एक बरात ऐसी भी

आज गणपति और मंगल अपने आप को पृथ्वी पर होने की सार्थकता का अनुभव कर पा रहे थे। उन्हें सुबह-सुबह काका बनारसी जी ने दूल्हे की गाड़ी और उस पर सजावट के फूल का कार्य भार जो सौंपा था । पंडित भोला नाथ पाण्डेय का घर इत्तफाक से गोरखपुर के अच्छे मुहल्ले में था । भोला बाऊ के पिता कर्मठ स्वभाव के थें  जिसकी वजह से उनका वह घर अंग्रेजो के ज़माने में बन पाया था ।सब उन्हें शास्त्री जी के नाम से जानते थें 
भोला बाऊ अपने पिता के अनुयायी पुत्रों में से एक थे इसलिए थोड़ा बहुत कुण्डली और पत्रा वगैरह का ज्ञान भी उन्होंने ने अपने पिता से सीख लिया था। अभी हाल में ही उनके हाथ कोई काली किताब लग गयी थी जिससे वह जंतर-मंतर टोटका-टोना भी शुरू कर दिए थे, मसलन घर में आय बढ़ानी हो तो काले कुत्ते को देसी चना (विदेशी नहीं होना चाहिए,,, इ ससुरे फिरंगियों का खाना थोड़े ही देवता लोंग स्वीकार करेंगे ) और शनिवार के दिन गरम-गरम जलेबी अगर कोई जातक इन कुत्ते को खिलाता है तो उसे धन-धन्य की कमी नहीं होगी ।बनारसी बाऊ न अपने पिता के अनुयायी थे और न ही अपनी माँ के।जिंदगी की शुरुवाती दिनों में वह इनलाईटेंड हो जाना चाहते थे ओशो की तरह ,महावीर की तरह,बुद्ध की तरह लेकिन बाद में उन्हें इसका ज्ञान हुआ की वह इसके लायक नहीं अतः वे अपने भईया के भक्त हो गए । भईया (भोला बाऊ ) जो कुछ कह देते बनारसी पीछे से हाँ में हाँ मिला कर ताँता सा लगा देते और भूले भटके कहीं वाद-विवाद चल रहा हो तो अंत उसका बनारसी बाऊ करते अपनी या उसकी बनियान फाड़ के। भोला बाऊ के घर वर्षों से कोई शादी नहीं पड़ी थी। बनारसी की जब शादी होने वाली थी तो वह मार कर लिए थे अपने होने वाले ससुर के साथ यह कह कर की आने वाले दिनों का मैं वह संत हूँ जिसका गोड़ धरने के लिए लोग लाइन लगाएगें।बनारस का सारा पुण्य बनारसी के चरणों को मात्र छू लेने से प्राप्त हो जायेगा।इस घटना के कुछ ही दिनों बाद शास्त्री जी का निधन हो गया था। कुछ लोगों का कहना था कि बनारसी के संत होने के गम को न झेल पाने के कारण शास्त्री जी का हार्ट-अटैक हो गया था।बनारसी इस बात को जानते थे की ऐसा कुछ भी नहीं है, पिता जी की मृत्यु उनकी अपनी सहज मृत्यु थी किन्तु अब कौन अपने नात-बात को समझाए।पंडित भोला नाथ पाण्डेय के चार पुत्र हैं।पहला अखंड, दूसरा मंगल ,तीसरा गणपति और चौथा डिटू। डिटू की अभी फीस माफ़ है वह मात्र पांच साल का है। मंगल और गणपति तेईस और पचीस वर्ष के हैं। अखंड की आज बरात जानी है। बड़ी मुश्किल से तो उम्र के पैतीसवें में शादी तय हो पाई। जानकी (भोला बाऊ की पत्नी ) स्वाभाव से नहीं अपने कर्मो से जानकी की तरह दिखती हैं। हमेशा मुंह आवाक मुद्रा को ग्रहण किए रहता है। दुआरे पर खर-पतवार से ले कर तुलसी मईया, बेल पाता सबको चन्दन-धूप दिखा आती हैं।
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आज अखंड, अखंड मुद्रा में सुबह से ही अपने घर में ही खोली परचून की दुकान पर खड़ा है। तभी बगलगीर दिवाकर जी का सुपुत्र चुन्नू उसकी दूकान पर चढ़ता है।
चुन्नू- अरे अखंड भईया ई का दूकान के सामने खड़े हो .... ? जरा दो किलो खुला आटा देना।
अखंड - आटा नहीं है।
चुन्नू- देख तो लो ग्राहक को नाराज नहीं करते।
अखंड- खुस कर देंगे तो का मलाई मिल जाएगी।
चुन्नू- अरे मालूम है आज तोहार शादी है .... लेकिन ....
