मुद्रा प्रयोग


तंत्र के प्राचीनतम विधाओं में से एक मुद्रा विज्ञान हमेशा से एक जटिल और अप्रचलित विधा रहा है।  इसके  कई कारण हैं प्रथम तो यह कि भाषा के विकास के पूर्व मुद्राओं का प्रयोग अपनी बात को समझाने के लिए प्रयुक्त किया जाता था।  जैसे-जैसे भाषा का विकास होता गया वैसे-वैसे मुद्राओं का लोप होता गया । ये सहज भी मालूम पड़ता है और मनुष्यों की प्रकृति का ये स्वाभाविक गुड़ भी है की सरल व्यवस्था मिल जाने पर वह पुरानी चीजों को भूल जाता है। मुद्रा और भाषा एक दूसरे के साथ ऐसे घुले मिले हैं कि उनको अलग कर के देख पाना अतीव दुरूह है। भाषा अपने विकास में हजारो साल की यात्रा समेटे रहती है और निरंतर नए आयामों को जोड़ते रहती है इस क्रम में वह विभिन्न आयामों का समावेश करती है जिसमें मनुष्यों के मनोभावों को प्रकट करने में जो कुछ उसके सामने प्रकट-अप्रकट रूप से प्रभावित करता है उसका वह अपनी आवाज के माध्यम से तथा अपने संपूर्ण शरीर के माध्यम से अनुकरण कर उनको व्यक्त करती है ।  मुद्राओ का विकास भारत में ही नहीं अपितु दुनिया की हर संस्कृति में अपने-अपने ढंग से हुआ किन्तु भारत में उसका विकास भाषा के स्तर से कही ज्यादे आध्यात्मिक स्तर पर हुआ।भारत का संपर्क तिब्बत से अत्यंत प्राचीन काल से रहा है मुद्राओं का प्रयोग वहां भी आज तक विशेष ढंग से अनुशाषित किया जाता है, वर्तमान में तिब्बत में जो लामा धर्म है वह भारत के ही आचार्य पद्म संभव का ही क्रिया-विशेष का रूपांतरित रूप है जिसे तब्बती लामारिन पोचे कहते हैं।इतिहास में यह बात देखने में आती है कि तिब्बत के राजा ने पद्म संभव को अपने देश में प्राकृतिक आपदा को रोकने हेतु विशेष आमंत्रण भिजवाया था। पद्म संभव ने तंत्र के प्रयोग से वहां की विपदा का निवारण भी किया था। ऐसा कहा जाता है कि आज भी व्रजयान संप्रदाय की कई शाखाएं तिब्बत में मौजूद हैं। यह शाखाएं पद्म संभव के द्वारा ही पोषित और फलित हुई।
भारत में सभी ज्ञान को वॆदो से उदभूत कहाँ जाता है. विशुद्ध वेदों के आदि आचार्य मुद्राओं के प्रचलित आज के तांत्रिक स्वरुप को इस रूप में नहीं स्वीकार करते किन्तु कुछ वैषणव् तांत्रिक वेदों से भी इन मुद्राओं को निकाल कर अपने ईष्ट देवता को समर्पित करने में नहीं चूकते।ऋग्वेद  में एक जगह लोपा मुद्रा के विषय में वर्णन प्राप्त होता है व्याकरण के सूत्र से अगर देखा जय तो लोप शब्द रोपने में प्रयुक्त किया जा सकता है जैसे अपने इष्ट को रोपने के माध्यम से मुद्राओं का प्रदर्शन करना किन्तु वेदों में उस लोपा मुद्रा को एक कवयित्री रूप में बताया गया है संभवतया यह अपने काव्य भावनाओं को अति सूक्ष्मतम रूप में मुद्राओं से प्रदर्शित करती रहीं हों।वतर्मान समय में आगम-निगम विभिन्न शाखाओं में मुद्राओं का प्रयोग नितांत गोपनीय स्तर पर साधकों द्वारा किया जाता है। गायत्री उपासना में २४ मुद्राओं का विशेष प्रयोग सर्वविदित है इसके अतिरिक्त श्री उपासना में मुद्राओं और उनसे सम्बंधित मंत्रो का विशेष प्रयोजन किया जाता है। नाथ संप्रदाय में मुद्राओं का अलग विधान कहा गया है। हठ योग में अनेक आसन के साथ मुद्राओं का भी अभ्यास बड़े गोपनीय ढंग से किया जाता है. इनके तंत्रों में विशेष प्रकार के मुद्राओं का चलन है जैसे चितासन,शवासन,मुंडासन इत्यादि. इनका प्रयोग भय को जीतने के लिए किया जाता है। हठ योग में मुद्रा एक प्रकार की शारीरिक अवस्था है जिसके माध्यम से अग्नि,जल और वायु का सामंजस्य स्थापित किया जाता है।
