Friday, July 31, 2015

वह ब्याहता

वह ब्याहता
जो ला सकी
उसके बाप की कुल जमा-पूंजी थी
पैसे से ही नहीं
इज्जत की भी पगड़ी
जगह-जगह
सेठ,सुनार,मित्रों
और गुरुवों के चौखट पर
उसके बाप ने उतारी थी,
वह ब्याहता अपने होने का अर्थ
न ही माँ के आँचल में ढूंढ सकी
न ही बाप के कंधे पर,
धरती उसके विराम की नहीं
यात्रा की सड़क है
जिस पर ससुराल का रथ
दौड़ता है
कोई भी सवार हो सकता है
कोई सारथि  भी
वह पहियों  की कील  की तरह धुरी बन
काल को निहारती रहती है,
ब्याहता का
ससुराल और  मायका
गड़े बांस की तरह दो छोर हैं
जहाँ वह अपने होने को
अरगनी के मानिंद
बाँध देती है
 दोनों मुहाने कोई कपड़ा
गीला हो गन्दा हो
उसे अपने आँखों के गड़ही  में धोकर
टांगते हुए सुख देती है।
(अप्रमेय )

Wednesday, July 29, 2015

गरीब

गरीबों की झोंपड़ी
टट्टीयों से ढंकी जाती है
तुमने गुस्लखाने में
अपनी  विष्ठा के त्याग का
नाम 'टट्टी ' दिया,
कोई क्रान्ति इसके विरुद्ध
कभी छिड़ी; तुमने सुनी ?
ग़रीब बिना नुख़्ते के भी
गरीब लिखे जा सकते थें
लिखा नहीं गया,
जिन्होंने नुख़्ता नहीं लगाया
उन्हें शब्दों से गरीब समझा गया
शब्दों के दलालों को
आदि -अंत के बीच संबंधों से
क्या लेना -देना
वह तत्काल का मुँह देखते हैं
शब्दकोश की कचहरी में
जज के शब्द दुहराते हैं
इसी का पैसा पातें हैं
नई दुनिया में
किसी बड़े शहंशाह ने
गरीबों को मंत्र दिया है -
"गरीब पैदा होना गुनाह नहीं : गरीब होकर
मर जाना गुनाह है"
मैं चीख कर पूछता हूँ
अमीरों से
गुनाह क्या है ?
जरा इसको जोर से चिल्लाना।
(अप्रमेय)   

Wednesday, July 8, 2015

तुम

रेत पर बैठे पंछी
जैसे सागरों में डुबकी
लगा आतें हैं
वैसे न चाहते हुए भी
ताल-ताल घाट-घाट
तुम याद आते हो,
सालती है अंदर
बराबर ये बंजर भूमि
देखता हूँ कभी-कभी
कुछ फूल खिल आतें हैं,
राह कोई जब-जब न रहा
तुम तब-तब
खेत-खेत मेड़-मेड़
फुनग आते हो,
स्वांस-स्वांस जाती है आती है
कोई महक
ह्रदय के जंगल में
डाल-डाल तुम
लटक जाते हो

(अप्रमेय )

Monday, July 6, 2015

एक-क्षण, तत-क्षण

 बेला  गुलाब जूही चंपा चमेली
और भी जाने क्या-क्या
ये महज फूल नहीं
अस्तित्व प्रदत्त सनद हैं
तुम्हारे
कि तुम प्रेम कर सको ,
महज इनमे से गुलाब कभी
तय कर लें किसी सुबह
न खिलने का
तो सूर्य नहीं उगेगा पूरब से,
ये भरोसा नहीं दावा है
जिसे दुनिया का कोई ग्रन्थ, विज्ञान
झुठला नहीं सकेगा
मेरे रहने न रहने के बाद,
ये वचन सूर्य के लिए भी ढाल  बनेगा
और तुम सब के लिए
हौसले की उड़ान,
आजमाना  हो तो कभी आजमा लेना
सभी सांस भर न लेना एक-क्षण
मुरझा जाएंगे सभी फूल तत-क्षण
( अप्रमेय )