शिक्षा नीति



शिक्षा नीति

आज पुनः शिक्षा नीति पर हम विचार करने बैठे हैं | हमें यह ध्यान में रखना होगा कि जो कुछ भी विचार आज हम सभी के मन मस्तिष्क में बन आयें हैं उसके पीछे हमारी परंपरा तथा हमारे ही समाज के ताने-बाने से निर्मित शिक्षा के ऐसे तमाम परोक्ष-अपरोक्ष कारण भी हैं जिनके लेखा-जोखा का हमें भान तक नहीं हो पाया है, और अगर है भी तो इससे सम्बंधित शिक्षा को कैसे लागू किया जाय, इसका कोई ठोस उपाय हमारे हाथ नहीं लग पाया है | यह अलग बात है कि जब एक दृष्टि से हम इसका सिंघावलोकन करने बैठते हैं तब तमाम अच्छाइयां-बुराइयां हमें नजर आने लग जाती हैं जो हमारे मन-मस्तिष्क को कचोटती हैं और बार-बार हमारा ध्यान किसी अज्ञात रिक्तता को पूर्ण करने की ओर अभिप्रेरित करती हैं  | आज भारत के समक्ष शिक्षा के सन्दर्भ में जो सबसे बड़ी चुनौती मुझे दिखाई पड़ती है वह है उसके आदर्शों की तथा नई दुनिया के लोग जिन प्रतिमानों को अपना लक्ष्य बनाए हुए शिक्षा ले-दे रहे हैं उसके बीच संतुलन स्थापित करने की है |
भारत की दृष्टि सदा से वैचारिकी की रही है और उस वैचारिकी ने सदा से अपनी पूर्णता की प्राप्ति का लक्ष्य, अध्यात्म के रास्ते से ही देखा है | फलस्वरूप हमारा दर्शन, हमारा साहित्य तंत्र, संगीत आदि विधाओं का जो विकास हुआ उसके भवन पर अध्यात्म का ही झंडा लहराया | इतिहासकारों ने तो इसे बार-बार दुहराया ही है कि आत्म के उत्थान के लिए दुनिया को पूरब की ओर तथा भौतिकीय प्राप्ति के लिए पश्चिम की ओर झांकना होगा | ऐसा नहीं है कि वैचारिकी की इस उड़ान में भारत ने भौतिक जीवन की प्राप्ति के लिए कुछ न किया हो, पर प्राचीन व्यवस्था के अनुरूप वह जिन साधनों का उपयोग कर रहा था करीब-करीब वह सब पदार्थ कम से कम बिना प्रकृति को छेड़े जीवन जीने के साधनों को ही पर्याप्त समझता था |
पश्चिम में आये वैज्ञानिक क्रान्ति ने विज्ञान की मदद से पूरे विश्व को एक सूत्र में बाँध दिया | धीरे-धीरे इस क्रान्ति ने आदमी को इतना करीब कर दिया कि उन्हें न केवल उनके चहरे ही दिखाई पड़ने लगे बल्कि उनकी संस्कृति, उनकी भाषा यहाँ तक कि सूक्ष्म-से सूक्ष्म कलाएं-विज्ञान आदि का भी बेहिसाब ज्ञान प्राप्त हुआ | मेरा क्या और उनका क्या है के इस भेद को समझ कर जिस बोध से नए ज्ञान का सृजन उनमें हुआ उसने तमाम तरह की परम्पराओं के स्थापित मूल्यों को चुनौती के साथ धवस्त भी किया | भाषा जिस पर किसी देश की संस्कृति का रक्षण होता है वह भी अब बहुत सूक्ष्म स्तर पर किसी एक देश की नहीं विश्व की हो गई | कलाएं, विज्ञान इत्यादि में तो अब यह अंतर कर पाना अत्यधिक कठिन है कि इसमें देशीयता कितनी है और विदेशियता कितनी !
