Wednesday, October 25, 2017

कंकड़

एक कंकड़ तुमनें
यों ही फेंक दिया 
तालाब में,
तमाम उम्र बीत गई मेरी
दरिया की तालाश में,
(अप्रमेय)

वहीं से

वहीं से उठती है कविता 
जहां से दूब उग आती है
वहीं से निकलता है गान
जहां से हवा सरसराती है
वहीं से उड़ती है चिड़िया 
जहां से सपने फैल जाते हैं
वहीं से हम होते हैं विदा
जहां से लोग अपने हो जाते हैं ।
(अप्रमेय)

प्रेरणा

वहां नहीं मिली मुझे प्रेरणा 
जहाँ पढ़ा था मैंने 
भूख से गई जान
वहां भी नहीं निकली थी आह
जहाँ आदमी को 
पकड़ लिया गया था
जेब काट कर भागते हुए
कल शाम सब्जी मंडी में
देर रात के बाद
बंद होती दूकानों के बीच
वह सभ्य महिला
बीन रही थी
इधर-उधर पड़ी सब्जियां
मैंने पूछ ही लिया बहन
इसका क्या करोगी
उसने कही अपनी बात
और सच कहूँ
मुझे सुनाई पड़ी एक कविता
जिसके स्वर तो मैं यहाँ
नहीं सुना सकता
पर सुना रहा हूँ वह कविता-
बच्चे कर रहे हैं मेरा इंतज़ार
मां पैसा लायेगी और साथ
कुछ मिठाइयां भी और
आज हम सब मिल कर
खाएंगे भात के साथ भाजी भी
अब आप ही बताइये भाई साहब
कुछ काम मिला नहीं
तो पैसे कहाँ से आएंगे
मिठाई न सही
पर मेरे बच्चे भात-भाजी
तो खा पाएंगे ।
(अप्रमेय)

आज-कल

अचानक एक भद्द सी 
आती है आवाज 
और खुल जाती है नींद मेरी
रात को जैसे
गिरा हो पिछवाड़े 
पेड़ से पक कर कोई आम
बिस्तरे पर बाग़ नहीं होता
और कितना भी
कूलर कर ले शोर
आँधिया नहीं आती
अक्सर कई दिनों से
ऐसे ही अचानक
टूट जाती है नींद मेरी
और धड़कन
सीने से खिसक कर
कानों के पास
चली आती है मेरी ।
(अप्रमेय)

मरघट शिल्प

चन्द्रमा की गोलाई लिए 
दो नन्ही सी प्यारी आँखों ने 
अपने गालों पर बना दिए 
अश्रु चित्र....
पेड़ों ने देखा
किन्तु वह केवल खड़े नहीं रहे
हिलाया अपना पत्ता-पत्ता
जिनके पास फूल थें
उन्होंने झाड़ लीं अपनी-अपनी पंखुड़ी,
और धरती इधर पीती रही
आसमान का पसीना
खेल चलता ही रहा
और हम खेलते ही रहे अनवरत
तुम मिलते तो पूछता
ऐसा क्या है उधर
जिसे तुम हम सब से छुपाये रहे
और ऐसा क्या है इधर
जिससे तुम हम सब को भुलाए रहे
(अप्रमेय )

आने को है वसंत

आने को है वसंत
यह तो वहां लिखा है
पर कोकिल ने तो सुन लिया
उसका पदचाप अपनी धड़कन में
और चुप-चाप हवाओं से 
छुप कर साधने लगा गान
हवाएं नारद की तरह ले ही जाती
खबर इसलिए ही तो
पेड़-पत्तों और पुष्प ने
भोर में जब वह अलसाया खोज रहा
होता है अपनी माँ का अंधकार में
तारों भरा जड़ित आँचल तब ही
स्वागत के लिए वह जुगाड़ में
निकल पड़ते हैं प्रकाश का
सफेद घोड़ा लिए पाताल में
रंगों का रत्न बटोरने,
खबर वहां भी है कि
आने को है वसंत
कि कण-कण में
भर जाने को है वसंत ।
(अप्रमेय)