अखंड- शादी है तो ...? चले आते हैं .. आपन बियाह होई तब देखब बेटा तुके।
इधर जानकी माता सुबह से ही दुआरे से लेकर ओसारे तक आठ-दस बार पूरा घर धो चुकी हैं। इतनी धुलाई की मानो आज गणेश जी का स्वर्ग से आगमन होगा और वह बरात में सहबाला होंगे।
इधर भोला बाऊ दुनिया का सारा भोझ लिए बहार से अन्दर आते हैं और बिछ्ला कर गिर पड़ते हैं।
भोला बाऊ - (चिल्लाते हुए ) इतना बिछलहर ....... सत्यानाश हो तुम्हारा अभी तो मेरी अर्थी उठ जाती बरात तो शाम को जाएगी ।
भोला बाऊ- ऐ हई केकर लवंडा है इहा रो रहा है ?
जानकी- लईका नहीं रावेगा तो क्या आप रावेंगे .... इतना चटकाने की क्या जरुरत है ?
भोला बाऊ- जेकर लईका हो ऊ संभारे एको ......
भोला बाऊ- (आवाज लगते हुए ) बनारसी ए बनारसी , केकरे बिल में घुसल बाटा हो....।
तभी बनारसी उपर से दौड़ते हुए नीचे आते हैं। थोड़ा गंभीरता से जिम्मेदारी को समझते हुए बड़े अदब से बिना कुछ बोले खड़े हो जाते हैं।
भोला बाऊ- ऊ फुटकर पैसा करवा लेहला ? सारे पंडितो को इसकी भी लज्जा नहीं आएगी कि हमारा भी काम ब्याह-शादी करवाना है थोड़ा बिरादरी का खयाल करें।
पुनः- और दूल्हा बाऊ के उड़न खटोला का क्या हुआ ?
बनारसी-ऊ मंगल और गणपति को जिम्मेदारी दिया है।
तभी दोनों भाई सलमान खान छाप चश्मा पहने हाजिर ही हो जाते हैं।
बनारसी-मोटर बुक हो गयी ?
गणपति- हाँ बात चल रही है ..... मेरे दोस्त के चाचा से .. उनका ट्रेवल एजंसी का काम है .... अभी फ़ोन आने वाला ही होगा।
बनारसी- बात चल रही है जैसे शिखर सम्मलेन होने वाला है .... (गुस्साते हुए)  तीन घंटा बचल बा बरात जाने को .... और सुना हई सलमान खान के अपने आंखी से उतार के हमरे सामने आवल करीं ... नायी तै अंखिया फोर देबे।  
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इसी बीच बनारसी बाऊ को पूजा के फूल और जो मोटर पर सजने वाले फूल थे उसकी भी याद आ गई। बड़ी अज्ञात और विस्मय भरी आँखों से उन्होंने उन दोनों से इस विषय पर पूछा।
गणपति और मंगल के पुराने दोस्त के घर के बगल में फूल मंडी है I इन दोनों ने इस काम को भी अपने दोस्त के हवाले कर के अपनी पैंट-कमीज जो बरात में पहन कर चलनी थी उसे खरीदने चले गए थे। लेकिन कुछ समझ में न आ पाने के कारण वह लौट आए थे। उन्हें जल्दबाजी थी बाजार जाने की और सब काम ख़त्म कर के घर लौटने की। अब क्या करे क्या न करे की उहापोह के बीच फसे बिचारे मंगल के मुह से निकल पड़ा ....... हम जब लौट रहे थे तो फूल मंडी में फूल वाला निकल ही रहा था। अब पहुंचता ही होगा। हम जा कर देखते हैं।
