दिल्ली के योगमाया मंदिर के बहाने

भारतवर्ष  की धरती पर देवी-देवताओं की जो कृपा अनवरत बरसती चली आ रही है उस तत्व को कोई चौबीस वर्ष का नौजवान कैसे समझ सकताहै। वैसे सत्य कहूँ तो चौरासी वर्ष के बुजुर्ग भी चौधिया जायें इस तथ्य को देखने-समझने में। कौन इतना साहसी है जो इनका इतिहास खोजे और जिन्हों ने खोजा भी उन बिचारों के पास  भाषालिपियोंअवशेषों के अतिरिक्त कोई उपाय भी तो न थें। विश्व की महानतम खोजो में से एक हड़प्पा -मोहनजोदड़ो की खुदाई मनुष्य के हजारो सालों से दिग्भ्रमित दमित भावों के फलस्वरूप खोद कर खोजी जाने वाली वह इच्छा है जिसे वह अनुसंधान कहता है, फिर भी प्रभु के दरबार में ये भी शुभ है जिसे वह बच्चों के खेल से ज्यादा नहीं समझता।छोटे-छोटे बच्चे जैसे अपना पैसा मिट्टी में  खोद कर दबा देते हैं, पैसे की पेड़ की चाह में। बच्चों की यह अबोध क्रियाएं तथा ईश्वर का सब-कुछ करते हुए विलग रहना दोनों को ही समझ पाना बड़ा कठिन है। दोनों का अपना महत्व है पर मनुष्य की तमाम संभावनाओं के प्रतीक्षित आलोक में उसका कुछ करते-रहना उस परम महत्व के आगे वैसे ही है जैसे पूरी अर्थ व्यवस्था के सामने किसी बालक के हाथ में पड़ा पचास पैसे का सिक्का। मुझे याद नहीं कि कब से मेरा प्रेम शिवलिंग से है पर इतना अवश्य याद आता है जब पिता जी अपने नर्वदेश्वर की उपासना कर के विश्वविद्यालय चले जाते थे, घर के पहले कमरे में बनाया गया पूजा-स्थल मुझे अपने खेलने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान मालूम पड़ता था । जेठ की खड़ी दुपहरी और अन्दर मैं अपने आप को आज सविनय अवज्ञा आन्दोलन के उस क्रन्तिकारी के रूप में बोध कर पाता हूँ जिसे बड़े आदर से या फिर कोई नया उत्पात न कर सके के कारण जॆल में अर्थात कमरे में बंद कर दिया जाता था । मैं अपनी पूरी समग्रता से उस दुपहरी का लाभ उठा लेना चाहता था । पूजा-स्थल में पड़ी आचमनी जो छोटे लुटिया में आधे पानी में डूबी रहती थी वह आज भी न पूरी भरी रहती है न पूरी खाली। उस वक्त तो नहीं पर इधर अक्सर आचमन करते वक्त सत्य का नित्य नए अर्थों के बोध में परिवर्तन होता रहता है जिससे प्रायः आचमन का संकल्प भी बदलता रहता है। थोड़ा बहुत लुटिया का आधा खाली और आधा भरे होने का अर्थ इस परिपेक्ष्य में समझ में आ रहा है । वह पूजा-स्थल आज भी मेरे अंतस में उसी तरह अव्यवस्थित है जिसको मैं व्यवस्थित भी नहीं करना चाहता । आधा फूल भोलेनाथ पर चढ़े हुए और आधे जमीन पर गिरे हुए, गीले अक्षत पर लिपटे चन्दन कुछ इस तरह दिखते थें मानों वे जैसे स्वर्ण के मुकुट हों | धूप की भस्म इधर-उधर बिखरी उड़ी हुई मेरे मन पर एक अजीब बाल सौंदर्य उकेर गएँ जिस पर मैं अपनी तरफ से कोई नया रंग नहीं चढ़ाना चाहता । वैसे अगर मैं चाहूँ तो भी कोई नया रंग नहीं चढ़ा सकता क्योंकि अब मेरे लिए सब-कुछ पूर्व परिचित हैं | अब मुझे कोई फूल नया नहीं