जाएगा हंस अकेला” को अनुभूत कर पदध्वनित किया उसे इधर छह-  सात सौ वर्षों तक लोक ने अपने प्रयोगों में, मुहावरों में कहते-सुनते, गाते-बजाते आया | कंठ-कंठ तक हनुमान चालीसा की तर्ज पर अगर किसी ने इस गीत को पहुँचाया तो वह कुमार गंधर्व ही थे | कुमार जी ने वैसे कबीर के जितने भी पद उठाएँ उसे आसमान में पहुँचा दिया | “निर्भय निर्गुण गुनी रे” से लेकर “कौन ठगवा नगरिया लूटल हो” आदि अनेक निर्गुन आज गायकी में मील के पत्थर हैं | अस्तित्व की यह अद्भुत विडंबना है कि जो वस्तु अंततः छूट ही जाती है उसी को पाने के लिए मनुष्य अत्यधिक आतुर रहता है | शास्त्रों ने इसी को मोह कहा है | दुनिया की जो शक्ल इस समय दिखाई पड़ रही है उससे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यक्ति अपने आस-पास की पड़ी चीज़ों के अतिरिक्त कुटुंब, गाँव, देश,संसार सब कुछ ही लेकर उड़ जाना चाहता है | अभी हाल में ही कुमार जी की पत्नी भानुमती जी का देहावसान संगीत जगत को निराश कर गया | एक ख़ास तरह की सधुकड़ी गायकी के प्रतिमान कुमार जी ने जो गढ़ा था उसकी सबसे निकट हिस्सेदार हम सभी को बहुत कुछ देकर उड़ चला | यों तो कुमार जी के पुत्र-पुत्री, पौत्र तथा शिष्यों का एक बड़ा समूह इस गायकी को अपने कंठ से लगाए आगे बढ़ा रहा है; पर जो दो हंसों के जोड़े में एक शेष रह गया था वह भी जीवन के तरुवर से उड़ चला | कुमार जी ने अपनी गायकी से ,रागों को प्रस्तुत करने का अपना अंदाज से तथा शास्त्रों के लौकिक प्रयोग से शास्त्रीय संगीत जगत में जो वितान खड़ा किया वह गौतम बुद्ध के आप्त वचन “अप्प दीपो भवः” के काफ़ी नजदीक है | अभी हाल में मुझे पता चला कि “अप्प दीपो भवः” का सामान्यतया जो अर्थ अपने को प्रकाशित करने का समझा-बूझा जाता रहा है वह पूर्णतया बुद्ध के दर्शन और उनके कहे के आशय को प्रकट नहीं करता | पाली भाषा के कुछ तिब्बती पंडितों ने अपने शोध में यह तथ्य सामने किया है कि “दीप” का अर्थ यहाँ दीया नहीं उस “द्वीप” से लिया जाना चाहिए जो समुद्र अथवा अस्तित्व में रहते, फलते-फूलते हुए भी अलग-थलग रहता है |” कालांतर में बौद्ध स्तूपों के निर्माण भी संभवतया इसी आशय को प्रकट करने के निहितार्थ बनाए गए थे, जो आज भी एक पहेली की तरह हैं | कुमार जी की गायकी शास्त्रीय पंडितों के बीच एक जमाने से उसी तरह अलग-थलग रही जिस तरह बुद्ध और कबीर अपने-अपने जीवन काल में रहें | इन सब के बावजूद उनके चाहने वालों में - पंडित जगत के खेमे से और लोक से भी कभी कमी न रही | 8 अप्रैल 1924 को जन्मे कुमार जी किशोरावस्था तक पहुँचते-पहुँचते काफ़ी चर्चित हो चुके थे | कुमार जी की पहली पत्नी (भानुमती ) के निधन के बाद वसुंधरा कोमकली ने कुमार जी का हाथ थामा | अपने किन्ही संस्मरण में उन्होंने कहा है कि कुमार जी को उन्होंने पहली बार कलकत्ते के किसी कार्यक्रम में सुना था | 21 मई 1931 को कोलकाता में जन्मी वसुंधरा जी ने संगीत की शिक्षा अपने पिता प्रो.बी.आर.