वह कुत्ता .... मेरे कारण खो गया


इतनी पीड़ा .... कैसे हो सकती है ? ऐसा पहले तो नहीं था। यह किस सृजन का विकास है ? किस भाव भूमि का तल है ? यह कौन सी यात्रा है ? जो कुछ भी है आज मैं उसे उसी तरह निकाल देना चाहता हूँ, इस भय के साथ कि कहीं वह मेरे अंतस में लुप्त न हो जाये। 
मेरे जैसे अकिंचन की इस महाकाल के सामने क्या बिसात है पर फिर भी मैं इस गंध को निकाल देना चाहता हूँ  क्यूँकि इसकी पीड़ा  मेरे गर्भ की पीड़ा है जिसको मैंने अपने अन्दर बहुत डर-डर कर पोषित किया है।आज वह जन्म लेने को तैयार है और मुझे  इस बात की कोई फ़िक्र नहीं की लोग क्या कहेंगे।मैं अपने उस अपराध को समूचे संस्कृति के आँगन में खेलने देना चाहता हूँ और इस के लिए मुझे जो कुछ भी यत्न का दंड मिले मैं भोगने के लिए तैयार हूँ।
उसका कोई दोष नहीं था । मेरी असीम करुणा ने उसके गले से वह पट्टा उतार दिया था। पूरी रात उसके कराहने की आवाज मुझे सुनाई पड़ी थी। उस दिन मुझे कहीं ऐसा अनुभव हुआ था कि इस बंधन को अब मुक्त कर दिया जाना चाहिए, तुम्हारे इन बंधे पट्टों से। लेकिन उस दिन तुम्हारी अदालत में मेरे पास ऐसा कोई पर्याप्त आधार नहीं था जिसके सहारे मैं खड़ा हो पाता और शायद इसीलिए ही उस दिन मैं चुप रह गया था।आज मैं अपने इस विश्वास के पक्ष के साथ खड़ा हूँ।मैं खड़ा हूँ आज अपने उस अतीत के प्रश्न को लेकर जिसे मैं कभी पूछ नहीं पाया था काश ... उन दिनों मेरे पास तुमसे पूछने के लिए शब्द होतें तो शायद तुम्हे खोज लिया जाता। मैं बता पाता की इंटरवल तक तुम वहीं थे मेरे स्कूल के गेट के बाहर मेरी राह ताकते हुए। मझे आज भी याद है तुम्हारा चेहरा जो कि गेट के बाहर उस स्कूल की इमारत के अन्दर मुझे खोज लेना चाह रहा था। इतनी बड़ी सजा ...? तुम्हे अपने रिक्शे के पीछे बिस्कुट देकर बुलाने के लिए। मुझे याद है वह दिन। वह  सलाखों सा  स्कूल का गेट। अन्दर मैं एक अपराधी सा जिसे बाहर नहीं जाने दिया गया था ।उस दिन के बाद जैसे रोज  मुझे आदत सी पड़ गयी थी कि अभी बोला जायेगा की वह मिल गया, वहां बागीचे के अन्दर फूलों के पास कि माली ने उसे पकड़ रखा है। या फिर वहां उस पूराने मकान के बाहर कुँए के अन्दर डूबता-तैरता हुआ।मैं हर सुबह पढ़ लेना चाहता था अखबारों का कतरा-कतरा  कि कहीं उसका चेहरा इन शब्दों के बीच से झाँक न रहा हो पर किसी भी पत्रकार की नजर नहीं पड़ी होगी शायद उसपर।
मैं उसे किसी बन्दर वाले की साइकल के करिअर के पीछे देख लेना चाहता था। घर में आये किसी साधू बाबा से उसके बारे में पूछ लेना चाहता था।किसी भविष्य पुराण में उसकी चर्चा खोज लेना चाहता था,  उसके फंदे आज तक मेरे गले को कसे हुए हैं.
मैं आज उन सब के सामने यह बात स्वीकार करता हूँ  की मेरे नाते ही वह खो गया था। मुझे इसके लिए अगर अब प्रत्यक्ष रूप से  पुनः दंड दिया जाय तो मैं इसे  सहर्ष स्वीकार कर लूँगा। किन्तु मैं अब उन सबके लिए प्रश्न उठाना चाहता हूँ जो कहीं तुम इसके कारण तो नहीं जिसके भय की वजह से मैं चुप रह गया था । 
वह उसी छोटे से शहर में खो गया था। कोई तर्क नहीं था किसी के पास उस दिन उस शहर को छोटा कहने का। वह मेरा पालतू नहीं था पर फिर भी उसका प्रेम मेरे अन्दर पल चुका था। बहुत गहरे में कहीं वह मेरे बाल प्रश्नों का मूक उत्तर था जिसको मैं तुम लोगों के बीच कभी न पा सका. वह मेरा पालतू नहीं था और यही बाधा बना उस दिन, अन्यथा मैं उसे बिस्कुट न देता।
वह मेरे घर में नहीं बंधता था और उसके भोजन का कटोरा भी मेरे बरामदे में नहीं रखा होता था ...यही बाधा बना उस दिन। किसने दी थे यह प्रेरणा मुझे कि मेरे रिक्शे के पीछे वह मुक्त है मेरे और अपने बरामदे के कटोरे से। उस चहारदिवारी से जिसमें सूरज को भी उन्होंने अलग-अलग हिस्सों  में बांटरखा है । जिसमें रात भी अपनी अँधेरी चादर को अलग-अलग हिस्सों में फहराती है.
वह उनके अपने हिस्से का था और इसीलिये उन्होंने यह किसी से पूछने की जहमत न उठाई की वह कहाँ जा सकता है। मैं बताना चाहता था की वह कहाँ मिल सकता है पर यह बताना मेरे हिस्से में अभी उस दिन की तारिख तक तय नहीं किया था सब लोंगो ने। आज भी वैसे मेरे पास मेरा कोई हिस्सा नहीं है पर अपने हिस्से को बनाने की एक अजीब अतृप्त लालसा है।
  वह मेरे नाते खो गया और उस एक ग्लानी ने मुझे बहुत परेशान किया। आज भी कई सालों के बीत जाने के बाद भी आजतक करते आ रहा हूँ । जिस दिन वह खो गया था उसके अगले दिन स्कूल जाते वक्त अपने रिक्शे में बैठे-बैठे मैंने शुरू कर दी थी वह तालाश  पर वह मिला नहीं और बहुत बाद तक जब तक मैं स्कूल से निकल नहीं गया तब तक न वह मुझे दिखा. उसके बाद स्कूल के जाने कितने इंटरवेल आए और चले गएँ पर न ही वह कभी गेट के पास आया और न ही कहीं से मुझे आवाज दी ।मेरी आँखे कब उसे उन सड़को से खोजती-खोजती अंतरात्मा में उतर गयी यह मुझे पता न चला। अन्दर कहीं अन्दर वह मौजूद था जिसे मैं छू लेना चाहता था। मैंने अन्दर एक मैदान भी देख रखा था उसके लिए जहाँ कहीं भी वह मुझे दौड़ा सकता था अपनी पूरी ताकत के साथ। पर ऐसा हुआ नहीं वह मैदान अपनी पूरी हरियाली  लिए आज भी वहां उसी तरह मौजूद है और वह केवल मुझे निहारता रहता है।
(अप्रमेय )





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