Thursday, March 26, 2020

कोरोना 1

कोरोना-1
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एक गिलहरी जो 
मेरे अमरूद के वृक्ष पर अकसर
दिखती थी वह इधर कुछ दिनों से
नजर नहीं आ रही,

गिलहरी से दो बड़ी स्मृतियां जुड़ी हैं मेरी
पहली मेरे बचपन की और
दूसरी रामकथा की,

इधर तीसरी बात जो स्मृति नहीं है
जिसे आशंका कहना ठीक होगा
उसने कील से
महा त्रासदी के दरवाजे पर
नेमप्लेट की तरह ठोंक कर
टांग दिया है मुझे जिसके
पते पर लिखा है-

"गिलहरी और चमगादड़
चमगादड़ और कोरोना
कोरोना और चीन
चीन और भारत
भारत और मनुष्य
मनुष्य और मनुष्यता !"

एक छोटा बच्चा दूर से
दौड़ता आता हुआ
रुक जाता है उस नेमप्लेट के पास
जैसे दूर आकाश में कोई बादल
रुका हुआ सा धीरे धीरे
सांझ होते-होते खो जाता है।
(अप्रमेय)

Monday, March 2, 2020

कविता

पुकार
यहां हूँ और
चुप्पी,
ये तीन शब्द
महाकव्य हैं
मेरे लिए
क्योंकि
बचपन पुकारने में
जवानी बताने में
और चुप्पी
अब जीवन की
अंतिम कहानी
होती जा रही है।
(अप्रमेय)

Friday, February 28, 2020

होली 2

होली में दीप नहीं जलाए जाते
रंगोली भी नहीं बनाई जाती
कोई जब निकलता है होली के दिन
होली खेलने
तब कोई बहन रक्षा सूत्र नहीं बांधती
भाई के कलाई पर,
अभी जो कुछ आप ने सुना
वह कविता नहीं है
सवाल था बहुत पहले
जो बचपन में मैंने
अपने पिता से पूछे थे,

उन्हों ने होली के दिन
मुझे मां के पास भेज दिया था
इन्हीं प्रश्नों के साथ
मेरी माँ ने मुझे
होली की शाम बुकवा लगाने के बाद
कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा था,
मंदिर में रोली से रंगोली बनाई
और दीप जला कर
आंखों में काजल लगाते कहा था
किसने कहा कि होली में
यह सब नहीं किया जा सकता।
(अप्रमेय)

Tuesday, February 25, 2020

होली 1

होली आने को है
और
मैं उस जगह कुछ दिनों से
रह रहा हूँ जहां
होली को अब भी अंग्रेज़ी कैलेंडर से नहीं
पलाश के खिलने से जाना जाता है,
मैंने सुना है फूलों से रंग बनाने की बात
आप ने भी जाना होगा
किसी के चेहरे के रंग से
उसके हृदय की बात,
होली आने को है इसलिए
कुछ और नहीं
केवल इतना भर कहूंगा कि
प्रेम जगत की एक अनिवार्य होली है
जिसका समय तय नहीं किया जा सका है
वह जब घटती है
आंखों में जल और चेहरे पर अनगिनत
भावों के रंग लगा जाती है
कोई बच नहीं सकेगा इस होली से
क्योंकि पलाश खिलते रहेंगे
रंग बनते रहेंगे और अगर
जीवन बचा रहा
मेरे जैसे कई दीवाने
होली खेलते रहेंगे।
(अप्रमेय)

Saturday, February 22, 2020

मुक्ति का एक दीप

स्मृतियां तारों सी चमकती हैं
अंतरतम आकाश में
एक चेहरा बीचों-बीच
चांद सा निहारता है मुझको
मैं प्रतीक्षा में हूँ कि
पूर्णिमा के दिन
मंत्रों के बंदनवार से
मुदित पुष्प सा रंग खिलाऊँ
महक उठूं खुद अपने तन में
सब मे एक सुवास जगाऊँ
बहुत हुआ अमावस अब
मुक्ति का एक द्वीप जलाऊं !!!
(अप्रमेय)