लगता यह अजीब है पर सत्य है इसलिए प्रायः मैं अब फूल पाती चढाने से बचता हूँ | सही अर्थों में यही तो है वह परंपरा जिसे हमारे पुरखों ने हमें खुद समझने के लिए छोड़ दिया है। छोड़ दिया आसनी ,छोड़ दिया घंटी ,छोड़ दिया बिना सुलगाये हुए धूप-बाती । छोड़ देना और छूट जाने में एक गहरा तात्विक अंतर है। हम छोड़ते हैं भगवान् के उपर पुष्प पुनः पुष्प चढ़ाने के लिए और कहीं गहरे में आसनी से उठ जाने के लिए, उठ जाने के लिए कि कल फिर सुबह होगी, नए पुष्प,नए पत्ते फिर उदित होंगे, धरती के ह्रदय से कल फिर नए जल का स्रोत फूटेगा जिसको हम अर्पित करेंगे नए संकल्पों के साथ घंटी बजाते हुए। यह बहुत आसान है और यह यह सब क्रियाएं हमें इसे उतने ही आसानी से छोड़ देने का सन्देश भी देती है जिसे हम जोर से पकड़े रखना चाहते हैं। मृत्यु का भी अपना एक अद्भुत सौंदर्य है जो निरंतर झरता रहता है या यों  कहे कि कहीं अन्दर अंतस में मरघट का राग लिए बजता रहता है जिसे शिव अपने डमरू से तालबद्ध करते रहते हैं और बाहर हमारी चेतना एक नर्तकी की तरह श्रोताओं के मध्य नृत्य करती रहती है जिसे लोक-लज्जा के साथ-साथ शास्त्रों के विधान में त्रुटी न हो जाने का भय भी सतत सालता रहता है । ………… "वाह अद्भुत है यह त्रुटी " अद्भुत है हमारा आधा संकल्प हमारी आधी चेतना ,अपूर्ण ज्ञान । अद्भुत हैं आप शिव आधे पुरुष और आधे स्त्री ।कल मैं बारह साल बाद अपने इसी अर्ध शेष स्मृति को 'योगमाया' के दर्शन से पुनः सिंचित करने गया था जिसे मेरे सांगीतिक गुरु(देवेन्द्र नाथ शुक्ल ) ने मुझे दिल्ली आने के पूर्व मेरे सपाट मन में बिजारोपित किया था । तब मैं यही समझ पाया था कि दिल्ली में रहने के पहले माँ का आशीर्वाद ले लेना जरूरी है । दिन आए और गएँ कि अचानक अपने कुछ मित्रों के साथ बिना किसी इच्छा के बस यों ही घूमते-घामते मैं कल मंदिर के द्वार पर उपस्थित था. कुछ फूल खरीद कर माँ की चरणों पर चढ़ा भी आया | आज बहुत दिनों के बाद जाने क्यों उन चढ़ाए हुए फूलों का रंग याद हो आया जो मैंने माँ की चरणों में चढ़ाया था | मुझे याद नहीं मैं कब सो गया | स्वप्न में मैंने देखा कि मैं पुनः मंदिर के द्वार पर खड़ा हूँ |  स्वप्न में मैं फूल न खरीद सका और अंदर मंदिर में प्रवेश के बाद योग-माया के उपर चढ़े हुए फूलों में मैं उन्हें ढूंढने लगा, मैं ढूंढने लगा अपनी जिजीविषा, अपना संकल्प और वह स्पर्श जिसे बारह साल पहले मेरे गुरु ने मुझे दिल्ली आते वक्त दिया था | मेरे हाथों में कोई फूल नहीं था इसलिए मैंने कुछ भी उन्हें नहीं चढ़ाया |मां का धड़ अन्दर वहां योगमाया मन्दिर में पता नहीं कब से दबा हुआ है | आज सुबह उठ कर उनके दबने की घुटन मैं अपने अंदर महसूस कर पाया। जब पूजा करने बैठा तो पता नहीं कहाँ से एक ताजा फूल अपनी आसनी पर पड़ा पाया | 
(अप्रमेय )



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