बनारसी- हम नहीं केवल एक जाओ (चटकते हुए)
मंगल अपने भाई को कुछ इशारा कर के बहार स्कूटर को किक मारने लगा। सामने के घर में श्रीवास्तव जी की बेटी इत्तफ़ाक से अपने बराम्दे में खड़ी थी। दोनों भाइयों के बीच इशारों में यही फैसला हुआ था कि थोड़े देर स्कूटर खराब होने का बहाना मार कर स्टार्ट न होने देना जब बनारसी काका कहीं इधर-उधर चले जाएँगे तो मौका देखते ही हम लोग खिसक लेंगे।
श्रीवास्तव जी की बेटी के सामने मंगल पहली बार स्कूटर चलाने जा रहा था वह भी ब्याह में पाठक जी से काम-काज के लिए ली गयी थी मंगल ने आव न देखा ताव पहले किक में ही चेतक को स्टार्ट कर दिया और दोगने रफ़्तार से उसे भगा दिया।
मंगल- (मन में सोचता हुआ ) पता नहीं उसने देखा होगा या नहीं ....चलो लौटते है फिर भाव बनाते हैं।
लौटते वक्त उसने यह नहीं देखा की गणपति नल के चबूतरे पर खड़ा उसे निहार रहा है। जैसे ही वह निकट पहुंचता है गणपति चिल्लाते हुए उसे पुकारता है ...... अबे चोरवा ...रुक साले और वह उसके स्कूटर के पीछे वाले सीट पर लद्द से कूद कर बैठ जाता है।
श्रीवास्तव जी की बेटी अभी-अभी दिल्ली से एम. बी. बी. एस. की कोचिंग कर के लौटी है। वह बात करते हुए बीच-बीच में अंग्रेजी के कठिन-कठिन शब्द बोलती है। वह अंग्रेजी जैसे-जैसे बोलती जाती है वैसे-वैसे मोहल्ले वालों की बोली गले के अन्दर कहीं दबती चली जाती है। आज-कल रात हो दिन हो बिना किसी नियम के उसकी चर्चा सभी के घरों में अपना झंडा गाड़े हुए है और बिचारे मोहल्ले वालों के उन तमाम लड़को की फजीहत बेमतलब हो जाती है।
खैर मंगल की लव स्टोरी बिना शुरू हुए ही गणपति के गाली के साथ ख़त्म हो जाती है। मंगल इस प्रकरण से कुछ पल दुखी सा तो रहा पर वह उसे पान की दूकान तक गुटखा फाड़ते हुए भूल गया।
शाम के साढ़े चार बज चुके थे। दोनों को मोटर,फूल-माला अपनी शर्ट-पैंट सब काम ख़त्म कर के घर भी लौटना था। सबसे पहले कहाँ जाएँ इस बात को दोनों भाई तय नहीं कर पा रहे थे। खैर दोनों फूल वाले के पास पहुँचते हैं।
मंगल- नंदू भाई कहाँ हैं ? (एक नौ साल के लड़के से पूछते हुए )


लड़का- पता नहीं।
मंगल- अरे... फूल-माला लेनी है कौन देगा ?
लड़का-हम इहाँ बैठे हैं तो  …. तो  प्रधानमंत्री थोड़े फूल देने आएंगे ?
गणपति- (समझदारी से )इ जो लड़ी गेंदा की लटकाय हो उसका क्या दाम लगाओगे ?
लड़का- पैतीस रुपया केवल ..।
मंगल-भारत सरकार के कौनो गवर्नर हो का .... केवल-फेवल नहीं .... एक लड़ी का बीस रुपया ही देंगे बोलो ?