Friday, February 14, 2020

मैं मंसूर नहीं

जीवन वृत मेरा
लिखा नहीं जा सकता
इसलिए नहीं कि ये मुमकिन नहीं
इसलिए कि मैं जानता हूँ
लिखने को कुछ उसमें होगा नहीं,
मैंने इत्मीनान से इसपर सोचा
और चुप चाप खुद से
कुछ कहते रहने का
निर्णय लिया !!!
यह निर्णय ब्रह्म वाक्य है
दुनिया के लिए नहीं
मेरे लिए क्यों कि
यह मेरा सत्य है
जिसमें पाप, ईर्ष्या, मक्कारी
और वह सब कुछ जिसे
आप घृणित कहते हैं
कम-जरा नहीं कूट-कूट कर
भरा पड़ा है
मैं जानता हूँ यह कि इसके नाते
मेरा मंसूर की तर्ज पर
कत्ल किया जा सकता है
पर मैं यह भी जानता हूँ
कि मैं मंसूर नहीं।
(अप्रमेय)

Friday, February 7, 2020

समझ सको तो कविता नहीं तो अंगारा

झोपड़ी नाँव और साधू
हमेशा वीराने में होते हैं
इस बात को कहते हुए
बस एक सुधार करना चाहता हूं
झोपड़ी अब शहर के बीचो-बीच
सियासत की मुकुट होटीे है,
इसे तुम अगर समझ सको तो
यह एक कविता है
नहीं तो आग उगलती अंगारा।
(अप्रमेय)

वसन्त आ चुका है

बाहर बे मौसम बारिश हो रही है
सुना है इस साल भी
कई लोग ठंड से मर गए,
एक बुजुर्ग ने कभी मेरे इस वक्तव्य पर
मुझे ठीक करते हुए कहा था
ठंड से कभी किसी अमीर को
मरते हुए सुना है ?
यही सोचते हुए हर साल की तरह इस साल भी
वसंत आ चुका है
कभी मैंने एक कविता लिखी ही नहीं
गाई भी थी कि
तुम मनाओ वसन्त हम मनाएंगे फिर कभी
का स्वर अब भूलता जा रहा हूँ
एक गूंज कानों के अंदर बराबर बजती है
डॉक्टर कहता है यह एक रोग है
मनोवैज्ञानिक इसे मनोरोग की श्रेणी में डालता है
एक बाबा-फकीर सा इसे
अनहद नाद कह कर मुस्कुरा देता है
मेरी बूढ़ी माँ कुछ नहीं कहती
मुझे देखती है और अपने आँचल से
मेरे कानों को ढक देती है।
(अप्रमेय)

Tuesday, January 28, 2020

जिंदगी और पतंग

बच्चे मांगते हैं एक या दो रुपए
पतंग के लिए
उनकीे नन्हीं हथेलियों पर गोल सिक्के
पूरी पृथ्वी का नक्शा पतंग सा
बदल देते है,

हाथ में मांझा और सद्दी लिए
पतंग को उससे जोड़ते
गांठ लगाते हुए वे तोड़ते हैं
रिश्तों में गांठ लग जाने वाला
पुराना मुहावरा,

आकाश में पतंग उड़ाना
हमें नहीं आता
शुरुवात में बच्चों को भी नहीं आता
पर बच्चे पतंग उड़ाते हैं
आकाश से बतियाते हैं
उनके पास जाने पर वे पूछते हैं
और कितने ऊपर
पतंग जा पाएगी काका।
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(अप्रमेय)

गुम हो चुका है

इस भीड़ में
गुम होता हुआ मेरा चेहरा
रात के एकांत में
परिंदे सा उड़ता हुआ
अचानक मेरे चेहरे पर चस्पा हो जाता है,

धीरे धीरे उसकी सांस
मेरी आत्मा को गुब्बारे सा फुलाती है
मैं उस परिंदे का नाम नहीं जानता
कोई भी नहीं जानता उसको
उसे जानूं, दर्ज करूँ इससे पहले
रात और गहरा जाती है
सुबह हो जाती है.....
मेरे सामने एक सर कटी भीड़
कुछ इधर-उधर तलाशती है
बार-बार कोई नाम पुकारती है।
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अप्रमेय