कैसे जाना

स्त्रियों को कभी सुंदर लगने के लिए
पोथी पढ़ते नहीं देखा
आदमी ने किस धर्म-ग्रंथ से
सीखा प्रेम करना !
बूढ़ों को चुप हो जाना है
और बच्चों को इजाजत नहीं लेनी
खेलने-कूदने के लिए
यह किस नीतिशास्त्र की पुस्तक
में पढ़ कर उन्हों ने जाना ?
सदी बदल चुकी है
अभी और भी बदली जानी है
आदमी खुले आकाश के नीचे
बड़ी-बड़ी सड़कों के बीच
अनंत के अछोर को पहचाने
अपने घर को ही लौट आता है
यह उसने किस संविधान से जाना ?
(अप्रमेय)

आस जगी

प्यास लगी 
तो पानी 
भूख लगी 
तो अन्न
तोहे देखन की 
आस जगी
तो हो गया
जियरा सन्न ।
(अप्रमेय)

कहाँ रोक सका है

पिंजरा भर आकाश
और ताले भर का प्यार
कहाँ रोक सका है
चिड़ियों को,
गिनी-चुनी गिनतियाँ
और ढेले भर के शास्त्र
की हकीकत
कौन नहीं जानता ?
एक कुत्ता जब चिल्लाता है
और एक बकरी जब
काटी जा रही होती है
तब कौन है
जो तड़प नही जाता है
काम, जाति और स्वाद के तुम
तर्क कितने भी क्यों न गढ़ लो
मृत्यु का सत्य
और प्रेम का अर्थ
या तो तुमने भुला दिया है
या स्थगित कर रखा है
फिर कभी जान लेने के लिए ।
(अप्रमेय)

कलंक का अवतार

कल औचक नहीं दिख पड़ा था चाँद
सांझ से ही जैसे प्रहरी ने
संभाली थी कमान
पड़ा न व्यवधान 
कि उतर पड़ा 
प्रकाश की सीढ़ियों से
सागर का सागर रस
रस-सागर की लहरें
लहरें न थी
चाँद की गोद में बैठा
अमृतस्य पुत्र के अबूझ प्रश्न थे,
रह-रह कर उन्ही का ही तो
जवाब खोज रहें हैं मदमस्त फकीर
कुरेद रहें हैं चित्रकार
कि पकड़ रहें हैं ध्वनि के फंदों में
गायक- रसकर,
बुद्ध ने पूर्णिमा में
और महावीर ने पूर्ण-चंद्र की रात
वहीं प्रश्न तो सुना था
जिसको पूछते-पूछते वे
भटकते रहे गांव-गांव
कि किसने मुझे गोद में
बैठा देख कर कह दिया
कलंक का अवतार !
(अप्रमेय)

नई दुनिया में

नई दुनिया में
छूटता चला जा रहा है
सादे पन्नों का साथ,
पन्नों की स्मृति अब
स्कूल के बीते दिनों के
चित्र भर से ज्यादा नहीं,
कोई आवाज नहीं
और न ही कोई जीवित परछाईं
आती है कड़क पन्नों के बीच,
एक सुगंध जो फूल की तरह
कॉपियों के बीच से उठती थी
वह भाप बन कर कबका
घुल गईं बादलों में,
जाने कहाँ किसके पास
बरसेगा बादल और
उसमें कोई चलाएगा
कागज की नांव ।
(अप्रमेय)

बादल गरजते हैं

बादल गरजते हैं और जब
जोर-जोर से चलती हैं हवाएं
तब केवल पेड़ ही नहीं लहराते
खड़बड़ाता है उनका छप्पर भी
गिरता है ऊपर से लोटा
टन्न-टन्न करता हुआ
जिसकी आवाज हृदय की धड़कन से
सन्न सा लय जोड़ देती है
तार मन्द्र और मध्य में
सपाट चलती हैं सांसे
देर तक बाहर बरसता है राग
और छप्पर के अंदर
एक एक बूंद रस चूता है
टप्प टप्प कर ।
(अप्रमेय)

