महाकाल में महाभारत और उसका गीता कल्प


उत्सव बीत गया और गीता उस उत्सव में गाया गया वह गीत है जिसकी गूँज अभी तक खत्म नहीं हुई है। इस वक्त वह  मात्र एक आभास के रूप में विराजमान है जिसके  वियोग की स्तिथि का हम वर्णन तो नहीं कर सकते पर हाँ परछाईं रूप में स्वप्न की तरह  देख,सुन कर कल्पना भर कर सकते हैं । वाह अद्भुत ही होगा वह गीत जिसे स्वयं प्रभु ने गाया होगा।
काल के विशेष चक्र में गीता सदा से गायी जाती रही है, अवश्य ही किसी विशेष ग्राम,स्वर ,ताल के साथ जिसकी ध्वनि की टंकार विशेष अर्थ का गूँज लिए वायु में बिखरती-सनती काल के चक्र के साथ लीन होने की दशा तक पहुंचती होगी । लीन का विज्ञान ही लुप्त हो जाना है किन्तु विशेष अर्थ में ..! पुनः किसी माध्यम के संसर्ग में आते ही प्रकट हो जाना भी  है, कभी-कभी प्रकाश लिए प्रकट होता है या ध्वनि लिए अथवा पूरा का पूरा दृश्य लिए जिसमें महाभारत जैसी घटना घटती है। महाभारत प्रभु के साथ मनाया गया वह अनगढ़ उत्सव है जिसकी कोई तारीख तय नहीं थी; उन समस्त सहभागियों के बीच जो अपना-अपना किरदार बाखूबी निभा रहे थे सिवाय- कृष्ण के। कृष्ण जानते थे कि ईश्वर की प्रतिष्ठा से कहीं ज्यादे जरूरी  है लोक की प्रतिष्ठा और उससे भी महत्वपूर्ण है उसकी "प्राण-प्रतिष्ठा "। लोक प्रतिष्ठित था किन्तु माया रूप में और उसी माया के फलस्वरूप सारी घटनाएँ,व्यवस्थाएं चलती थी जिसके लिए लोक को जिम्मेदार ठहराना उचित न था । काल के गर्भ से कार्य-कारण जिसे स्त्री-पुरुष तत्त्व कहना ज्यादा सार्थक होगा, सक्रीय होते हैं तब माया का जन्म संतान रूप में आकार ग्रहण करता है | यह प्रक्रिया इतनी लम्बी है कि उसका स्मरण रख पाना कठिन है अतः  उसे आना होता है  पुनः इस कथा को सुनाने इसे तोड़ने या यों कहें कि अपने ही व्यवस्था के खिलाफ लड़ने जो उसी के गति से या उसी के होने से  स्वयंभू  के बरक्स खड़ा हो जाता  है।
ईश्वर के जिन शत्रुओं की चर्चा या असुरों की चर्चा विभिन्न ग्रंथों में हमें प्राप्त होती है दरअस्ल वह ईश्वर से ही उत्पन्न उनका अंश लिए वह असुर होता है जो उनके वियोग से धीरे-धीरे बलिष्ठ होता जाता है काल से धूप-पानी ,शक्ति लेते हुए। प्रभु अपने ही रूप को देखकर ,अपने ही चराचर जगत को देखकर जब विस्मय में पड़ जाते हैं तो वहीं माया का भी जन्म होता है जिसे प्रभु के सामने जाने में लज्जा आती है।ईश्वर का अपना रूप देखना और फिर न देखने के स्वभाव के फलस्वरूप माया को जो वियोग सहना पड़ता है वह सदियों तक काल के प्रभाव से बिना मालिक के दिग्भ्रमित हुए पथ-भ्रष्ट हो जाता है। इसी को अर्थान्तरण भी कहा गया है। आणविक विज्ञान की भाषा में समस्त जगत अणु-परमाणु का विघटित परिवर्तनीय ,रूपांतरित रूप है। स्थूल रूप से तो इस रूपांतरण को वैज्ञानिकों द्वारा प्रमाणित किया ही जा चुका है किन्तु सूक्ष्म रूप में और उसमें भी जहाँ प्राण-जगत,भाव-जगत आ जाता है-उसके विषय में कुछ शब्दों के माध्यम से कह पाना हमेशा से मुश्किल रहा है |  इसी अति सूक्ष्म प्राण-जगत की चर्चा किसी न किसी माध्यम से हर काल में हमें मिल ही जाती है। महाभारत उस अनंत काल में  जाने कब की ब्रम्ह बेला थी जिसमें सात्विक तरंगें जितनी मात्रा में व्याप्त थी कमोबेस उतनी ही असात्विक तरंगें भी थी। कृष्ण ही जान सकते थे कि उन्ही से उत्पन्न उनकी सहोदरा 'माया' उस वक्त रौद्र रूप धरे लीन अवस्था से विलीनता की ओर अभिमुख है। विलीन हो जाने के बाद स्वयं कृष्ण को भी भारी पड़ता उस निरंकुशता को थाम पाना क्योंकि चेतना में थोड़ी सी भी अगर गुंजाइश बची हो तो उसे पुनर्जीवित किया जा सकता है पर मृत चेतना को जीवित कर पाना मुश्किल है| ऐसी अवस्था प्रलय नहीं विनाश कहलाती है किन्तु प्रभु के संसार में विनाश की कोई जगह नहीं है सब कुछ रूपांतरित होता है,अपनी विशेष अवस्था से विशेष अवस्था में और उस रूपांतरण की जो समयाविधि है वही मोह है,वियोग है।