सफर

सफ़र बहुत लंबा रहा छांव दिखी ही थी
कदम रुके नहीं और रस्ते बेहिसाब आए,

फ़ुरसत कहाँ कि करूँ ज़माने का हिसाब
तुम याद जो पल-पल बेहिसाब आए,

अब्र सा उठ जाने की जद्दोजहद में
टूट के बिखरे हम और ग़म बेहिसाब आए,

ख़्वाहिश में राहत मील के पत्थर सी जो अटकी रही
सफ़र बढ़ता ही रहा सफ़र बेहिसाब आए,

ग़ज़ल लिखूं के ग़ज़ल पढ़ू या ग़ज़ल जियूँ 'मिसरा'
उनकी आँखों की तकरीर में डूब हम बेहिसाब आए,

(अप्रमेय)

Sunday, January 12, 2020

कविता में मोची

कविता में मोची
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वह चमड़े को खुरचने के पहले
नापता है जूते की लंबाई और चौड़ाई,
सोल लगाने के ठीक पहले
अपने औजार को पत्थर पर धार लगाते
वह मेरी आँखों से उतर कर
मेरी इच्छाओं का भी अनुमान लगा लेता है,

सलीके से पर थोड़ा बेदर्दी से
खुरच रहा है वह अपने हाथों में लिए
किसी बेनामी औजार से चमड़ा,
मुझे किसी स्कूल में उस औजार का नाम
पढ़ाया नहीं गया पर हां
शब्दकोश में शायद उसका नाम लिखा हो,

मैं खुरचे जा रहे उस चमड़े की
पीड़ा महसूस कर पाता हूँ
पर अचानक तर्क से चारों तरफ
कुरुक्षेत्र की युद्ध भूमि के अंदर कर्ण सा
घिर जाता हूँ,
नाली के ऊपर अपनी दुकान पर
मोची ने लगा रखी है
अपने भगवान की फ़ोटो जिसपर
अनायास निगाह जाती है मेरी जहां
चमड़े की पीड़ा और ईश्वर के होने
दोनों पर ही प्रश्न-चिन्ह सा
चित्र बना जाती है!!!!
(अप्रमेय)

Monday, January 6, 2020

रुकी हुई है यात्रा

अंदर ही अंदर वह अपनी
शर्मसार आंखों से झांकती है मुझे
और कतराता रहा हूँ मैं उससे
बाहर ही बाहर,

बहुत सी ऐसी पंक्तियां
इसलिए हो जाती हैं लिपि-बद्ध
क्योंकि हम उन्हें मन ही मन
फेंक आते हैं हृदय के पार,

वह ढहती हैं , गिरती है
और उनके साथ
बच जाता है कुछ
जो कभी-कभी गुनगुनाई जाती हैं
महफिलों में सुरीली आवाज के
कैदखाने से,

दुःख मन का जो हम
कह नहीं पाते वह अंदर
स्वांसो के बीचों-बीच
मील का पत्थर बन
रोकता है मेरी यात्रा।
(अप्रमेय)

Saturday, January 4, 2020

हाइवे पर सन्यासी

हाइवे पर सन्यासी
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गांव के चबूतरे पर
खलिहान के बीच
कहीं पेड़ की छांव में
या शहर के चौराहों, गलियों
के बीच से गुजरता हुआ सन्यासी
कहीं भी दिख जाता है।

सन्यासी कहता नहीं कुछ
आदमी ने कहा है हमेशा
उसके बारे में,
पहाड़, गुफा, चमत्कार
माला, चंदन, खड़ाऊं
जाने कितने प्रतीक चिपके हैं
उसके साथ,
मैं जानना चाहता हूँ इन प्रतीकों
का भाग्य उन्हीं की जुबानी
जो उसके साथ डोल रहें हैं
सदियों से इधर से उधर पर
वे भी सन्यासी की ही तरह
कुछ बोलते दिखते नहीं,

अभी तेज दौड़ती रफ्तार के बीच
हाइवे पर चल रहा है सन्यासी
हाइवे ने पूछा नहीं और
सन्यासी ने भी शायद बताया नहीं,
बिना उसे बताए और खुद भी बिना जाने
मैं सोच रहा हूँ
जा कहाँ रहा है सन्यासी ?
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(अप्रमेय)