सभ्यता की छाती पर

बाहर सुबह हो गई
और इधर रात का अंधेरा 
जला अंदर धीरे-धीरे
दिए के मानिंद,
जोरन ने दूध को रात में जाने कब
बना दिया दही
जाने कब अंतिम सांस ली
बूढ़े ने करते-करते इंतजार,
मंदिरों में बजा घण्टा
स्कूल के घंटो के साथ,
धीरे-धीरे चीटियों की तरह
आदमी ने बढ़ाए अपने कदम
वहीं लौट आने के लिए,
आदमी ने बनाए घर
रात बिताने और सुबह जागने के लिए
सदियों से सुबह होती गई
वैसे ही रात ढल जाने के बाद,
नई दुनिया ने समझ लिया इसका राज
सभ्यता की छाती पर फिर
धर दिए उसने अपने पांव !
(अप्रमेय)

उन्हें बुलाना

सटी किताबों के ऊपर धूल
और थोड़े दूरी पर
रखी चीज़ों पर
जाल लग जाते हैं,
कितना भी गहरा
क्यों न हो तालाब
धीरे-धीरे
सूख ही जाता है,
मुझे अच्छा नहीं लगता
सुबह-सुबह उदास होकर
अपनी कविताओं में
उन्हें बुलाना पर
चिड़ियों की पुकार
और सूर्य का प्रकाश
हड्डियों से लेकर आत्मा तक
चुप-चाप हाथ की पकड़
कैसे ढीली हो
इसका जादू सिखा जाते हैं,
रात कितनी भी गहरी हो
और दिन कितना भी प्रकाशमान
आदमी की आंखों से दोनों ही
जुदा हो जाते हैं।
(अप्रमेय)

दो-चार हो जाने के लिए

आकाश में तो मिलते नहीं दाने
फिर ये चिड़िया क्यों उड़ती है
पंख पसारे इधर-उधर,
निसर्ग ने वैसे ही तो नहीं
दिए उन्हें पंख जैसे
वैसे ही तो नहीं उन्हें
देख कर मुझमें चला आया ये प्रश्न,
इतना मूर्ख तो नहीं लगता
कि अनंत आकाश की यात्रा को
चिड़ियों के पंख के मत्थे मढ़ कर
वह ध्यानस्थ हो गया हो,
आंखो से दूर उड़ती चिड़िया
आंखो के अंदर नांव की तरह
तो डोलती नहीं
वह तो अपने आस-पास, आगे-पीछे
हमें भी तो साथ लिए
सहभागी बना रही होती है
जो कभी न सुलझे ऐसे प्रश्नों से
दो-चार हो जाने के लिए।
(अप्रमेय)

गीत-नुमा

धड़कन कौवे की तरह जब
कांव-कांव करने लगे
और स्वांस हैण्डपम्प की आवाज सा
चोचियाने लगे तब 
कोयल की आवाज 
मृत्यु के स्कूल में बज रहे
छुट्टी के घंटों सा सुनाई पड़ने
लग जाती है,
कौन नहीं चाहता आकाश को निहारना
पर किन्ही-किन्ही क्षणों में
उसे देखना भर
निर्गुण के दुल्हनिया सा
सिसकता हुआ कुछ
गीत-नुमा हो जाता है ।
(अप्रमेय)

गोरख धंधा सा

मैं लिखता हूँ शब्द जो
लकड़ी की तरह
भाव के जल में डूबते ही
टेढ़ा हो जाता है
तुम्हे मालूम है और
मुझे है यकीन
कविता का सत्य
भाषा की चौहद्दी में
कैसे गोरख धंधा सा
उलझ जाता है।
(अप्रमेय)

फना हो गया

तुम ने तय कर ली हदें अपनी
पार हो कर मैं जुदा हो गया
रास्ते जो कभी थे एक अपने
एक जमी एक आसमां हो गया 
वक्त इतना नहीं के कोई ठहर सके
देखो सब-कुछ कैसे फना हो गया
(अप्रमेय)