यह विज्ञान का चमत्कार ही है कि परोक्ष-अपरोक्ष रूप से दुनिया के तमाम जानकारियाँ जिससे हम बचतें हैं, जिसे हम अपने दरवाजे के चौखट के बाहर ही खड़ा रखना चाहते हैं वह हमारे चौके तक घुस आयीं
हैं | ऐसी स्थिति में बच्चे की शिक्षा का विकास, उसके चरित्र का विकास केवल अविभावकों के चाहने- न चाहने पर आश्रित नहीं रह जाता | स्कूल जाने के पहले वह ऐसी तमाम बातों को सीख चुका होता है जिसमें उसकी भाषा, संस्कृति, विचार तथा अन्यान्य ऐसे अनेक तत्त्व शामिल होते हैं जिनका विद्यालयी शिक्षा के साथ मोटे तौर पर कोई ताल-मेल नहीं होता | निश्चित तौर पर इन तमाम बातों पर स्कूली शिक्षा के रथ को हांक पाना अत्यधिक कठिन है पर फिर भी अगर हम शिक्षा नीति बनाने बैठे हैं तो हम इससे रूबरू हुए बिना आगे नहीं बढ़ सकते |
बच्चा सुविज्ञ हो, अच्छा बने, पढ़ने-लिखने में कमजोर न हो, जैसी तमाम इच्छाएं अपने मन में लिए माता-पिता अपने बच्चे को स्कूल में दाखिल करवाते हैं | समस्त पढ़ने-पढ़ाने का उद्देश्य बच्चे को नैतिक बनाने के आधार पर टिके रहने के बावजूद कारगर नहीं हो पा रहा है | नई दुनिया के सामने नैतिकता की वह सब चुनौतियाँ वैसी की वैसी ही पड़ी हैं जैसी वह थीं पर साथ ही साथ कुछ ऐसी नई विपात्तियां खड़ी हो गईं हैं जिनका समाधान न तो सरकार के हस्तक्षेप से ठीक की जा सकती हैं और न ही स्कूल के माध्यम से |
माता-पिता से बच्चों की संवादहीनता, देश को देश और घर को घर न समझना | रिश्तों की अर्थहीनता जैसी समझ को नई दुनिया का स्टाइल समझते बच्चे इसे कहाँ से और क्यों ला रहे हैं यह एक विमर्श का लगातार विषय बनता जा रहा है |
नैतिक होना अपने आप में सदा से भ्रामक रहा है, हमारा नैतिक होना दूसरे समाज में अनैतिक हो सकता है पर फिर भी तमाम विचारकों ने जिन सार्वभौमिक नैतिक आधारों की चर्चा की है उसका केंद्र व्यक्ति का हिंसक न होना, प्रेमी होना इत्यादि-इत्यादि बताया है  |
मनुष्य के शरीर को ध्यान से देखें उसकी संरचना अपने-आप में नैतिक नियमों का पाठ पढ़ाती है |
एक परिमाप में सुगठित आप के पाँव, हाथ, अंगुलियाँ, पेट, ह्रदय की एक लय में चलती धडकन आप के समक्ष गणित के सूक्ष्मतम आधार को व्यक्त करती हैं | जो खाद्य पदार्थ हमने ग्रहण किया उसको सुपाच्य बनने-बनाने में विविध रसों का समायोजन रसायन विज्ञान की ओर इशारा कराती हैं |
जब हम अपने आँख को खोलते हैं तब स्वभावतः दोनों ही आँखे खुलती है, ऐसा कभी नहीं होता कि एक ही आँख खुले, शरीर की यह व्यवस्था सामाजिक-विज्ञान की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट कराती हैं |
कहने का तात्पर्य यह है कि शरीर के चलने-चालाने में गणित, रसायन, समाज, इत्यादि सभी पहलुओं का महत्व है | आज हमें यह देखने की आवश्यकता है कि हमारी शिक्षा के क्या लूप-होल्स हैं |
मेरी समझ से हमारी शिक्षा की नीत–प्रसार में मानसिक पहलुओं पर अब-तक ज्यादे ध्यान दिया गया   है | व्यक्ति केवल मानसिक विकास के आधार पर नहीं जी सकता, उसमें उसे शारीरिक, साम्वेगिक और भाषिक ( भाषिक जिसमें शब्द ही नहीं शब्द के इतर भी जो कुछ है जिसका मनुष्य बराबर अंतर्संवाद द्वारा बोध करता रहता है ) पहलुओं पर उतना ही ध्यान देने की आवश्यकता है जितना कि मानसिक |
हमनें बार-बार नौजवानों-बुजुर्गों के बीच कम्युनिकेशन-गैप के विषय में सुना है, दरअसल यह कम्युनिकेशन-गैप व्यक्ति-व्यक्ति के बीच नहीं है – व्यक्ति और प्रकृति के बीच है जिसके परिणाम बड़ी सूक्ष्मता से समाज को धीरे-धीरे घेरते चले जा रहे हैं | नई दुनिया में हम आज बाध्य हैं कि हम अपनी संवेदनाओं को अब तभी व्यक्त कर सकते हैं जब एक ख़ास तरह का वातावरण तैयार हो, मसलन टी.वी. सीरियल, सिनेमा इत्यादि इसके सबसे अचूक उपाय हैं | मनोरंजन शब्द अपनी असीम व्यापकता में अब इतना बाजारीकृत हो गया कि एक तरह से इसे इंजॉय का पर्याय समझा जा रहा है |
संवेदना का विकास जो कि निहायत वैयक्तिक है उसको महज स्कूली फंक्शन की तैयारी से बच्चों के मन में कैसे उत्पन्न किया जा सकता है ? जब कि उसके उत्पन्न होने के साधन प्रकृति में है, पशु में है फूल पत्तों में मौजूद हों !
