भिक्षा

                       भिक्षा

आधुनिकता के इस समय में जिन दो-चार कृत्यों की घोर निंदा हो रही है उनमें से एक नाम भिक्षा भी है, जिसे खड़ी बोली अथवा सभ्य भाषा में भीख मांगना कहा जाता है। यह बड़े आश्चर्य की बात कि भीख मांगने वाले लोग सारे संसार में कटोरा लिए एक जैसे खड़े दिख जाएंगे, किन्तु भारत में भीख मांगना कुछ विशेष अर्थों में अर्थात  बड़े सौभाग्य और तप का काम समझा जाता रहा है।रेलवे स्टेशन से लेकर गाँव के खलिहानों तक जगह-जगह एक ही कॉपीराइट की हुई धुन आप को सुनाई पड़ जाएगी ...
"धरम कर बाबू ए भईया  । (स रेरे सस ..स मग रेरे स ..) 
आज जिन अर्थों में भारतीय भिखारी भीख मांग रहे हैं; ऐसा जान पड़ता है कि उनके अंतस में कहीं यह बात बहुत गहरे बैठी हुई है कि प्रारब्ध से ही उनको यह काम मिला हुआ है।ऐसा लगता है कि इस अति निकृष्ट कार्य को भिखमंगे अपनी मुक्ति का मार्ग समझते रहे  हैं । अब हर समुदाय में दो-चार लोंग तो खराब निकल ही जाते हैं -कोई शराबी-जुआड़ी हो जाय तो बिचारे तो किया क्या जा सकता है ?
मेरी समझ में मनुष्यों की सहजात प्रवृत्तियों में भीख मांगना सबसे पहला गुण होना चाहिए। बच्चा जब पैदा होता ही है तब वह रो-रो कर दूध की भीख ही तो मांग रहा होता है अपनी माँ से या फिर इस दुनिया से ! वस्तुतः दुनिया तो उसके लिए बाद का परिणाम है पर बच्चे के पास जितनी भी चेतना मौजूद होती है उसमे उसका कुछ मांगना ही तो सबसे पहली सहजात क्रिया है जिसे वह किसी से नहीं सीखता। हाँ अवश्य ही काल के क्रम में उसके मांगने के भाव और गति में विशेष अंतर आ जाता है। स्थिति तो यहाँ तक पहुँच जाती है कि  "है जो सब कुछ तो दिल नहीं लगता  .... कुछ न होता दिल बहल जाता” की स्थिति में वह अपने आप को पहुँचा हुआ पाता है |
भारत ने इस तथ्य को शायद बड़े गम्भीरता से लिया था। ब्राम्हणो का तो यह तप हुआ करता था। संचय का कोई प्रश्न ही नहीं। दिन-भर में केवल एक जून भोजन वह भी जितना मिल जाय। पहले द्वार गए नहीं मिला तो दूसरे द्वार,दूसरे द्वार नहीं मिला तो तीसरे द्वार और अगर यहाँ भी नहीं मिला तो उनके पास चौथे घर जाने जाने का शास्त्रों में कोई विधान न था | उस दिन उपवास ही को  सौभाग्य मान कर संतोष  करना होता था ।परन्तु पहले द्वार न सही दूसरे अथवा तीसरे द्वार पर भिक्षा मिल ही जाती थी । भारतीय परंपरा में तो न जाने कितने ऐसी भीख मांगने की रस्मे अब भी जीवित हैं जिन्हे देख कर विस्मित हो जाना पड़ता है। यज्ञोपवीत जैसे संस्कार में तो भीख मांगने और देने का ऐसा अद्भुत प्रयोजन होता है कि पूरा गाँव ही उमड़ पड़ता है बरुआ को भीख देने के लिए और अंत में तो बरुआ को नाराज हो कर गाँव से ही भागने के लिए प्रेरित हो जाना पड़ता है -बाहर भीख ज्यादे मिल जाने की सम्भावना से। गृहणियों को भिक्षा देने में तथा दूर से आये किसी सन्यासी या योगी को भोजन कराने में अतीव सुख मिलता था। कई कहानियों में यहाँ तक कहा जाता है कि औरतें अपने घर का अन्न