विभिन्न कलाओं के लिए मातंगी तंत्र


मातंगी को सरस्वती के तांत्रिक परिभाषा के रूप में अगर देखा जाय तो इसे समझने में आसानी होगी। तंत्र आध्यात्म की  बोध भाषा है।  इसे केवल स्वीकार करना है किन्तु वह स्वीकृति बाहरी दुनिया के हिस्से की न होकर आप की अपने भीतरी दुनिया के हिस्से की होनी चाहिए। हमारा हिस्सा हमारी पृथ्वी है जहाँ इस वक्त हम खड़े हैं।  हमारा हिस्सा हमारा सूर्य है जिसकी ऊर्जा हम परोक्ष-अपरोक्ष रूप से ग्रहण करते रहते हैं। हमारा हिस्सा हमारा शरीर है और उस शरीर से उत्पन्न हमारे विचार । थोड़े से उलटे अर्थो में अपने हिस्से का बोध बहुत गहरे में दुनिया के हिस्से के अर्थ में रूपांतरित हो जाता है पर ये अवस्था धीरे-धीरे आती है। दुनिया में जहाँ भी तंत्र का प्रयोग रहा है वहां के उपलब्ध साहित्य में जो कुछ भी सूत्र हमें मिलते हैं उन्हें ध्यान से देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे वह किसी बच्चे का संवाद हो - ऐसा अकारण नहीं है दरअसल शब्द ऐसे गूढ़ तत्वों के लिये मात्र इशारों तक ही सीमित रहते हैं। उनके द्वारा बोला गया वह सूत्र समस्त ब्रह्माण्ड के बोध को ग्रहण किए रहता है किन्तु शब्दों में वह केवल गर्भावस्था में ही रहते हैं। भारत तंत्र के विषय में हमेशा से बहुत गहरे में प्रवेश करता रहा है किन्तु उतना ही ज्यादा वह उसके बाहरी तंत्र अर्थात जागतिक तंत्र के विषय में भी विस्तार पाया है। ये बड़ा ही रोचक है कि जागतिक विषय कभी भी न ख़त्म होने वाली वह यात्रा है जिसका अंत इस अनंत के बोध से ही संभव हो पाता है किन्तु यह बोध तभी संभव है जब हमें जागतिक बोध की  निरर्थकता को अनुभव हो जाए । बुद्ध को यह जगत निरर्थक प्रतीत हुआ किन्तु जागतिक अर्थो में वे उसकी सार्थकता को जानते थे या उन्हों ने इसे जिया था । 
भारत में प्रचलित दस महा-विद्याओं में मातंगी विद्या थोड़ी कम प्रचलित रही हैं किन्तु बहुतों ने इसका प्रयोग कर के जगत के तल पर और साथ-साथ आध्यात्म के तल पर प्रवेश पाने में सफलता प्राप्त की है। तंत्र में प्रवेश बच्चों के खेलने के प्रवेश की तरह है किन्तु बहुत गहरे में ये हजारो साल के अनुभवों को लिए हुए उस बूढ़े आदमी की तरह है जिसकी  आवाज साधकों को  कापती हुई सी  नजर आती है।  उसका शरीर तना हुआ नहीं धरती की तरफ झुका हुआ सा नजर आएगा । शास्त्रों में मातंगी का ध्यान  एक १६ वर्षीय कन्या को कहा गया है जिसके एक हाथ में वीणा तो  दूसरे हाथ में  कृपाण ,तीसरे हाथ में वह नरमुंड लिये हुए हैं जिसके उपर एक तोता विराजमान है और चौथा वरदहस्त है । मातंगी का रंग हरा है तथा वह आसन मुद्रा में स्थित हैं। हरे रंग का तोता हमें उस पालतू तोते के विषय में स्मरण कराता है जो मनुष्य की भाषा को आसानी से बोल सकता है किन्तु यह ध्यान रहे तोते के द्वारा बोले गए शब्द का इस प्राण जगत में कोई विशेष महत्व नहीं है …  ठीक इसी प्रकार मातंगी के साधना से हमें भले ही जागतिक स्तर पर कुछ लाभ हो जाए पर विशेष अर्थ में उसका महत्व तभी है जब हम उसका प्रयोग आत्मिक प्रवेश के किसी दरवाजे के लिए करें, लिहाजा हमारा प्रयास अगर हमें जागतिक स्तर पर कुछ उपलब्ध कराता है तो हमें वही अटक नहीं जाना चाहिए। अक्सर बहुत से साधको के साथ ऐसा ही होता है इसलिए ध्यान रहे साधना का लक्ष्य भले ही पूर्णतया आध्यात्मिक न हो पर वह जागतिक स्तर  पर कल्याणकारी होनी चाहिए ।
(अप्रमेय )






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