हवा बहती है पत्ते सरसराते है एक प्रक्रति का गीत पूरे वातावरण को आच्छादित करता है | उसको सुनना उसके बीच रहना शायद यह संवेदना के विकास में ज्यादे सहायक हो |
व्यक्ति पहले आम-तोड़ता था, मछली पकड़ता था खाने-पीने के लिए उसे शारीरिक श्रम करना पड़ता था | शरीर को श्रम की जितनी आवश्यकता चाहिए होती थी वह उसे प्राप्त थी | व्यक्तित्व विकास का पूरा जिम्मा उठाए नई दुनिया के स्कूलों का ताना-बाना इसी आधार पर टिका है कि वह ही एक मात्र उपाय हैं जो बच्चे के व्यक्तित्व के विकास के साथ-साथ देश के भविष्य को सुधारने में लगे हुए हैं | सुबह सात बजे से लेकर दुपहरी के ढाई बजे तक बच्चा फिजिक्स, केमेस्ट्री मैथ, के जंजालों के बीच किस अनजान भविष्य में पदार्पण करेगा न तो वह जानता है न उसके अविभावक और न ही देश |
मैं यह नहीं कहता कि इन विषयों को पूरे तौर पर दरकिनार कर देना चाहिए, हाँ जो कुछ छूट रहा है उसे गंभीरता के साथ लेते हुए शिक्षा को समावेशी दृष्टि प्रदान करना चाहिए जिसमें आठ घंटे की इस स्कूली-यात्रा में बच्चों को ४ घंटे गणित, इतिहास, फिजिक्स केमेस्ट्री की पढ़ाई करवाने के साथ शेष बचे ४ घंटे  में उसके शारीरिक, साम्वेगिक, इत्यादि विषयों को स्थान देना चाहिए |
स्कूलों में लाइब्रेरी की ही तरह अनिवार्य रूप से खेलने के तमाम साधनों, अगर हो सके तो प्राकृतिक वातावरण जिसमें अहिंसक पक्छियों, तितलियों, कुछ कीट-पतंगों के साथ उन्हें मिलने-मिलाने की व्यवस्था की जानी चाहिए जिससे उसका प्रकृति प्रेम बढ़े | संगीत, चित्रकारी, नाटक इत्यादि विषय को बस केवल कोरम पूरा करने का विषय नहीं समझना चाहिए | मनुष्य के भीतर असीम संभावनाएं हैं और इन संभावनाओं की प्राप्ति केवल भोजन के पोषण से नहीं संभव हो सकती | विज्ञान की मदद से भोजन उगाहने की समस्या से पूरी दुनिया ने कबकी मुक्ति पा ली है परंतु, इसके वितरण और संग्रह से प्राप्त भ्रामक सुख ने आज मनुष्यता को जकड़ रखा है | हमें यह समझना होगा कि आतंरिक विकास की कुंजी आज भी इन्ही कोरम पूरा करने वाले विषयों के पास है | आज जिस स्तरहीन संगीत, नृत्य तथा विभिन्न  कलाओं को हम सुनने-सुनाने-देखने के लिए बाध्य किए जा रहे हैं उसका अथाह व्यापार मनोवैज्ञानिक आधार पर हमारी आतंरिक कला के दमन के आधार पर ही फल-फूल रहा है | हमें यह समझना होगा कि शिक्षा का मूल उद्देश्य व्यक्ति के आत्म गौरव को जानने के साथ है | जिनको जरा सी भी इस प्रभुता का भान है वह मनुष्यता के, अस्तित्व के सबसे बड़े हिमायती हैं |

(अप्रमेय मिश्र)

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