देवधर से ग्रहण की पर जिस गायकी को उन्होंने अपने गले लगाया वह कुमार जी का ही अंदाज था | संगीत की भाषा में अगर कहूँ तो सुर लगाने की जो विशेष पद्धति वसुंधरा जी ने अपनाई वह देवासी अर्थात कुमार जी की पद्धति थी |दशकों तक वसुंधरा जी ने कुमार जी के साथ गायन में संगत की और यह संगत इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है क्योंकि जिस समय कुमार जी अपने गायकी में प्रयोग कर रहे थे ठीक उसी समय बड़े स्तर पर शास्त्रज्ञों का एक समूह उनकी गायकी पर प्रश्नचिन्ह भी खड़ा कर रहे थे | वसुंधरा जी का साथ निभाना उनकी गायकी का आधार बना | यह संयोग की ही बात है कि कुमार जी के ही काल में देश के दो और बड़े दिग्गज गायकों के पांडित्य और प्रतिभा का डंका अपने परम शिखर पर था | उम्र में तेरह-चौदह वर्ष बड़े उस्ताद अमीर खां अपनी धीर-गंभीर आवाज और आलाप से जिस गायकी के प्रतिमान को गढ़ चुके थे उसके ठीक उलटे कुमार जी अपने गायन का ताना-बाना बुन रहे थे | दोनों को ही नहीं पता था कि उनकी गायकी आधुनिक युग में एक घराने की शक्ल अख्तियार कर लेगी | इसके अतिरिक्त पंडित भीमसेन जोशी ( जन्म 4 फरवरी, 1922 ) जिस समृद्ध परंपरा की गायकी का निर्वहन कर रहे थे वह किराना घराने की स्थापित, वजनदार तथा लोक स्वीकृत गायकी थी | यह कहना अतिशियोक्ति न होगा कि वह काल संगीत जगत का स्वर्ण काल था | निखिल बनर्जी, रविशंकर, जैसे करीने कलाकारों के बीच अपनी अलग पहचान बनाना कोई सामान्य बात न थी | इसके अतिरिक्त 1944 के आस-पास विश्व के साथ-साथ भारत के इतिहास का भी फेरबदल का इतिहास रहा है | एक संवेदनशील व्यक्ति वह भी जो राग की संवेदना को पाने हेतु “अपने को हर राग के प्रदर्शन के बाद मृत घोषित करता है” { कुमार जी का वक्तव्य } उसके सामने दूसरे विश्वयुद्ध की विभीषिका का पूरा दारुण दृश्य था | 1931 से 1945 तक चलने वाला दूसरा विश्वयुद्ध जिसमें तकरीबन दस करोड़ सैनिकों ने हिस्सा लिया और चार से सात करोड़ लोगों की हत्या हुई ; वह कितना मर्माहत होगा इसका बोध उनकी गायकी के चरित्र को समझने में काफ़ी महत्त्वपूर्ण होगा | दूसरे विश्वयुद्ध के समय में भारत में अंग्रेजों का कब्ज़ा था| गुलाम भारत अंग्रेजी हुकूमत के अधीन था | फलस्वरूप भारत ने भी नाज़ी जर्मनी के विरुध्द युद्ध की घोषणा कर दी| ब्रिटिश राज में २० लाख से अधिक सैनिकों को युद्ध के लिए भेजा गया  | लाखों जाने गयीं 1940 से 47 तक अर्थात आज़ादी मिलने के ठीक पहले और बाद के भारत की दशा सर्वविदित ही है जिसके पेचोखम को उकेरना यहाँ लाज़मी न होगा |भारत की चोटिल,घायल,मर्माहत और किमकर्त्तव्यविमूढ़ मनोस्थिति से उपजे परिणाम मुक्त न होकर शंकाओं,वैमनस्य और चालाकियों से भरे हुए थे| हिन्दू-मुस्लिम लड़-कट-मर चुके थे| अपने देश और धर्म की हिस्सेदारी और झंडाबरदार होने की कवायद ने दोनों को ही एक दूसरे का दुश्मन बना दिया था | जो-जो आदमी के हाथों से संभव हो सका उसे हिन्दू मुसलमानों ने बाँट लिया| यह वह दौर था जब भाषा से संगीत तक और पशु-पक्षी से लेकर कीड़े-मकोड़े तक का बटवारा हुआ | लोक मानस जिन चीजों को भूल चुका था उसे नए सिरे से टटोला गया परिणामस्वरूप नकारात्मक दृष्टि के प्रभाव ने बड़ी तीव्रता से देश को जकड़ लिया | इतिहासकारों ने अमीर खुसरो से लेकर गोपाल नायक तक को आपस में