ऐसा नहीं कि लोक ही मोह्ग्रस्थ है | प्रभु भी मोह के वशीभूत हैं  पर उनका मोह  मात्र अपने से है और उनका एकमात्र  अपना  "लोक" ही है.… और लोक का मोह "माया"।माया मोह और वियोग का विज्ञान है। इस विज्ञान का फल ही अपूर्णता है और यही इसका सौंदर्य है। बहुत गहरे में हमें इस सौंदर्य के रस से जो पूर्णता का बोध प्राप्त होता है वह भी अपूर्ण ही है इस अर्थ में कि हम रूपांतरित होते रहते हैं हर अर्थों को विस्थापित करते हुए।
कृष्ण जानते थे कि अब काम नहीं चलेगा बाहर ही बाहर। इसी लोक में अवतरित होना पड़ेगा और यहीं से शक्ति भी हासिल कर प्रहार करना होगा। 
युद्ध के ठीक पहले रणभूमि के बीचो-बीच कृष्ण की सारी सूनियोजित व्यवस्था माया के अधीन हो जाती है,अर्जुन अपने विपक्षियों को भली प्रकार देख लेना चाहते हैं..... भीष्म पितामह से लेकर शिखंडी तक तथा दुःशासन से लेकर दुर्योधन तक। माया के अधीन समस्त व्यवस्था ही पलट जाती है। जिस अर्जुन को इन सब को देखकर अपने ह्रदय के क्रोधाग्नि में आहुति मिलनी थी उनके समक्ष वह अड़बड़ाया सा मोह से ग्रसित शोकाकुल होकर शान्त हो जाता है। मुक्त तो उसी क्षण हो गया था अर्जुन। योग की परम अवस्था का साक्षात्कार तो कर ही लिया था उसने  …
न कांछे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च.…। जगत के इस प्रपंच को जान कर युद्ध करना  .... ? कोई अर्थ नहीं रह गया था उस वक्त अर्जुन के लिए।और  अर्जुन तो छोटे भाई थे उनकी इच्छा से युद्ध नहीं रोका जा सकता था और उसके बिना भी तो युद्ध लड़ा जा सकता था,जीता जा सकता था। राजा तो युद्धिष्ठिर को होना था.… फिर यह सब ?
कृष्ण जानते थे कि अर्जुन की यह मुक्ति मेरे अधीन नहीं कही जायेगी उन्ही की सहोदरा उन्ही की अंश माया की कही जायेगी और सबसे महत्वपूर्ण कि अर्जुन की इस मुक्ति से सिर्फ अर्जुन को ही लाभ है लोक को नही।
माया का यह पहला वार था और वह भी ब्रह्मास्त्र बड़ा कठिन समय था यह कृष्ण के लिए। उस कठिन समय के भावावेश में कृष्ण ने जो कुछ भी अर्जुन से कहा वह उन्हें उस माया की मुक्ति से बाहर निकाल कर अपनी माया के अधीन करने का एक अद्भुत ही विधान बना। कृष्ण सफल हुए माया के वार से। अर्जुन को उस द्वार से खीचते तथा लोक की प्राण-प्रतिष्ठा करते हुए अपने गीतों (भगवतगीता) से अब वह तैयार थे काल के मैदान को हांकने के लिए। गीता उसी आवेश में गायी गयी वीर रस प्रधान पद रचना है जिसकी परिणति लोक के ह्रदय में शास्त्रों के नौ रसों का घोल लिए लोकरस पैदा करती है। यहाँ हर उस विधान को थोड़ा किनारे कर दिया जाता है जो लोक के अनुकूल नहीं। भगवान् की दृष्टि में लोक भी है और मुक्ति भी साथ ही साथ वह बीच में खड़े हैं लोक कि तरफ ताकते-पुजते।यहीं तो उनकी वह अपूर्ण कविता है जिसे हमेशा वह कोई न कोई पंक्ति जोड़ते-घटाते रहते हैं। यही तो वह गीत है जिसमे नए-नए मूर्छनाओं के प्रयोग से अनंत स्वरों से धुनों को बुनते रहते हैं। मुक्ति उनका स्वभाव है पर लोक उनका अनुग्रह। अर्जुन बहुत बाद में समझ पाये थे इस बात को तभी तो वह ठगा-ठगा महसूस कर रहे थें द्वारिका से लौटने के बाद। वही रथ और उसमें भी  वही नधे हुए घोड़े, वही गांडीव पर दो कौड़ी के लोंगो ने उन्हें हरा दिया। वाकई ठगा गए थे अर्जुन। मुक्ति भी नहीं मिली मित्र भी जाने कहाँ चला गया- कौन देश को बासी। राज्य मिला पर उसमें वह लोक रस भी तो न था जो कृष्ण के साथ पैदा होता था। थोड़ा बहुत जो उन्हें जीवित रखा था वह केवल कृष्ण की याद ही तो थी जो सखा रूप में,सारथि रूप में,गुरु रूप में बार-बार रण-भूमि के उस मैदान के बीचो-बीच खड़ा कर देती थी जहाँ कृष्ण ने वह अद्भुत गीत सुनाया था। शब्द और अर्थ तो कृष्ण के साथ ही विदा हो गए थे पर उसकी गूँज ही काफी थी अर्जुन के लिए या फिर इस लोक के लिए। हम उसी गूँज के स्वरों की ही तो तालाश कर रहे हैं अब तक। अर्जुन से लेकर युद्धिष्ठिर तक एक-एक का बारी-बारी इसी लोक में गायब हो जाना,अपने मित्र के प्रति अद्भुत ही मिसाल है। हम बांचते रहेंगे,गाते रहेंगे अधूरी ही सही वह गीता जब तक पुनः कृष्ण उन शब्दों को ठीक करने,स्वरों के बरत को ठीक तरह से लगाने सीना-ब-सीना ताल को समझाते प्रकट न हो जायेंगे।

(अप्रमेय )

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