चुरा-चुरा कर अपने गाँव के किसी जरूरतमंद को दे आती थी। असल में औरतें भीख मांगने की तड़प को बहुत गहरे में अनुभव कर पाती हैं अपने ममत्व के कारण। सही अर्थों में उनका रस कभी नहीं सूखता आत्मा की जड़ों में..... बह ही जाता है उनका दूध अपने बच्चे की पुकार से। अद्भुत है यह करुणा तभी तो सीता राम की मर्यादा को किनारे कर लखन की रेखा को लांघ जाती है रावण को भिक्षा देने के लिए। यह कथा पूरे विश्व के इतिहास में अनायास ही नहीं चर्चित हुई। ऐसे ही थोड़े राम नदी को पार करने के लिए अपनी वनवास यात्रा के शुरुवात में ही उस नाविक से अनुग्रह कर रहे थे। वह राम जिसके संकल्प मात्र से लंका तक बाणों का पुल बन सकता था वह उस नाविक के समक्छ  …… ? इसी महाग्रंथ के सामानांतर महाभारत की जो पृष्ठभूमि तैयार हुई वह भी कुछ इसी से मिलती-जुलती है। पूरी कहानी ही लेने-देने के इर्द-गिर्द घूमती है। मांगने की पिपासा की अद्भुत रागनिया हैं यह छोटी-छोटी कहानियाँ। यक्ष के सरोवर के पास बिना अनुमति के जल पिने से पांचो भाइयों में से चारों का मूर्छित हो जाना तथा युद्धिष्ठिर का अनुमति पाकर उन सवालों का जवाब देना समाज के लिए,धर्म के लिए बड़ा महत्वपूर्ण रहा। उन उत्तरों से न जाने कितने अनुत्तरित प्रश्नों को राह दिखाया यह तो सर्वविदित ही है। अंत में पाँच गाँव ही तो माँग रहे थे पांडव नहीं मिला तो महाभारत हुआ। यक़ीनन उस वक्त माँगने को इतना महत्व दिया जाता रहा होगा कि माँगने मात्र से महाभारत जैसी घटना हुई।
 माँगना तो लगातार जारी है पर देने की चेतना में लगातार ह्रास हुआ है। आज इसकी चर्चा तक करना मानो कोई असभ्यता जैसी चीज हो गयी है। सारा समाज अपने बच्चों को भीख न देने का जो पाठ एक तर्क के साथ पढ़ा रहा है ,वह बड़ा खतरनाक है। उन्हें सिखाया जा रहा है कि पहले दिन ही अगर इनको भीख न मिलता तो आज ये सड़क पर भीख न माँग रहे होतें। भूख तो मिटेगी भीख से न सही हत्या से मिटेगी,चोरी से मिटेगी नहीं तो खुद मर कर मिटेगी पर मिटेगी जरूर।यह बड़ा विचारणीय है कि कभी किसी भिखारी ने भीख के लिए कोई दलील इतिहास में दर्ज नहीं की। अगर दिया भी होगा तो उस अभाग्य को कौन संचय करें ? कौन उसे अपने पूजा के स्थान में रख कर स्तुतिगान करे। वैसे हमारी परम्परा ने न जाने किस-किस से भीख माँगा है। सूर्य-चन्द्रमा से लेकर गढ़ही-तालाब तक और दिया भी है ह्रदय खोल कर हमारे उन सनातनीय पुरखों नें।
हम क्यों आज न देने के पाठ को इतना महत्वपूर्ण मान रहे हैं ? इस पर बहस जरुरी है। कभी-कभी तो ऐस लगता है कि मेरी आत्मा उनके पक्ष में खड़ा होने के लिए लगातार मुझसे भीख माँग रही है। ऐसा अनुभव होता है कि मैं कोई अपराध कर रहा हूँ भीख न माँग कर उनके लिए या उनके पक्ष में न खड़ा होने के लिए। मैं न सही कोई और खड़ा हो ही जायेगा उन्ही में से  क्योंकि उनके पास कोई चौथे द्वार के बाद चुप हो जाने का शास्त्र नहीं है |
(अप्रमेय )


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