तुम आए थे

कागज के फटे टुकड़े की तरह नहीं 
तुम आए थे 
एक पुराने कवि के हस्तलिखित 
कविता की तरह 
जिसको मैंने उसी वक्त
मन की फ़ाइल में
नत्थी कर के सबसे सुरक्षित
जगह रखा था,
तो क्या हुआ पन्ने थोड़े
पड़ गए थे पीले
और ज्यादा छूने से
उसके फट जाने का भय था,
उसका अर्थ मेरी स्मृति में
बना चुके थे एक साकार चित्र
जिसकी आँखों के नीचे
ओस सा ...कुछ बूंद सा
नहीं.. नहीं... भाप के निशाँ सा
शब्द लेटा हुआ था
मैं तो तबसे वहीं आस-पास
उसमें स्वर गूँथने के लिए
भटक रहा हूँ
कल कुछ होगा
उसे आज बैठे-बठे सुन रहा हूँ |
(अप्रमेय )

इसके सिवा

और होना क्या है
जिंदगी में इसके सिवा
कुछ रात जागनी है
कुछ दिन काटना है।
(अप्रमेय)

रास्ता ढूंढ रहा हूँ

तल्लीन और सल्लीन के बीच फासला ढूंढ रहा हूँ...
मैं कहाँ हूँ इस वक़्त रास्ता ढूंढ रहा हूँ।
(अप्रमेय )

Tuesday, October 24, 2017

निकम्मा

मेरी ख्वाहिशों ने मुझे आज यहाँ पहुँचाया
के लोग निकम्मों में मेरा नाम लिया करते हैं ।
(अप्रमेय )

चुप

आँखे धीरे-धीरे
हो ही जाती हैं चुप
जब लड़खड़ाती है जुबान
या यों कहें
कान सुनने से 
मना कर देता है
मद्धिम प्रेमिका की आवाज,
जिंदगी की किताब
पन्नों के ऊपर
शब्द भर मात्र नहीं
तुम्हें पढ़ना है यदि उसे
तो झांकना जरा इधर-उधर
मसलन तुम्हारे जूते पीछे रैक में
किसी बच्चे के जूतों को आगे कर
रास्ता दिखा रहे होंगे
और तुम्हारे कपड़े
अनुभव की इबारत का
तह लगाए चुप-चाप
अनंत की यात्रा से भयभीत हुए
सुन्न करताल बजा रहे होंगे ।
(अप्रमेय )

भीख में मिला ईश्वर

भीख में मिला ईश्वर 
तुम्हे भिखारी ही बनाए गा
मैं इस तथ्य को जानता हूँ 
इसीलिए तुम्हारे 
ईश्वर को नहीं मानता ।
(अप्रमेय)

भागता है शहर

वीरान जंगल से दूर
भागता है शहर
एक लौ उदास जलती है
झोपड़ी के अंदर
और कपूर उधर जल कर
खुशबू बिखेरते हुए
भरे पेट को ईश्वर का
इत्मिनान से इंतज़ार करने का
नुस्ख़ा सिखाता है
उम्र बढ़ती है
और मोह की आत्मा
और भी कस कर
लपेटती है जिंदगी,
मैं उदास हूँ बाहर बारिश में
चिड़िया का घोंसला
भीग रहा है
और चिड़िया उसमें से नदारद है।
(अप्रमेय)

युग संगीत

नए युग में 
विनयी होना
आत्मघाती होना है
नए युग में पछतावा
सबसे बड़ा हथियार है
नए युग की नई परिभाषा
जीवित लोगों नें
मर रहे लोगों के
गर्म खून से लिखी है
खून ठंडा होता है
और शरीर धीरे धीरे सड़ता है
मक्खियाँ भिनभिनाती हैं
नए युग ने इसे
अपने स्मृति में
युग संगीत के नाम से
संजोए रखा है...
(अप्रमेय)

लौ काँपती है

एक लौ काँपती है
स्मृति में
अँधेरा डोलता है 
संग उसके
मैं देखता हूँ 
पतंगों की तरह
नाचते एहसास
जिनके पंख पर
काल की घड़ी के
निशान बने हुए हैं...
(अप्रमेय)