लड़का- चलो ले जाओ ...तुहूँ का याद करबा।
तभी गणपति अचानक शांत हो जाता है। उसे यह समझ में नहीं आता कि लड़का महज बीस रुपये में ही कैसे राजी हो गया। वह मन में हिसाब लगता है कि आगे बोनट पर कम से कम तीन लड़ियो की एक लाइन बनेगी और इस हिसाब से तीन लाइन तो बोनट का हुआ मतलब तीन तिरिक्का नौ मतलब बीस गुड़े नौ। और इसी हिसाब से मोटर की छत पर भी मतलब बीस गुड़े नौ और इसी तरह मोटर के पीछे भी .... कुल हिसाब बना 20 गुड़े 9 ,20 गुड़े 9 ,20 गुड़े 9 कुल पाँच सौ चालीस रुपया और दो फालतू मतलब पाँच सौ अस्सी। इसके बाद वह एक गुलाब की कीमत पूछता है। लड़का फट से दस रुपया बता देता है । गणपति इस पर नाराज हो जाता है
गणपति- अबे पडरौना के बौउक समझले बाटे का बे ... फुलअंडी साले ... पाँच रूपया में देना है तो बताओ
लड़का थोड़ा नाराज होता हुआ राजी हो जाता है और कहता है बताओ कितने गिन दूँ ।
गणपति तपाक से एक छोटे कागज पर पूरा हिसाब लिख कर उसे दे देता है और तीन सौ रुपये का एडवांस देते हुए कहता है दस बीस गुलाब के फूल भी रख लेना लौट कर आधे घंटे में हम वापस आते हैं।
इधर नयी एम्बैस्डर और ड्राइवर का अलग से खाना-पानी और लौटानी का खर्चा-हिसाब तय कर उसे फूल वाले का पता लिखवा कर वे निकल पड़ते हैं।
जानकी बड़ी मुश्किलों के बाद भोला बाऊ से अपने दोनों बच्चों के कपड़ो के लिए पाँच-पाँच सौ रुपए भोला बाऊ निकलवा पाई थी और अपने चुरौंधे पैसों में दो-दो सौ रुपये अतिरिक्त मंगल तथा गणपति को दिया था I कुल सात-सात सौ रुपए में उन्हें खरीददारी करनी थी। कई दुकानों में कपड़ा देखने के बाद वह दोनों इस फैसले पर पहुंचाते हैं कि पैंट कैसी भी हो चलेगी पर बुसैट की कालर फ़िल्मी हीरो की तरह थोड़ी बड़ी-बड़ी और कड़कदार होनी चाहिए। उसी पर सबसे पहले लोंगो की नजर पड़ती है, ऐसा लगना चाहिए जैसे कंधे पर दो गिद्धों को बैठा रखा हो।
खैर किसी तरह वे अपनी खरीददारी को विराम देते हैं। इधर घर पर बैंड वाले शाम पांच बजे से ही अपना भोंपा लेकर टेरमटेर पीसे हुए थे। भोंपा वालों का भी अपना एक ऊसूल होता है। पहला गाना उस्ताद ओम जय जगदीश हरे से ही शुरू करेंगे और उसके बाद जो मन में आ जाये मसलन आज मेरे यार की शादी है , नागिन धुन टों ओं ओ ओं ऑ ओ आ ओं .......।  1 2 3 4 पी ...तू चीज बड़ी है मस्त-मस्त इत्यादि।
इन बैंड वालों ने फ़िल्मी जगत के एक महान हस्ती का कैरियर ही डूबा डाला। इतना उम्दा गाना जो वीर रस का ऐसा जीवित उधाहरण है की अगर उसे कहीं प्रयोग के तौर पर युद्ध में जाते हमारे सैनिकों को सुना दिया जाए तो दुश्मन का तो भगवान ही मालिक। पर हुआ उल्टा। लवंडो की जब दारू बरात में अपने पूरे शबाब पर होती है तब ये गाना देखते ही बनता है। इस एक गाने पे हमारे देश की सरकार चाहती तो गाने बनाने वाले को भारत-रत्न दे देती पर बिचारे मंत्रियो का क्या कसूर उनका भी तो कभी न कभी बरात में इस गाने पर गोड़ कचराया ही होगा।
अखंड बाबू भोंपा की आवाज सुनते ही रोमांचित हो उठते हैं। वह सबसे पहले नाहा धो कर कोट-टाई पहन बैण्ड बाजों वाले के पास टहलने लगते हैं। उनकी चिंता बढ़ती जा रही थी कि कहीं लेट न हो जाए, जैसा की मंटू पाड़े की बरात में हुआ था। बरात लेट पहुंची थी बारातियों के स्वागत के खाने-पीने का आधे से ज्यादा सामान घराती ही दबा गए थे। इसी बात को लेकर मार हो गया था। बीच-बचाव करने गए मंटू पाड़े को भी दो-चार तमाचा धर दिया गया था। उसके बाद तो बिचारे मन्टू पाड़े का नाम ही बदल गया सब उसे लतखोरवा ही बुलाते हैं।
शाम के 6 बज चुके थे। भोंपा की आवाज के साथ-साथ बाराती अब घर पर एकत्रित होने लगे थे। उसी में बच्चो की इधर-उधर की दौड़ किसी को चैन से टिकने नहीं दे रही थी। कोई भी कमरा या कोई भी कोना ऐसा नहीं बचा था जहाँ औरते तैयार न हो रही हों। इसी में बनारसी बाऊ गाँधी छाप बनियान पहने अपने नहाने की जगह नहीं तय कर पा रहे थें, कि अचानक भोला भईया की आवाज बाहर से हवा को धकियाते हुए अन्दर आती है ..।
कहाँ लुकाइल बाटा हो .... ए बनारसी .....
