Friday, March 25, 2016

तुम्हारे लिए

मैं तो राजी हूँ
तुम्हे स्वीकार करने के लिए
और जानता हूँ
तुमने अब तक 
सिर्फ जिंदगी को
किताबों में समझा है
और डरने की खुराक तुम्हे
जो आध्यात्मिक बनाती है
उसे तुमने मंदिर, गिरजाघरों
या फिर मस्जिद की चौखट पे
नाक रगड़ते हुए समझा है
तुमने जिस प्यार में
कुर्बानियों की कसमे खायीं हैं
वह देह से देह तक की यात्रा से
ज्यादे कुछ और नहीं
मैं तो कह दूँ
और इसके बावजूद भी
तुम्हे स्वीकार कर लूँ
पर तुम्हारे लिए
ये सब कहना तुम्हे खो देने जैसा होगा
मुझे मालूम है कि मेरी यह समझ
कितनी भी सत्य क्यों न हो
तुमसे ज्यादे कीमती नहीं
(अप्रमेय)

राजी

हम हो रहे हैं धीरे धीरे राजी
और इसे ही हम अपनी 
क़िस्मत समझ लेंगे 
कोई अचानक नहीं कहता है सच
धीरे धीरे परखता है 
वह तुम्हारा तापमान
उसे मालूम है
हलुआ बनाने की विधि
आदमी को गुलाम बनाने में
कैसे काम में लायी जा सकती है
आदमी के सपने बहुत पुराने हैं
यहाँ तक कि आदमी से भी पुराने
उसकी तड़प मुर्दा होने के पहले
थोड़ी साँसों की बची छटपटाहट है
जिंदगी उन्ही के पास हैं
जिनके हाथों में
पानी से भरा गिलास है
वो जानते हैं इसे और
वो भी छटपटाते हैं
कि गिलास पानी का
वह खुद भी नहीं पी पाते
न पिला पाते हैं
(अप्रमेय)

प्रार्थना

वह प्रार्थना करता है 
पुकारता है भगवान् को 
गाता है गीत 
बजाता है वीणा,वंशी और करताल 
सदियों से ,
अपनी समझ से
रचता है वाक्य
करता है प्राण प्रतिष्ठा
जीवन में भाषा की ,
किसी ने अब तक
नहीं देखा ईश्वर को
सदियों से इसे समझता है
कितना असहाय है
और कोई उपाय भी तो नहीं
यह जानता है
शायद इसी लिए
वह ईश्वर को मानता है ।
(अप्रमेय)

जी लेना चाहता हूँ

दोपहर के बाद
शाम होने के बाद 
वो कहते हैं रात हो गई
रात हो गई होती है,
जैसे हो जाती है सुबह 
रात हो जाने के बाद ,
तुम्हारे हो जाने के बाद
वे तुम्हारे सामने
दोहराते हैं बार-बार एक नाम
तुम हो जाते हो नाम
हो जाना जरूरी है
ये तुम नहीं वे सब कहते हैं
जो हो गए हैं एक नाम ,
वे कहते हैं गांघी था एक नाम
वे कहते हैं भगत था एक नाम
वे कहते हैं भारत है एक नाम
जिसकी आकृति
खींची होगी कभी किसी चित्रकार ने
अपना चूल्हा जलाने के लिए ,
शाम के ढलने के बाद
रात होने के पहले,
धीरे-धीरे मरने के पहले
मैं लौटा देना चाहता हूँ
अपना नाम
यह देश जिसे बताया गया मेरा देश
उसे तुम्हे ही मुबारक कर
मैं जी लेना चाहता हूँ
एक शाम |
( अप्रमेय)