उदास हो जाता हूँ

उदास हो जाता हूँ
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यहीं पास में तना है बादल
यहीं बाहर खिड़की से
बह रही हवा,
यहीं उतर आएगी रात चाँदनी
यहीं सुबह से बाहर झबराये पेड़ से
पुकारेगी कोयल,

यहीं से हां यहीं से
देखते देखते
धीरे-धीरे हम हो जाएंगे बिदा,

किताबें कहती हैं
कुछ खत्म नहीं होता
मैं जानता हूँ यह वाक्य
समूची सृष्टि का
सबसे भ्रांत वाक्य है
इसलिए
कविता में इसे नारे की तरह दोहराता हूँ
कि अपने आप को धीरे धीरे
खत्म होता हुआ देख
उदास हो जाता हूँ!!!
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अप्रमेय

रात

रात
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शहर के मुहाने
रात अचानक उतर आई थी,

थोड़ा और आगे
सरसराती हवाओं के साथ
वह मन्त्र दोहरा रही थी,

मन्त्र चलता रहा वह बढ़ती रही,
खलिहान पार कर के वह अब
मुझसे दूर पेड़ों के साथ आसन जमाए
ध्यानस्थ हुई जा रही थी,

सुबह टहलते वक्त मेड़ों के इर्द-गिर्द
निर्वाण सी, मुक्त सी, नहीं-नहीं
ओस सी ठंडी वह मुझसे बिना कुछ कहे
कुछ कही जा रही थी।
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अप्रमेय

नव वर्ष की मंगल कामनाएं

चली आती ही है चिड़िया रोज
हमारे छत पर अनाज के बहाने,

हम भी तो उनके बाग गेंद ढूंढने के बहाने
इधर-उधर निहारते
आम के पेड़ से टिकोरे
तोड़ ही लाते थे,

छांव के बहाने ही सही दौड़ती सड़क पर
रुक ही जाते हैं  राहगीर, गाय-गोरु और
ठेलेवाले!

परदेस में बगलगीर को सुबह टहलने के ही बहाने
नमस्कार करते हम उनके परिवार का
हिस्सा बन ही जाते हैं,

मंच पर बाजा रखने के बहाने
एकाध सुर दबाते चेले
धीरे-धीरे गुर जान ही जाते हैं!

नए वर्ष के बहाने ही सही
हम सभी एक दूसरे की सलामती की दुआ
कर ही आते हैं।
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अप्रमेय

जो दिखा मुझे

एक सादे पन्ने पर
मौलवी लिखता है अल्लाह
पंडित लिखता है भगवान
चित्रकार बनाता है चित्र
गवैये स्वर के पलटे और
बनिया लिखता है हिसाब,

एक बच्चा सादे पन्ने को
उठाता है अपने हाथ
मिचोड़ कर उसे
बनाता है गेंद
और उसे आकाश में उछाल कर
जोर जोर से हंसते-खिलखिलाते हुए
पूरी पृथ्वी को अपनी गूंज से
भर देता है।
(अप्रमेय)

Monday, November 11, 2019

पागलपन

पागलपन
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इधर बहुत दिनों से
चिड़ियों ने मेरी खिड़की के पास
आवाज नहीं लगाई,
पीपल के पत्ते उड़ कर
नहीं लाए कोई संदेसा
मेरे दरवाजे के पास,

इस बरसात झिंगरो और मेढकों ने भी
नहीं सुनाई कजरी,

आकाश ने भी गरज कर
कोई डांट नहीं लगाई,

इस वसंत फूल तो खिले
पर किसी ने इत्र का छिड़काव
नहीं किया मुझपर,

और इस होली पलाश भी
उतरा नहीं मेरे माथे पर
अबीर लगाने,

मैं सोचता हूँ और चुप
हो जाता हूँ, फिर
धन्यवाद देता हूँ कविता को
कि किसी से कुछ कहने के बजाए
कुछ लिख देना कैसे
औषधि बन जाता है
पागलपन से बचने के लिए।
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(अप्रमेय)

प्रार्थना

बिना शब्द
बिना ध्वनि
बिना इशारे के
मैं तुम्हें पुकारना चाहता हूं,
परत दर परत
आवरण उतरे कुछ ऐसा
फ़ना हो जाना चाहता हूं।
(अप्रमेय)