नहाने का विचार ताख पर रख कर बनारसी बाऊ सीधे भागते हुए अपने भईया के सामने खड़े हो जाते हैं।
भोला पाण्डेय -इ मेहरारुओं के बीच अंदरवा कहाँ घुसल बाटा ? अभी तक दूल्हे की गाड़ी नहीं आई , टाइम निकलता जा रहा है, फूल वाला आ गया है, यमराज की तरह मेरे छाती पर सवार हो गया है. ..........

अभी दोनों भाइयों का संवाद चल ही रहा था कि फूल वाला बीच में टपक पड़ता है।
फूल वाला-- बाउजी थोड़ा जल्दी करें आप ....हमें बहुत काम है।
बनारसी - अरे भाई मोटर आ रही होगी थोडा सब्र करो।
फूल वाला - भईया इहा सब्र करेंगे तो ऊहाँ लात खाएँगे।
भोला पाण्डेय -  इ दोनों चू ......  कहा रह गए ? खोजा  एन्हन  के।
तभी किसी ने बीच में आवाज़ दी कि गणपति अन्दर तैयार  हो रहा है और मंगल शायद बाहर ही है।
बहरहाल किसी तरह मोटर आ जाती है और जल्दी-जल्दी उसे धुल कर उसका फूलों से श्रृंगार कर दिया जाता है।
नात,रिश्तेदारों ,पास-पड़ोस से मांग कर तथा एकाध किराए पर उठाई गाड़िया कुल इतनी हो जाती हैं कि उनकी गिनती बड़े आदमियों के बरात जैसे की जा सके।
लगभग सभी लोग अब बरात जाने के लिए तैयार थें ,कुछ लोग जो बचे थें वे जल्दी-जल्दी तैयार हो रहे थें। अफरा-तफरी का ऐसा धुआं उठ रहा था मानो युद्ध की भूमि से धूल उड़ती हो।
इसी बीच जानकी देवी और शास्त्री जी में कुछ कहा-सुनी हो जाती है। जानकी देवी का कहना था कि बरात में कुछ लड़कियां भी जाना चाहती हैं पर भोला बाऊ अपनी खानदान और परम्पराओं की मर्यादा से जकड़े हुए थे। खैर कुछ लोगों के समझाने से की जमाना बदल रहा है भोला बाऊ मान जाते हैं।
दूल्हे की मोटर में तीन-चार लड़कियां,नाई सहबाला, डिटू सवार हो जाते हैं I किसी तरह सभी बाराती जिसको जो गाड़ी मिलती है उस पर लद-फद कर निकल पड़ते हैं।
इधर एक मिनी बस में कुछ लवंडे-लफाड़ी,सभी बैंड बाजे वाले तथा बीच में फसे बिचारे फूफा जी सवार हो कर निकलते हैं। बस में दो-चार लवंडे जिनके मुंह से दारू की महक आ रही थी वह बार-बार "नथुनिये पर गोली मारे" धुन पर अन्दर बस में डिस्को डांस कर रहे थे। फूफा जी के मटके के कुरता का भुर्ता बनाते ये सहराती लवंडे मानो देश की संस्कृति को बर्बाद करने के लिए पैदा हुए हैं ... ऐसा फूफा जी ने मन में बड़बड़ाते हुए बस के ड्राईवर को चिल्ला कर गाड़ी को रोकने के लिए कहा। कौन किसकी सुनता है। ड्राईवर ने गाड़ी