हिरण्य संहिता में अनेक प्रकार की मुद्राओं की चर्चा प्राप्त होती है इनमें से कुछ कुंडली योग के लिए महत्वपूर्ण है, जैसे सिद्धासन में योगिनी मुद्रा, यह आसन के साथ-साथ ध्यान का भी एक प्रयोग है. इसी प्रकार ध्यान और आसन से सम्बंधित काकिनी मुद्रा,अश्वनी मुद्रा,शाम्भवी मुद्रा इत्यादि हैं. ध्यान प्रक्रियां में १६ प्रकार के ध्यान और उनसे सम्बंधित १६ मुद्राएँ होती हैं।
बहुत विस्तार में न जाते हुए मोटे स्तर पर हमें यह समझ लेना चाहिए कि मुद्राओ का प्रयोग विशुद्ध शारीरिक योग के प्रयोग में तथा कला के अंतर्मुखी तत्वों के उजागर करने से भी हुआ। योग के अंतर्गत शारीरिक व्यायाम जिसमें समस्त शरीर के अंगो का एक विशेष प्रयोग कर के उसे शरीर के लिए जहाँ उपयोगी बनाया गया वहीं कला जगत में इसका प्रयोग भावो को आकृति देने में किया गया । व्यायाम से कही ज्यादा सूक्ष्म कला जगत ने इसका प्रयोग बहुत गहरे अर्थ में किया। नृत्य की समूर्ण व्यवस्था ही मुद्रा विज्ञान पर अवलम्बित है परन्तु दुर्भाग्य से आज इसका प्रयोग बहुत सतही स्तर पर रह गया है । कुछ पारंपरिक शास्त्रीय विधाओं में इसका उपयोग आज भी देखा जा सकता है । मूर्ति कला में परंपरा से इसका निर्वहन होता रहा है जिसका उदहारण भारत में वो तमाम मंदिर हैं जो आज भी मील का पत्थर साबित हो रहे हैं। शास्त्रीय संगीत में रागों के प्रस्तुतिकरण में मुद्राओं का प्रयोग ध्वनि के विशेष प्रयोग द्वारा किया जाता है । रागों का  स्वर विशेष के माध्यम से प्रयोग में सूक्ष्म मुद्रा का प्रयोग अति कुशल साधक गायक-वादक करते रहे हैं जिसमे स्वर सन्निवेश मुद्रा, लय सन्निवेश मुद्रा और बहुत गहरे में भाव मुद्रा का प्रयोग किया जाता रहा है। मोटे स्तर पर इसे संस्कृत के शब्द "काकु" के माध्यम से समझा गया है। मुद्राओ के और अधिक गहरे में प्रवेश से तंत्र की शुरुवात होती है जहाँ स्थूल जगत का स्वांस केंद्र न हो कर प्राण केंद्र हो जाता है । हम जो स्वांस लेते हैं वो महज कार्बनडाई आक्साइड इत्यादि न हो कर कुछ और भी है जिसे तांत्रिको ने प्राण की संज्ञा दी है और ये बड़े आश्चर्य की बात है कि केवल नासापुटों से ही इसका आगमन और बहिर्गमन नहीं होता अपितु शारीर के समस्त रॊम-छिद्रों से होता है। इस प्राण तत्त्व का निर्माण पृथ्वी,जल अग्नि,वायु और आकाश से कहा गया है और मनुष्य इसी के समिश्रण का एक अदभुत रूपांतरण है । इस रूपांतरण के गहनतम स्वरुप का साक्षात्कार अलग-अलग विधियों से किया जाता रहा है जिसमे योग की विभिन्न शैलियों का विकास हुआ । भावो के विभिन्न तलों की व्याख्या हुई और न जाने कितने अनगिनत विचारो का समावेश हुआ। मुद्रा विज्ञान उस तत्व को समझने का सबसे वैज्ञानिक खोजो में से एक अद्भुत उपाय रहा है। विज्ञान  की भाषा में इसे परम आध्यात्मिक टेक्निकल कुंजी के रूप में देखा जा सकता है और ये कहना असंगत न होगा की मुद्रा विज्ञान का ही स्थूल विकास आज हम टेक्नोलॉजी के बहुत से रूपों में देख रहे हैं जिसका एक उदहारण मोबाइल है। एक निश्चित सिग्नल के माध्यमों से दो डिवाइस के मध्य संपर्क स्थापित करने के विज्ञान से आज पूरा विश्व उसका लाभ उठा रहा है। अनंत जगत जिसका एक रूप हम भी है उसे अपने इस शारीर के डिवाइस से जोड़ने का प्रयास मुद्रा विज्ञान से संभव है।  पांच अंगुलियाँ एक ऐसी विलक्षण डिवाइस है जिनके खास प्रयोग से हम उस अनंत डिवाइस के साथ ताल-मेल बिठा सकते हैं ।
(अप्रमेय )

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