जिंदगी

जिंदगी भागती जाती है
और हम वहीं ठहरे रहते हैं
अपने-अपने मकानों के
दीवारों के बीच,

अपनों कपड़ों के बीच
उनके रंग का क्षीण होना
हमें तब तक नहीं दिखाई पड़ता
जब तक हमारी आंखें
अनंत के विस्तार को झांखने
हमसे दूर नहीं चली जातीं,

हमारा रूपया हमारे ही चिता
को जलाने के काम आएगा
और हमने जाने-अनजाने
जो खिंचवाईं हैं तस्वीरें
उनमें से जो उन्हें पसंद आएंगी
केवल वही दीवार पर टांगी जाएंगी,

हम यह नहीं समझ पाते
जानते हुए भी कि
उम्र भर हमारे जाने का प्रयोजन
सिर्फ इसलिए बना रहता है
क्योंकि हम जानते नहीं
कि जाना किसे कहते हैं।
(अप्रमेय)

चूक जाता हूँ

तुम्हें जिस तरह मुझसे
प्रेम मिलना चाहिए
वह नहीं दे पाता,
मैं सोचता हूँ कि मैं
कितना अभागा हूँ,
मैं इस सत्य को नकार जाता हूँ
और इससे बच सकूं इसके लिए
अपने चित्त को ऊंचा उठाने
की फिक्र में लग जाता हूँ,
ईश्वर के अलावा कोई सहारा नहीं दिखता!
मैं उसकी शरण में चला जाता हूँ
और एक बार फिर तुम्हें
प्रेम करने से चूक जाता हूँ।
(अप्रमेय)

सोचता हूँ

सोचता हूँ बचपन में
मुझसे नहीं लिखवाई गई स्वरचित
कोई कविता
सो आज लिख रहा हूँ
कविता,

सोचता हूँ मुझसे अगर
किसी ने भी ठीक से
कर लिया होता प्यार
तो आज शायद सभी से कर रहा होता
प्यार,

सोचता हूँ अच्छा ही हुआ
जो स्कूल की कक्षाओं में
ईश्वर पर मुझसे नहीं
पूछा गया कोई
सवाल।
(अप्रमेय)

Saturday, October 19, 2019

चुप रहो

अभी सब स्थगित है
सिवाय चुप रहने के
मुझे मालूम है यह चुप्पी औषधि है
बेमौत मरने से बचने के लिए
मैं खुश हूँ, नहीं-नहीं चुप हूं
और तुम्हें भी
भेज रहा हूँ मौन आमंत्रण
इच्छा मृत्यु की तलाश करो
ईश्वर चुप है तुम भी चुप रहने का
अभ्यास करो।
(अप्रमेय)

Wednesday, July 10, 2019

बच्चे के बहाने

सम्बन्धों से जीवन
और राजनीति से
संसद चलती है,
मैंने एक नन्हे बच्चे को
चलते देखा
चलते हुए लड़खड़ाते
उसे गिरते फिर उठते देखा,
मैंने इस बच्चे के बहाने
जीवन के परे
और संसद के बाहर
ईश्वर को देखा।
(अप्रमेय)

Sunday, June 30, 2019

उपनिषद अभी लिखा जाना बाकी है

एक अंग्रेजी माध्यम से
पढ़ रहा बच्चा मुझसे पूछता है
चौरासी किसे कहते हैं अंकल,
मैं उसे बताता हूँ और अचानक
चुप हो जाता हूँ,

धीरे से इतिहास अपना
पीछे का किवाड़ खोलता है
और चौरासी के दंगों में मुझे शामिल कर
मेरे छाती पर ख़ंजर भोंक देता है,

पुनर्जन्म लेकर पुनः
मैं पाठशाला में पहाड़ा पढ़ते हुए
जोर जोर से दोहराता हूँ
"बारह सत्ते चौरासी"
और अपनी उम्र से चौरासी को
घटा रहा होता हूँ,

मुझे नहीं मालूम चौरासी के हो रहे
बुड्ढों का हाल पर
आने वाली सदी में
बुड्ढे बहुत ज्यादा होंगे
और दुख भी उससे ज्यादा होगा,