नहीं रोकी अंततः जनवासा पर ही गाड़ी रुकती है। वहां बाकी बचे लोग भी पहुँच रहे थे। जनवासा किसी छोटे से पाठशाला में स्थित था जिसका नाम  "के. जी. के. एम." अर्थात कस्तूरबा गाँधी कन्या महाविद्यालय है। फूफा जी बस से उतारते ही  स्कूल पर ही बरस पड़ते हैं। लवंडे-लफाड़ी की अघोर कुकृत्य से उपजा क्रोध यहाँ बिचारी कस्तूरबा जी को इतिहास के पन्नो से खीच लता है।
फूफा जी- (चिढ़ते हुए) गाँधी की मुक्ति की यही बाधक थीं .... वरना गाँधी को आज केवल आज राष्ट्र-पिता ही नहीं कहा जाता ... बुद्ध और क्राइष्ट  सबको कबका धकिया के किनारे कर दिए होते।
ससुरा न हम शादी के चक्कर में फसे होते और न आज हमें यह दिन देखना पड़ता।
पुनः बड़बड़ाते हुए- ऊंची दूकान फीका पकवान ...के. जी. के. एम. अइसन लगत बा जैसे कोनो फारन के स्कूल। पानी की व्यवस्था तो कही नजर नहीं आ रही है।
तभी कोई लड़का उनसे बोल पड़ता है .... पानी क्या होगा बाऊ जी कोलड्रिंक पीजिये कोलड्रिंक। वह देखिये शामियाने के अन्दर ...पूरी व्यवस्था है।
फूफा जी- व्यवस्था के माँ की ............... मजा ले रहे हो तुम्हारे जैसे मेरे चार-चार लावंडे हैं।
लड़का- थोड़ा गुस्साते हुए ..तभी तो देश का यह हाल है।
फूफा जी- मतलब ?
लड़का- मतलबे मालूम होता तो चार-चार लावंडे थोड़े ही होते और इतना कह कर वह चल पड़ता है।
के. जी. के. एम में कुल आठ कमरे थे, जिसमें की एक कक्ष प्रधानाचार्य का है। केवल प्रधानाचार्य का कमरा छोड़ कर बाकी सभी कमरे खुले हुए थे सभी में दरी बिछा दी गयी थी और दरियों के ऊपर सफ़ेद चादर। एक कमरे में गद्दा भी था जिसके ऊपर थोड़ी बेहतर चादर बिछी हुई थी। बाहर कुछ प्लास्टिक की कुर्सियां लगा दी गयी थीं।
गद्दे वाले कमरे की लोंगो ने ऐसी की तैसी कर रखी थी। वह दूल्हे बाऊ के बैठने का कमरा था।
बाहर छोटे-छोटे गोलगप्पे,चाउमिन, और कोलड्रिंक के स्टालों पर लोg मक्खियों की तरह टूट पड़े थे। छोटे हो या बड़े सभी पहले ही दबा लेना चाह रहे थे। गणपति चाट के स्टाल पर खड़ा-खड़ा चार-पाँच पत्ते चट कर चुका था। उसे इतना पसीना हो रहा था जैसे वह कहीं का बधुवा मजदूर हो। मंगल उसे बार-बार समझाने की कोशिश में लगा हुआ था की वह दूल्हे का भाई है सभी की नजर हम दोनों पर ही है और यहीं पेट भर लोगे तो वहां जो लड़की के घर असली अरेंजमेंट हुआ है उसका क्या होगा ?
