आज-कल और संगीत

विश्व में  जितनी भी कलाएं है, वे मानवीय चेतना की अभिव्यक्तियाँ ही नहीं अपितु उनकी सुरुचि, संपन्नता, मधुरता और आत्मीयता को पूर्ण बनाने में विधायक और सहायक भी हैं। चेतना का धर्म है- पूर्णता की प्राप्ति। ठहरा हुआ जल भी पूर्ण होने के लिए बेचैन है, इसीलिए वह वाष्पीभूत होता है, मेघ बनता है, बरसता है और अपने अनंत स्रोत समुद्र में मिले बिना उसे चैन नहीं आता। पूर्ण से अपूर्ण, अपूर्ण से पुनः पूर्ण होने की यात्रा निरंतर सृष्टि में चल रही है। शास्त्रीय संगीत की विशेषता यह है कि वह हमारी बहिर्मुखी यात्रा को अंतर्मुखी बनाता है और प्रायः जो चेतना की अपेक्षाकृत अधिक बहिर्मुखता है, उसे अंतर्मुखता के सामानांतर संतुलित करता है।
कल्पना कीजिये की स्वांस केवल बाहर की तरफ जाय तो क्या स्वांस की सम्पूर्णता घटित होगी ? बाहर जाने में स्वांस की शक्ति उतनी ही गहन होती है जीतनी कि गहरे अंदर की तरफ जाती है, केवल स्वांसों का जाना जरुरी नहीं है, उससे ज्यादा या उतना ही आना अर्थात अंदर की तरफ जाना भी जरुरी है। जीवन में चेतना की पूर्णता उसी पर निर्भर है। पेड़ जितना बाहर फैलते हैं, आकाश में पनपते हैं, उतनी ही उनकी यात्रा जमीन के अंदर भी होती है। बड़े पेड़ो की जड़े पाताल तक होती हैं, यह मुहावरा उसी सत्य पर आधारित है।
आज के प्रचलित संगीत की विशेषता चेतना को बहिर्मुखी करने में ज्यादा प्रयत्नशील है। यह आमतौर पर हमारी इन्द्रियों को जागृत करने वाला, मन को उदीप्त करने वाला और अन्तःकरण को उद्दाम करने वाला संगीत है। प्रचलित संगीत का तात्पर्य विचार-शून्यता से है और जो इस संगीत को सुनने वाले लोंग बढ़ रहे हैं या फिर बनाये जा रहे हैं, उन्हें अशान्ति की तरफ धकेल देने से है। रियल्टी-शो स्ट्रीट-शो इत्यादि आदमी के सपनों को कैश कराने में लगा हुआ है। रातों-रात स्टार हो जाने का सपना आदमी को बेचैनी के सिवा और कुछ नहीं दे सकता। बेचैनी जब अपने शबाब पर होती है तब वहाँ जो विचार-शून्यता पैदा होती है वह हमारे यहाँ शास्त्रों में कहे गए विचार-शून्यता के बिलकुल विपरीत है। यह विचार केवल संगीत पर ही नहीं समस्त विधाओं पर लागू होता है। शास्त्रीय संगीत जितना बाहर ले जाता, हमारे मन, वाणी, और ऐंद्रिय जगत को उतना ही अंदर भी ले जाता है। रागों के भीतर जो तानें हैं, जो मोड़ है, जो अनेक तरह के मंद, मंथर, दीप्त, उदीप्त आयाम है, जितने तरह के, जितने कोणों से उनका विनियोग किया जाता है, उतना ही शास्त्रीय संगीत हमें अंदर की चेतना तक भी ले जाता है। हम कैवल्य का भी अनुभव श्रेष्ठ गवैयों के गायन-वादन से कर सकते हैं, यह शास्त्रीय संगीत की विशेषता है। प्रायः जो गीत शास्त्रीय ढंग से गाये नहीं जाते हैं, उनका रूपायन नहीं हो पाता। शब्द केवल-प्रयोग, सामान्य प्रयोग से अपना गहन अर्थ नहीं देते। वाक्य भी नहीं। कह देने या यूँ ही गा देने से शब्द और वाक्यों से बना गायन अर्थ के सभी छवियों उजागर नहीं कर पाता। शास्त्रीय गायन करने वाला, गुरु परम्परा से गायकी को प्रस्तुत करने वाला बंदिश की बोलों और उसके पीछे की मनोभूमि को कितने कोणों से प्रस्तुत करता है कि उत्पन्न संगीत हमारी चेतना की बहिर्मुखी यात्रा और अन्तर्मुखी यात्रा को इस तरह जोड़ देती हैं कि श्रोता और गायक को पूर्णता की अनुभूति होती है। आनंद के फूल झरने लगते हैं, रस की वर्षा होने लगती है। वैसे तो हर गायन जीवन का आस्वादन है। जीवन सभी को प्रिय है। चर-अचर जगत में सबको संगीत इसीलिए प्रिय होता है। वह केवल श्रुति मधुर नहीं, आत्मा को भी मधुर लगने वाला उपक्रम है। चेतना को तृप्त करने की क्षमता कमोबेश हर संगीत में है पर शास्त्रीय संगीत बहिर्मुखी होती जाती मानवता को अंतर्मुखी भी करती है, हमें हमारी जड़ों से जोड़ती है और पूर्ण बनाती है।
समय का भयावह एक सत्य यह भी है कि हम हर समय थोड़े अंतराल के बाद "बोर" हो जाते हैं और बार-बार उसका समाधान बाहर में खोजते हैं। शास्त्रीय संगीत "लय-योग" है और ऊब का या "बोरडम" के अपूर्णता की नियति को अपने पूर्ण रूपाकार में खंडित करता है। ऊब से निजात दिलाता है, बासी होते जाने की पीड़ा को आनंद में बदल देता है।
(अप्रमेय )

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