निन्यानबे के चक्कर से
चौरासी का खेल बड़ा अबूझ है
जिसपर एक उपनिषद
लिखा जाना अभी बाकी है।
(अप्रमेय)

Friday, June 14, 2019

लोक

इन पहाड़ों-जंगलों के बीच
पतली पतली रेखाओं सा
किसने गढ़ा मार्ग!!!
किससे पूंछू इस वीराने में???
और सहसा पत्तों सा
सरसराता है स्मरण में कोई गीत
उत्तर मौन में उतर आता है
फिर लोक हृदय में
प्राण-प्रतिष्ठित हो कर
शिवलिंग सा ठहर जाता है।
(अप्रमेय)

पेड़ और आदमी

सतपुड़ा के जंगल से गुजरते हुए
मुझे ख्याल हो आया
पेड़ों की गठान
और उनकीे हस्तरेखा सी
खींची हुई टहनियां,

आदमी जितने होंगे
उतने ही खाली दिखेंगे
पत्तों से पेड़,

पेड़ आदमी के जीवन के फलादेश हैं
जिनके पत्तों जैसे शब्द
आदमी पर लगे श्राप को
सोखते हुए सूखते हैं और समय से पहले
मिट्टी में गुम हो जाते हैं।
(अप्रमेय)

Saturday, June 1, 2019

अलाव और आलाप

मैंने पढ़ा एक शब्द
अलाव
फिर अचानक एक शब्द
आलाप
जाग उठा अंदर अंतस में
मैंने कविता के दरवाजे को
खटखटाया
और उसने लय में
इन दोनों शब्द की आत्मा
ठंड में ठिठुरते
किसी बेसहारा की
कंपकपाती आवाज में सुनाया।
(अप्रमेय)

Saturday, May 18, 2019

बहुत दिन हुए

बहुत दिन हुए
कुछ लिखा नहीं
असल में कुछ लिखना
लिखना नहीं, तुम्हें
याद करना होता है
याद करते हुए तुम्हें लिखना
तुम्हारे साथ न होने को
भूल जाना है
भूल जाना मनुष्यता के लिए
वरदान है
ईश्वर ने इसे सबसे पहले
अपने ऊपर आजमाया
हमें भूल कर
अपनी सर्वज्ञता का
आभास दिलाया।
(अप्रमेय)

Saturday, May 11, 2019

आदमी

उसने सलीके से लगायाअपना मेज
एक किनारे कलमदान और
एक किनारे कुछ चित्र,
शब्द नहीं हैं वहां उसकी दुनिया में
अन्तस् में कुछ शब्द जैसे चूहा,खरगोश
बिल्ली और शेर सम्हाले
वह बड़ा हो रहा है
धीरे धीरे घेर लेंगे उसे शब्द
और मेज पर फिर वह निहारेगा मानचित्र
जानेगा लोकतंत्र, नीति और धर्म
बच्चा फिर बड़ा हो जाएगा
और कभी नहीं हो सकेगा
वह आदमी।
(अप्रमेय)

Saturday, May 4, 2019

मैं तुम्हें याद करता हूँ

लिखे शब्द
वस्तु नहीं
रूप नहीं
रंग नहीं
ध्वनि भी नहीं
फिर भी स्मृति के सहारे
ध्वनि के रंग से
रूप और वस्तु
हो जाते हैं,
इसी तरह
मैं तुम्हे याद करता हूँ
और तुम्हारे साथ होते हुए
तुम सा हो जाता हूँ।
(अप्रमेय)

Sunday, April 21, 2019

गिलहरी

तुम अभी एक गिलहरी सी
पेड़ों से उतर आई
मैंने लोक की
उस कथा को याद करते हुए प्रणाम किया
पुल निर्माण में तुमनें
राम का जो साथ दिया
शिव का त्रिपुंड कैसे जीवित हो उठा
राम की अंगुलियों के सहारे
पीठ पर तुम्हारे,
मैंने राम के सहारे सीता को
और सीता के सहारे
फिर तुम्हें याद किया।
(अप्रमेय)

Wednesday, April 17, 2019

बूंद, धरती और आकाश

पलकें ढप से मुंदती हैं
गिरती हुई बूंद सी
मुझे नहीं मालूम
बूंद, आकाश और
धरती का रिश्ता पर
इतना कह सकता हूँ
जब जब पलकें मुंदती हैं
मेरे आंखों का पानी
अंदर कहीं समुंदर में
रिस जाता है
और मुझसे क्रांति कर
धरती पर कहीं
बरस जाता है।
(अप्रमेय)

