Tuesday, July 15, 2014

दो रुपए का नोट :


बीसवी शताब्दी में
दो रुपए के नोट नदारद हैं
घर से ,बाज़ार से
कहीं कोने में दबे
पूजा की किताबों से,
मैंने पूछा और खोजा
बच्चों की गुल्लकों में
दो रुपए का नोट
उन्होंने साफ़ इनकार किया
और औचक होकर
मुझे असभ्यता के
भीड़ में धकेल देना चाहा,
मैंने भिकारियों के
कटोरे में देखा
पूछ न सका
तमाम सिक्कों के बीच
कोई नोट न होने का कारण,
बीसवी शताब्दी के लिए
दो रुपए के नोट की स्वायतता ठीक नहीं
बीसवी शताब्दी का दर्शन में
या तो अद्वैतवाद है या फिर बहुवाद
द्वैतवाद का कोई अर्थ
कभी रहा करता होगा
भारत की चिंतनशील अवस्था में |

(अप्रमेय )

Friday, July 4, 2014

कैसे न हुआ जाए हैरान

कैसे न हुआ जाए हैरान
वह नहीं पिघलते
और झर जाते हैं झरने
पहाड़ो से नहीं
उसकी आँखों में आ कर,
तुम पोछते नहीं आँसू
और रेगिस्तान
चिपक कर गालों के पास
मेड़ की शक्ल में ढँक जाते हैं कोई राज,
कैसे न हुआ जाए हैरान
वह किनारे हो कर निकल जाते हैं
और धरती के गड्ढे
जमीन पर नहीं
उसकी शक्ल में दे जाते हैं
खाई जैसे निशान,
तुमको दिखती नहीं
पतली होती जाती चमड़ियों पर
कुछ उभरती,दौड़ती तस्वीर
वह केवल शिराएँ नहीं
जीवित शब्द हैं जो रूप के
साथ बह आए हैं नदियों से
शरीर में बसने के लिए |


( अप्रमेय )

Thursday, July 3, 2014

निपट आदमी के लिए

फूल केवल दिखते ही नहीं
वह रंग जाते हैं आप की आँख
स्त्री सिर्फ दिखती ही नहीं
वह दफ्न कर जाती है
तुम्हारे ह्रदय मेंकोई राज
जो नहीं जानते
दुनिया को देखना
वे ही सिर्फ लिखते हैं कविता
गाते हैं गीत या फिर
जिन्हें अपने अन्दर या फिर बाहर
दिखती है कोई फव्वारे की सी तस्वीर
उन्होंने
जो दस्तावेज तैयार किया
वह बंदूख और तलवार
से भी ज्यादे घातक हुए,
समझो मेरे निपट-आदमी !
निपट आदमी के लिए
 
( अप्रमेय )