अखंड बाऊ की मोटर  इधर जनवासे के अन्दर पहुँच चुकी थी। घर वाले  उसे अबडा-तबड़ी में गद्दे वाले कमरे में ले जाते हैं, पर वहां का हाल बेहाल देख कर अखंड बाहर कुर्सी पर ही बैठ जाते हैं।
गद्दे पर किसी ने कोलड्रिंक गिरा दिया था और तो और नमकीन और आधी छोड़ी मीठाईयां इस तरह बिखरी पड़ी हुई थी जैसे मछली बाजार।
कैप्टन जे. सी. मलिक का लड़का जो देखने और बात-चीत में काफी एडवांस है उसका दस मिनट पहले ही अखंड से परिचय हुआ है।
बचपन में इसकी कुण्डली भोला बाऊ ने ही तैयार की थी ... वह नाराज हो जाता है।
मलिक का लड़का- यह कोई तरीका है ? दूल्हा बाहर बैठा है और कोई भी घराती नहीं है जो खोज खबर ले ... मजाक बना रखा है।
इतना कहना ही था कि ड्यूटी पर लगे कुछ लोग पूरे कमरे को झाड़-पोछ कर साफ कर देते हैं।
कमरे में अखंड बाऊ प्रवेश  कर जाते हैं।
अन्दर दो चार बुजुर्ग मलिक जी का लड़का और घरातियों में से एकाध सज्जन पुरुष बैठ जाते हैं। किसी को भी अन्दर आने नहीं दिया जा रहा था,कोलड्रिंक,मिठाइयाँ और बहुत कुछ ट्रे में सजा कर एक के बाद एक कमरे में लाया जा रहा था। अखंड बाऊ को पूरा विश्वास हो गया था कि मलिक जी का लड़का बहुत होनहार है इसको पूरे बरात में साथ ही रखेंगे।
जनवासे से बरात निकलने का समय बीतता जा रहा था। बनारसी बाऊ  जल्द से जल्द लोगों को एक जगह इकट्ठा कर देना चाहते थे पर बरात का अपना एक मनोविज्ञान होता है। सब कुछ होता है पर बिना किसी नियम से सो उसी तरह बरात निकल पड़ती है।
चार पहियों पर टंगा टीना का रथ जिसपर कैसियो वादक और एक गवैया अपनी धुन पेरना शुरू करते हैं। गवैया कभी लड़की की आवाज में तो कभी लड़के की आवाज में जो मन में आता है सो गाता है। बीच में ही गाने को कहीं भी रोक देना,कैसिओ के सारे पर्दों को एक साथ झटके में दबा कर कोई भी गाना कहीं से शुरू कर देना यह उसकी उस्तादी के प्रतीक हैं।
साथ में चल रहे ड्रम वाले और क्लार्नेट के उस्ताद को इस बात पे खुंदक आ रही थी। जब वह मस्त हो कर उसके साथ उठान पर होतें तब अचानक गवैया अपने साथी को इशारा कर देता और वह सभी सुरों को कैसिओ पर एक साथ दबा देता।
लावंडों को इससे कोई मतलब नहीं होता की क्या धुन बज रही है बस कुछ धमधमाना चाहिए और उनका शरीर टूटना चाहिए।
दूल्हे की मोटर के बोनट के सामने जो सबसे ज्यादे अपना शरीर तोड़ेगा वह दूल्हे का सबसे नजदीकी होगा .... ऐसी मान्यता है।
इधर बैंड मास्टर और रथ पर सवार गवैये के बीच गम-सुम युद्ध की शुरुवात भी हो चुकी थी। गवैया कुछ गा रहा था और बैंड वाले अपनी अलग ही धुन पिपियाये हुए थे। कुछ लोग उधर रथ के पास अपनी गोल बना कर नाच रहे थे तो कुछ लोग बैंड मास्टर के पास।
बरात धीरे-धीरे खिसक रही थी।बैंड मास्टर दूल्हे की मोटर के पास अपना क्लार्नेट लिए अपनी झोली में रखे सर्वोतम धुनों में एक से एक बजाये चले जा रहा था और बनारसी बाऊ के मामा से दस-दस की नोट इनाम में पाता जा रहा था। बनारसी जी बार-बार बरात को खिसकाने में लगे हुए थे पर वह समझ नहीं पा रहे थे की सड़क के बीचो-बीच अचानक कौन बरात को रोक देता है।

पीछे गाड़ियों का जाम,हॉर्न की पे-पे,रथ पर बैठे गवैये की बनावटी लड़की की आवाज,बैंड मास्टर की अपनी धुन ...ग्रामीण अंचल के इस नई कहावत को "भाग भो ..... आंधी आई" को चरितार्थ कर रहे थे।
लड़की का घर अब थोड़े ही दूर पर था। लावंडों का उत्साह अब दोगना हो चला था कि अचानक गणपति नाचते-नाचते अपने सर पर पानी की पूरी भरी बोतल गिरा लेता है। पूरी भीगी हुई कमीज और सर पर बड़े-बड़े भीगे बाल उसके आँखों के सामने आ-जा रहे थे। दूर से देख रहे भोला पाण्डेय को यह बात बड़ी नागवार गुजरती है। वह गणपति को अपने पास बुलाते हैं।
भोला पाण्डेय- यह क्या बेहूदगी है ?
