शिक्षा का सामान्यीकरण : व्यक्तित्व विकास या अवरोध


शिक्षा का सामान्यीकरण : व्यक्तित्व विकास या अवरोध

शिक्षा के मानक सार्वभौमिक तौर पर एक हैं पर भाषा सभी देश की अलग है लिहाजा शिक्षा का अर्थ भाषा से नहीं लिया जाना चाहिए | अगर गहरे में देखें तो प्रथमतः शिक्षा व्यक्ति को व्यक्ति बनाने की है पर सामान्यतया जब हम शिक्षा शब्द को सुनते हैं तो हमारे सामने कोई ऐसा व्यक्ति खड़ा हो जाता है जो किसी संस्था में कार्यरत हो अथवा एक मोटी रकम तनख्वाह के तौर पर उठा रहा हो, या फिर वह किसी ऐसे पद पर हो जिससे उसके रसूख का बिम्ब सामने उभर कर आता है | मंच पर अथवा अपने लेखों में भले ही शिक्षा के उद्दातीकरण के संबंध में बड़े-बड़े वाक्य लिखे-बोलें जायें पर शिक्षा का जो सामान्यीकरण हुआ है उसने यह सामान्य धारणा बना ली है कि व्यक्ति एक पैकेज की तरह है जिसमें उसे एक ख़ास समय में अलग-अलग रूपों का किरदार निभाना पड़ता है | व्यक्ति जो है उसे ठीक उसी तरह न रहने का दबाव समाज में इतनी गहरी जड़ें जमा चुका है कि उसके उठने-बैठने, बोलने, चलने, सभी जगह एक ख़ास व्यक्तित्व का जामा ओढ़ने के लिए उसे मजबूर होना पड़ता है | यह सहज ही प्रश्न पूछा जा सकता कि हमने ऐसा कौन सा मानक तैयार कर रखा है जिसको पाने की इच्छा के फलस्वरूप शिक्षा की तैयारी हम कक्षाओं में करा रहें है | ठीक इसके विपरीत जीवन के बहुतायत क्षेत्रों के जिन परिस्थितियों से व्यक्ति को बराबर आमना-सामना करना पड़ता है उसका सम्बन्ध हमारी शिक्षा के साथ कोई ताल-मेल नहीं बैठा पाता | बाल्यकाल से लेकर विश्वविद्यालयी स्तर तक वह जिस ढर्रे में लिख-पढ़-बढ़ रहा है उससे वह एक ख़ास तरह के व्यक्ति के सांचे में ढलता जाता है | हमें यह समझना पड़ेगा कि शिक्षा केवल पाठ्य-पुस्तक एवं कक्षा के अन्दर ही सीमित नहीं है इसका बहुत बड़ा दायरा या यों कहें 95% दायरा कक्षा के बाहर समाज, प्रकृति, पशु-पक्षी के साथ है | हमें यह समझना पड़ेगा कि शिक्षा का अर्थ केवल नौकरी पाने अथवा एक तथा-कथित झूठ ओढे हुए उस नागरिक से नहीं है जिसका  सम्पूर्ण पुरुषार्थ जिंदगी को महज जी भर लेने से समाप्त हो जाये | वह इससे भी कहीं ज्यादा अधिक दूसरे अर्थों में है जिसका प्रगोग केवल कक्षा या पाठ्य- पुस्तकों के आधार पर नहीं किया जा सकता |

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