मुझे दिखती है

मेरे गले में मेरा पट्टा
और उसकी रस्सी
मुझे सताती नहीं
और न ही वह 
किसी को दिखती है,
उनके गले में उनका पट्टा
और उनकी रस्सी
उन्हें सताती नहीं
पर मुझे दिखती है,
मैंने अपने मालिक
और उनके मालिक दोनों से
मिलने की कोशिश की
कोई सुराग न मिला
हवा में लहराता
एक डंडा पौधे से
फूल की माफ़िक
गिरा जमीन पर
जिसकी मुठ पर
भूत के संस्कार थें
मध्य में वर्तमान की निःसंगता
और नोक पर
भविष्य के सपने
मैं खोज रहा हूँ अपने हाथ
ताकि उसे मैं उठा सकूँ
और फिर बाद में
तय करूँ कि इससे
अपने को या फिर किसी
दूसरे को कैसे
काबू में करूँ ।
(अप्रमेय)

'ईश्वर ने कहा'

चुप हो जाना 
सिर्फ उनके लिए ही नहीं 
अपने लिए भी कभी-कभी 
कुछ सोचने से इनकार करना है
कुछ सोचने से 
कुछ कहने की यात्रा
दूसरों के लिए जुबान
हिलाने भर से है पर
मेरे लिए जुबान हिलाने से
चुप हो जाने की व्यथा
एक कथा है
जिसके पन्ने सुनहरे जिल्द में
जब्त होते जाते हैं
और उस जिल्द के ऊपर लिखा है
'ईश्वर ने कहा'
(अप्रमेय )

नमी की तलाश में

कैसी दुनिया आई जहाँ 
डबडबाती नहीं आँखें
कि वे पथरा सी गई हैं
नमी की तलाश में ।
(अप्रमेय )

सफर में जिंदगी

सफर में जिंदगी और मैं 
अलग-अलग हिसाब से 
मिलते रहें 
कभी पेड़ो के नीचे चुप-चुप 
दाना चुगती चिड़ियों के पास
तो कभी सुबह की तैयारी में
लटकते हैंगरों पर आधे गीले आधे
सूखते कपड़ों के पास,
जिंदगी की तमाम शक्ल
आती हैं और जाती हैं
पर उनसे मन भर कभी
मिलना नहीं हो पाता,
सफर में हो जिंदगी
तो अनायास ही
सफ़र में ही हो जाती है कविता
मैं शीशे के सामने कभी- कभी
छूता हूँ अपने हाथ-पाँव
और धीरे से बरौनियों के नीचे
आँखों के अंदर उतर कर ढूँढ़ता हूँ
मंजिल का पता पर
वहां कोई टिकट नहीं मिलता
जिस पर लिखा हो
शहर का नाम और वहां पहुँचने का समय
सफर में जिंदगी और कविता
कितनी दूरी और कितना भाव
इकठ्ठा कर सकेंगे
ये कौन जानता है !!!
(अप्रमेय )

क्या करूँ

क्या करूँ 
कि दिल लग जाए
कुछ हो जाए 
कि दिल लग जाए
इधर देखूं कि उधर देखूं
किधर देखूं
कि दिल लग जाए
न आने का कोई खत
न बुलावे का कोई संदेश
कहाँ चला जाऊं
कि दिल लग जाए
पत्थरों में तलाशूं या
मूँद लूँ आँखे
तुम्ही बताओ कि
तुम्हे कैसे बुलाऊँ
कि दिल लग जाए
(अप्रमेय)

कदम

जहाँ जहाँ निकले हैं कदम
पहले उन्हें लौटाना होगा
घर में ही बैठा है वह कबसे
पहले उसे मनाना होगा
तुम्हारी आदत में शुमार है 
चलते हुए इधर-उधर देखना
लौटना है जो घर अपने
अपनी हसरतों को मिटाना होगा।
(अप्रमेय )

खिला हुआ गुलाब

खिला हुआ गुलाब
मेरी बालकनी में
पूछता है मुझसे सवाल
मैं तो आ गया तुम्हारे लिए
और अब जाने को भी हूँ तैयार
तुमने सोचा कभी
कि तुम कब आओगे
मेरे द्वार ।
(अप्रमेय )