लड़ाया और किसी प्रबुद्ध इतिहासकार ने अगर शोध दृष्टि से भी भारतीय संगीत की छान बीन की तो उसमें भी अपनी दृष्टि के अनुसार ही तथ्य ढूंढ निकाले | ख़याल गायकी के विकास के तार ढूंढें जाने लगे और संतों महात्माओं की भी राय को सम्मिलित किया जाने लगा | ध्रुपद, कीर्तन संगीत को ही गा रहे गवैयों को विशुद्ध भारतीय संगीतज्ञ होने का तमगा दिया गया| स्वामी विवेकानंद का दौर भी एक समय भारत में बड़ा महत्त्वपूर्ण समझा गया | विदेशों में हिंदुत्व का परचम लहराने के फलस्वरूप उनका वक्तव्य भारत में आप्त वचन की तरह लिया गया और तमाम विषयों के हस्तक्षेप की तरह संगीत विषय पर भी उन्होंने काफ़ी कुछ कहा-सुना जिसका खामियाजा भारतीय संगीत ने बहुत गहरे में आज तक अनुभूत कर पा रहा है | उन्होंने अपने एक वक्तव्य में कहा है कि “हमारा संगीत केवल कीर्तन और ध्रुवपद में ही शुद्ध रूप से जीवित है | शेष सब इस्लामी संगीत के अनुकरण से दूषित हो गया है | क्या आप सोचते हैं कि टप्पा को नाक में गाते हुए, बिजली के सामान एक सुर से दूसरे सुर पर दौड़ना कोई उत्कृष्ट संगीत है ? नहीं | जब तक प्रत्येक सुर हर एक स्तर पर पूरा गाया नहीं जाता उत्कृष्ट संगीत की उत्पत्ति नहीं हो सकती |” ......आगे कहते हैं “भारत में आ कर मुसलामानों ने यहाँ की राग-रागिनियों को अपनाया अवश्य पर टप्पा-गीतों पर उन्होंने इतनी गहरी छाप मारी कि यहाँ का संगीत ही नष्ट हो गया |”  इसी के समानांतर भारतीय संगीत के दो पुरोधा आचार्यद्वय भातखंडे ( जन्म-18/08/60 ) एवं विष्णु दिगंबर पलुस्कर ( जन्म-18/0872 ) भारत के जीर्ण-शीर्ण संगीत के पुनर-उद्धार में लगे हुए थे |
कुमार गन्धर्व
ऐतिहासिकता को समझने-बूझने की सबसे बड़ी तकलीफ उसका छिद्रानिवेशी होना है | विज्ञान बिना तोड़े चीज़ों को देख नहीं सकता, समझ नहीं सकता | यही उसकी शक्ति भी है और सीमा भी, पर जगत खंडों में तोड़ कर देखा ही नहीं जा सकता, कोई उपाय भी नहीं है | आचार्य बृहस्पति से लेकर ठाकुर जयदेव सिंह तक जिस इतिहास को पुनः लिखने-समझने का प्रयास में लगे थे उससे निश्चित ही संगीत जगत को अपार सफलता प्राप्त हुई, पर कहीं कोई चूक रह गई | भारतीय संगीत की ऊँचाइयों की जिन संभावनाओं की चर्चा से हमारा इतिहास भरा है उसी को पाने की ललक आज भी उसी तरह जस का तस पड़ी हुई है | बहुत सी विशेषताओं के बीच घराने की जिस विशेषता को लेकर हमारा संगीत आगे बढ़ा था कालान्तर में धीरे-धीरे हिंदू-मुसलमान की आंच उसे गरमाती रही | ध्रुवपद जिस गति से आगे बढ़ा मध्यकाल तक आते-आते उसके गति धीमी पड़ गई और खयाल गायकी जिसमे विस्तार की असीम संभावनाएं मौजूद हैं वह आज भी अपनी विशेष शैली को बचाए रख पाने की जद्दोजहद में किम्कर्तव्यविमूढ़ अवस्था में व्याकुल है | खैर इन सब के बावजूद और बीच इश्वर-अल्ला तेरो नाम के पुजारी ‘गाँधी जी’ को कुमार गन्धर्व ने अपना राग ‘गाँधी मल्हार’ निर्मित कर जो श्रधांजलि दी उससे उनके औघड़ गायकी तथा हिंदू-मुसल मानसिकता को समझा जा सकता है तथा भारतीय इतिहास को गौरवान्वित भी किया जा सकता है |

(अप्रमेय मिश्र )

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