कला का तांत्रिक बोध


दुनिया के सर्वोतम कलाकृतियों का आंतरिक रहस्य -उसकी प्रकृति के गूढ़तम रहस्यों के उजागर करने के साथ आया है"
कलाकार चाहे उसे स्वर के माध्यम से उद्घाटित करे अथवा रंगों के माध्यम से जितना वह प्रकृति के अंतरतम अनुभवों को समझ पायेगा उतना ही उसकी कलाकृति बेहतर होगी | तंत्र साधना में स्वरों का प्रयोग अथवा रंगों का प्रयोग एक ख़ास ध्यान पद्धति के अंतर्गत अनुशाषित किया जाता है, जैसे सात स्वरों का प्रयोग अगर :
सा – मूलाधार
रे – स्वाधिष्ठान
ग – मणिपुर
म – अनाहत
प – विशुद्ध
ध – आज्ञा
नि – सहस्त्रार  
उपरोक्त स्वर एवं उससे सम्बंधित चक्र ध्यान पद्धति के द्वारा सम्पादित किए जाएँ तो इससे इन चक्रों को अनुभव किया जा सकता है, किन्तु यह ध्यान रहे चक्रों का अनुभव चक्रों का भेदन नहीं है| चक्रों का भेदन संगीत तंत्र के माध्यम से सापेक्ष न होकर एक अवस्था के बाद निरपेक्ष क्रिया में परिवर्तित हो जाता है | यह एक अत्यंत सूक्ष्म विज्ञान है जो किसी योग्य गुरु की कृपा से ही प्राप्त हो पाता है| भौतिक स्तर पर अगर हम केवल इन प्रश्नों के साथ अपने कला को जुड़ने का प्रयास करें कि प्रकृति की वह कौन सी वस्तु है जिसे हम इस माध्यम से उजागर कर सकते हैं तो निश्चित रूप से हमारी कला प्रस्तुति अथवा कलाकृति अत्यंत शोभनीय हो सकती है |
(अप्रमेय )

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