ध्यान - एक



मनुष्य असीम संभावनाओं का स्रोत है | एक छोटा सा प्रयोग तुम्हारे लिए कितने रास्तो को खोल सकता है इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती | बहुत पहले से ही ध्यान को मनुष्यों के उन उपकरणों के रूप में प्रयोग  किया जाता रहा है जिससे उस परम अज्ञेय तत्व का साक्षात्कार  किया जा  सके | उन्ही उपकरणों की श्रिंखला में एक उपकरण है श्वास-प्रश्वास की गति का सम्यक ज्ञान | शास्त्रों में इस प्रक्रिया को स्वरोदय शास्त्र कहा गया  है जिसमे वायु को ग्रहण करना निश्वास और वायु को बाहर की तरफ छोड़ना प्रश्वास कहा जाता है | मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन तक यह प्रक्रिया देह में चलती रहती है किन्तु यहाँ यह समझ लेने की आवश्यकता है की यह श्वास प्रक्रिया हमारे नासिकाओ में एक साथ नहीं चलती... अर्थात कभी वह हमारे दाएँ  नासिका  से आती-जाती है तो कभी बाएँ  |  शास्त्रों में बाएँ नासिका के श्वास को  "इडा" तथा दाये श्वास को  "पिंगला" नाम दिया गया है  कभी-कभी एकाध छड़ ऐसा भी होता है जब हमारी दोनों नासिकाओ से श्वास प्रक्रिया चल रही होती है ऐसी स्थिति का नाम "सुषुम्ना" कहा गया है | ध्यान योग साधना में अनेको प्रकार के प्रयोग प्रचलित है किन्तु  इस विषय में जो सबसे प्राचीन प्रयोग हमें प्राप्त होता  है उसमे से एक नाम है शिव द्वारा शक्ति को स्वरोदय शास्त्र के प्रायोगिक ज्ञान का साक्षात्कार कराना। ज्ञान के इस प्रायोगिक प्रयोग ने न केवेल श्वांस सम्बन्धी तत्व को उजागर किया बल्कि शरीर सम्बन्धी व्याधि (रोग ) और उनके उपाय, दिशा सम्बन्धी ज्ञान ,ज्योतिष सम्बन्धी सूक्ष्म ज्ञान (जिसमे प्रश्न फलादेश,दिशा फलादेश ,शारीरिक अवस्था के फलस्वरूप फलादेश इत्यादि का बड़ा गहन संसार छुपा  हुआ प्राप्त हुआ …… . (कभी अवसर मिला और प्रभु की कृपा हुई तो इस पर पूरी एकाग्रता से अवश्य लिखूंगा) कामशास्त्र  के उन तत्वों का भी यहाँ विस्तृत विवरण प्राप्त होता है जहाँ से  हमें उन विशेष उपायों के बारे में सूक्ष्म  जानकारिया मिलती है जिससे स्पर्श विज्ञान के साथ-साथ प्राण (श्वांस ) के माध्यम से दो आत्माओ और उनके शरीर को  एक-रूपी हो जाने का प्रयोग मिलता है ।  शिव का अर्धनारीश्वर रूप इसी स्पर्श विज्ञान का प्रतिनिधित्व करता है । इसके अतिरिक्त मुद्रा विज्ञान, मृत्यु पूर्वानुमान, मंत्रो की सार्थकता का विज्ञान जो की श्वांस-प्रश्वांस की गति से उत्त्पन्न मानसिक योग है , और बहुत सारे साबर विज्ञान उपलब्ध  कराता है जिनकी सार्थकता जैसे- जैसे हम गहरे में उतरते जायेगे मिलती जाएगी । स्वरोदय विज्ञान तुम्हारे लिए तुम्हारे प्रयोगों की एक खाली डायरी प्रदान करता है जिसमे तुम अपने प्रयोगों को
 लिख सकते हो किन्तु यह ध्यान रहे शुरुवाती अभ्यास के थोडा और बाद … किसी श्रेष्ठ गुरु का मार्गदर्शन ले लेने महत्वपूर्ण होगा बाद में तुम्हे खुद ब खुद इश्वर के विधान से मार्ग मिलते जायेंगे ।
शुरुवाती प्रयोग:
जब कभी अवसर मिले अपने श्वांस  को केवल अन्दर आते -जाते देखो अर्थात उसे महसूस करो । थोड़े दिनों में इस अभ्यास से तुम अपने आप को  ध्यान के उस पड़ाव पे खड़ा पाओगे जहा तुम्हे आनंद मिलने लगेगा । इसके बाद जब श्वांस पर तुम्हारी थोड़ी पकड़ मजबूत हो जाये तो थोड़ा-थोड़ा (बहुत बल पूर्वक नहीं ) अपनी श्वांस को अन्दर रोकने का उपाय करो ध्यान रहे श्वांस को अन्दर लेते वक्त- प्रबल, शुभ, कल्याण अर्थात जो तुम्हे पाने की जिज्ञासा है उसका अन्दर संचय करो.……… और जब अपनी श्वांस को बहार की तरफ छोड़ो तो अपने अन्दर की प्रतिकूल दशाओ,भावनओं को बहार जाने का आदेश दो । श्वांस को छोड़ने के  तुरंत बाद श्वांस को वहीं  थोड़ा विराम दो अर्थात न अन्दर न बहार । यह प्रयोग तुम्हे असीम कृपा  प्रदान करेगा जिससे तुम्हे परमात्मा के उस अनंत उत्सव का निमंत्रण मिलेगा जिसमे तुम शामिल हो जाने के पात्र बनोगे ।स्मरण रहे मात्र शामिल हो जाना ही लक्ष्य न हो.…
(अप्रमेय )

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