विकास का पहिया

विकास का पहिया यहाँ तक आया है 
मजदूर ने भेली की जगह पार्लेजी को अपनाया है |
(अप्रमेय)

मंदिर और बाजार

बैठकें घर के पूजा की मंदिरों में चली गईं
इश्क की बाजारी हुई और वो कोठों पर अटक गई।
(अप्रमेय)

कोई नहीं देखता

कोई नहीं देखता अब 
जी भर आकाश 
पास फुदकती चिड़ियों की 
लेता नहीं कोई आस 
किसको फुर्सत है पेड़ो के पास 
कोई बैठे सुबह शाम फिर भी
जाने क्यों सदियों से वे
देते रहे तम्हारा साथ
आग चाहे यहाँ जले चाहे जले वहां
तुमने उसे छुआ कि जले तुम्हारे हाथ
दरिया चाहे यहाँ बहे चाहे बहे वहां
अंजुरी भर उठाया कि गीले हो गए हाथ,
किसे फुर्सत कि इन किस्सों को दोहराए
आदमी है वह आदमी सा जीया चला जाए !
(अप्रमेय )

उनके साथ मिलकर

जो तकनीक जानते है,
जो भाषा को समझते हैं 
या यों कहें जिनके पास किसी भी क्षेत्र का 
कोई ज्ञान है वे सभी इसके उपयोग से पैसा कमाते हैं, 
जो कुछ नहीं जानते वे इनके पीछे 
अपना श्रम-दान दे कर पैसा कमाते हैं,
इन सब के बीच कुछ ऐसे हैं जो
श्रम की क़ीमत पर बवाल मचाते हैं
दूसरे तरह के लोगों से हमदर्दी दिखाते-दिखाते
सब कुछ जानने वालों के साथ मिलकर
संविधान बनाते हैं ।
(अप्रमेय)

अपना-शहर

है अपने शहर की दोस्तों बात ही कुछ और
रखो अपने कदम इधर शहंशाह की तरह।
(अप्रमेय)

लोकतंत्र

लोक तंत्र के कुर्ते के
ऊपर की जेब में 
पड़ा है गांधी का चश्मा
लोकतंत्र के कुर्ते के 
निचले दोनों जेब में पड़ा है
एक तरफ भारत और एक तरफ
पाकिस्तान का नक्शा
लोकतंत्र का कुर्ता
खेतों की मेड़ों सा सिला जा चुका है
लोक तंत्र का कुर्ता
खलियान की तरह गांव से दूर
बसा दिया गया है
लोकतंत्र का कुर्ता
कुएं की जगत पर पानी पी कर
बरम बाबा का भस्म लगाए
बसते जा रहे शहर में
ढूंढ रहा है आदमी
लोक तंत्र के कुर्ता की नाप का
नहीं मिल रहा कोई आदमी।
(अप्रमेय)

दीपोत्सव की सभी को शुभकामनाएं

एक दिया तेरे भी नाम का जलाऊंगा
रौशनी तेरे साथ मैं भी जल जाऊंगा ।
(अप्रमेय)

गुरूर

गुरूर में सर उठा के जो चल दिया था कभी
निगाह खोजती हैं अब के सजदे में सर झुका दे कोई ।
(अप्रमेय)

गिरिजा देवी को विनम्र श्रद्धांजलि

कुछ कह दूं ऐसा मन कहता है
पर कौन इसे सुनता है,
लिखना-पढ़ना सब वाहियात सा हो जाता है
जब प्यार से हमें कोई देख जाता है
कभी न काम आई ये मैंने आजमा के देखा है
दुनिया ने जिसे जद्दो-जहद से खरीदा है
ईश्वर है या नहीं कौन इसे ढूंढता है
पर मैंने उसे बाजार में बिकते हुए देखा है
किस्सा कोताह शायरी सब कुछ एक बहाना है
आदमी को एक दिन बिना कुछ कहे चले जाना है।
(अप्रमेय)