Tuesday, April 9, 2019

शहर से दूर

शहर से दूर
एक पुराने घर में
डोलता है पंखा,

शहर से दूर
एक पुराने मन्दिर में
बजता है घण्टा,

शहर से दूर
एक पुराने कुएं पर
लगा है चौपाल,

शहर से दूर
मैं और मेरी उपस्थिति
दोनों एक दूसरे से मिलते हैं
और दुपहरी के सन्नाटे सा
चुप हो जाते हैं।
(अप्रमेय)

Sunday, March 24, 2019

मैंने तुमसे प्यार किया

सब कुछ तय था
सिवाय इसके 
कि
मैं तुम्हें प्यार करूँ.
पर मैंने
दुनियावी शास्त्र के विरुद्ध 
तुमसे प्यार किया और
जीते हुए
अपने अस्तित्व को
खत्म कर डाला |
(अप्रमेय)

Saturday, March 23, 2019

जीना चाहता हूं

मैं जी भर जीना चाहता हूं
मरने से पहले और मरने के बाद
कोई बुलावा इधर से आए
तो पुनः आना चाहूंगा
मर जाने के लिए,

वैसे सौ बार जीते जी मैं
मर चुका हूं और ग़ालिब को
याद करते हुए उनके शेर का
पहला पद मन्त्र सा दोहराया हूँ
कि क्या बुरा था मरना जो एक बार होता,

लेकिन फिर भी एक बात
सबके लिए कहना चाहूंगा
जिंदगी पछाड़ती ही रहेगी हमेशा मृत्यु को
प्यार जीतता ही रहेगा हमेशा घृणा को
वसन्त पतझड़ के रूखेपन को
ढंकता ही रहेगा तबतक
जबतक एक एक आदमी
जिंदगी से प्यार न करने लगे।
(अप्रमेय)

हमेशा कुछ कहना भी जरूरी नहीं

जिंदगी इतनी भी गई गुजरी नहीं
कि रात सोने के पहले
सुबह उठने का मन न हो,

तुम इतने भी भूले बिसरे नहीं
कि मरने से पहले मैं तुम्हें न बताने जाऊं
कि लो अब चलने की बारी आई,

इस बीच सब कुछ इतना अच्छा भी न रहा
कि पन्नों पर उन्हें उतार भर दूँ
और वह कविता हो जाए,

पर फिर भी सांझ-सुबह
वह जो चुप्पी बैठी रही
हर वक्त पास खाली कुर्सी सी
उसने मुझसे कहा
हमेशा कुछ कहना भी जरूरी नहीं।
(अप्रमेय)

Saturday, March 16, 2019

एक उम्र के बाद

एक उम्र के बाद
घर की दीवारें
बहुत पास दुबक आती हैं
और नीचे झुक आती है
घर की छत
कोने-कोने में रखे सामान
अपने शरीर से प्याज के छिलके के माफिक
अपना रहस्य नुचवाते हैं,

देह घबराती है और
कहीं इधर-उधर सांस ले रहे
दरारों के बीच कुछ सपने
कुल्हाड़ी लिए जो दौड़ते हैं मेरी तरफ
उनसे जान छुड़ा के भागने के अतिरिक्त
कोई चारा शेष नहीं दिखता,

पहले लौट के घर को आना होता था
अब बार-बार लौटता है मन
बाहर दरवाजे के पास पड़े जूतों के पास,

भागवत की एक कथा याद आती है
जिसमें राजा के अंतिम समय
के वक्त हिरण चिंता से
उसे भी अगले जन्म में
हिरण होना पड़ा था,

मैं सोचता हूँ
मुझे अगले जन्म में
क्या-क्या होना पड़ेगा
इसका लेखा-जोखा
मेरी कविताओं में क्या
स्पष्ट हो पाया है।
(अप्रमेय)

इस बार

ये कहना मुझे अच्छा नहीं लगा कि
झर जाएंगे पत्ते इसलिए
कह रहा हूँ 
झर रहें हैं पत्ते
इस बार भी वसंत के,