गणपति- चुप 
भोला पाण्डेय- ठीक ही कह रहे थे श्रीवास्तव जी कि आप अपने लड़के को संभाले थोड़ा बिगड़ रहा है।थोड़ा क्या ..तू तै लाखेरई के हदे पार कई गाईला।
और यह कहते-कहते एक तमाचा धर देते हैं। खैर अगल-बगल के लोग बीच-बचाव करते हैं और गणपति को धीरे से खिसक जाने को कहते हैं।
जिस तरह गैंगवार में गोली कहाँ से चलेगी और किसको कहाँ लगेगी यह पता नहीं चलता उसी तरह बरात में कौन सा तमाचा कहाँ से उठेगा और किसको पड़ेगा यह भी पता नहीं चलता।
बरात लड़की के स्वागत द्वार पर पूरी जोश के साथ आ गयी थी। सभी जो कर सकते थे वह कर रहे थें कि अचानक रथ पर बैठा गवैया नीचें उतरता है और क्लार्नेट बजा रहे मास्टर को पटक देता है। दोनों के बीच भयानक मार-पीट शुरू हो जाती है।किसी के समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या। कुछ लोग तो बेमतलब ही स्वागत द्वार से भाग खड़े होते हैं।
दरवाजे पर खड़े फूल-माला लिए घराती यह देख कर दंग रह जाते हैं।कोई अन्दर लड़की के पिता को यह खबर दे आता है की जल्दी बाहर चलें बवाल हो गया।
अखंड बाऊ तक जब यह सूचना पहुंचती है तब वह जोश में उतर कर वहां जाना चाह रहे थे कि अचानक उनको मंटू पाड़े की याद आ जाती है और वह चुप-चाप अपने मोटर में बैठे रह जाते हैं।
अन्दर दूल्हन के पास बैठी उसकी सहेलियां तथा नात-बात ढोलक लिए गाना गा  बजा रही थी कि अचानक दूल्हन का छोटा भाई दौड़ा-दौड़ा आता है और हाकी लिए जोश में बड़बड़ाते हुए बाहर की तरफ भागता है।
अन्दर बैठे सभी लोंगो को सन्न ही मार जाता है। कोई भी यह नहीं समझ पाता की आखिर हुआ क्या पर सब इस बात से आश्वस्थ थे कि बवाल हुआ होगा .....। 
बाहर बुजुर्गो ने मिल कर मामले पर काबू पा लिया था कि अचानक दूल्हन का छोटा भाई पूरे ताव के साथ भीड़ में बात कर रहे बुजुर्गों के बीच हाकी लिए घुस जाता है।
दूल्हन का छोटा भाई- (चिल्लाते हुए) कौन है भों .......वाला आज उसकी लाश बिछा दूंगा।
वह आगे कुछ और बोल पाता कि अचानक पीछे से उसे एक जोर का थप्पड़ पड़ता है। वह पीछे मुड़ कर देखता है तो पाता है की उसके पिता जी उससे कह रहे है कि-
अभी हम तुमको यहीं मार कर गिरा देंगे चले है लाश गिराने।
किसी तरह मामला शांत होता है। अब सभी को सारी बात समझ में आ जाती है। जैसे-तैसे घराती बरातियों को फूल-माला से स्वागत करते हैं और फिर भीड़ बेकाबू होकर पंडाल के अन्दर लगे खाने-खजाने में टूट पड़ती है।
द्वार पूजा, जय माल और फिर रात भर शादी होने के बाद लड़की की बिदाई का समय आ जाता है। 
खड़ी दुपहरी में लड़की मोटी बनारसी साड़ी पहने मोटर में बैठ जाती है। आँख आँसू से भरे हुए और पूरा शरीर पसीने से लबालब। अन्दर डिटू को भाभी के गोद में बिठा दिया जाता है। अखंड बाऊ ड्राईवर के बगल में और घर से आई किसी एक लड़की को दूल्हन के बगल में बैठा दिया जाता है। दूल्हन एक हाथ में डिटू को और एक हाथ में अपना लाल पर्स संभाले बस बैठी रहती है। अखंड बाऊ अपनी दूल्हन को आगे लगे शीशे में थोड़ी-थोड़ी देर पर देख लेते हैं और मोटर गाड़ी धीरे-धीरे, चलते-चलते रफ़्तार पकड़ लेती है।

(अप्रमेय )                                        







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