इस बार, इस बार ऐसा कहना
हमेशा से कितना
आशान्वित करता रहा है मुझे
ये आज पलाश के पेड़ के नीचे
धूप में खड़े हो कर उसके फूल को
देखते हुए अनुभव हुआ,

इस बार ऐसा कहना
इस जीवन का महा मंत्र लगा
जो सुबह से शाम तक
आदि से अनंत तक
बराबर बज रहा है
दिन में रौशनी सा
रात में अँधेरा सा
बादलों में चाँद सा
या फिर तारों सा
घटाओं सा
झरनों सा
आदमी में आदमी सा
(अप्रमेय)

Thursday, February 21, 2019

शाम और कविता

शाम होते ही
दूर खलिहान से
टप्पा खाती लुढ़कती
चली आती है कानों के पास
बच्चों की चहकती आवाज,

मैं बाहर दुआरे पर लपक कर
उन्हें पकड़ने की कोशिश में
उठ कर बाहर की तरफ बढ़ता हूँ,

दरवाजे के ऊपर रेंगती छिपकली
अनजाने में सिटकनी के पास
फिसल आती है
बूढ़ी मां की मोतियाबिंद आंखे
उसे देख नहीं सकती और
कभी उसे देख कर अचानक
चीत्कार करती हुई
पत्नी की घबराई आवाज की स्मृति
मुझे अनगिनत कालछन्दों में धकेल देती है
जहां से मनुष्यता चीत्कार करते हुए भागी थी,

मैं मुड़ कर तलाश करता हूँ झाड़ू
जिससे उस छिपकली को
वहां से हटा सकूँ,
शाम पूरी हो जाती है
जैसे अभी मैं पूरी कर रहा हूँ
अपनी कविता।
(अप्रमेय)

Wednesday, February 13, 2019

निर्वाण, आम और कविता

कभी कभी
कोई कविता अंदर से
घुमड़ती हुई धीरे धीरे
अंगुलियों के पास आकर
बादल की तरह छा जाती है,

कागज का सा खेत
कुदाल की सी कलम
मेड़ पर प्रतीक्षा करता किसान
बादल के पार देख लेना चाहता है,

जोर जोर से चलती हैं हवाएं
हवा में पके आम की तरह
इधर-उधर लहराती है कविता
कब चू जाए
कुछ कहा नहीं जा सकता,

एक भिक्षु ने आज के
हजारो वर्ष पहले पूछा था
निर्वाण को कैसे समझे प्रभु
बुद्ध ने एक पके आम को
दिखलाते हुए कहा था
उसका पक कर अपने आप
गिर जाना ही....
कुछ उसे इस तरह समझो,

फिलहाल मेरा आम या मेरी कविता
उस पेड़ पर नहीं है
कोई शरारती बच्चा भी नहीं दिखता
की उससे तहकीकात करूँ
बचपन मे एक बार पका आम
एक झटहे से तोड़ते वक्त
अटक गया था

आज उसी तरह मेरी कविता
और मेरा निर्वाण दोनों ही
बिना पेड़ के ही कहीं
अटक गए हैं।
(अप्रमेय)

Sunday, February 10, 2019

घोंसला

मैंने आंख समेट कर
जब अपनी तलाशी ली तब
समझ पाया कि इस साल
तुम्हारी याद जो मेरे पेट में
अपना घोंसला बनाए हुए है
वह किसी तूफान का संकेत है,

पिछले साल न तूफान था और
न ही कोई जलजला इसलिए
तुमने ठीक मेरे माथे के बीचों-बीच
अपना घोंसला बनाया था और तब
तुम्हें ठीक से मैं देख पाया था
अपनी कविताओं को
ठीक तुम्हारे घोंसले की तरह
स्वरों से बुन पाया था,

माथे और पेट के घोंसले का
सिलसिला तो चलता रहा पर
इधर बार-बार
आंखें सिमट जाती हैं
हृदय के बीचों-बीच
किसी डाल पर अटक जाती हैं
घोंसला वहां अब बनना ही चाहिए
इस प्रार्थना के साथ
आंखें बंद बंद और फिर
बंद हो जाती हैं।
(अप्रमेय)