Wednesday, September 25, 2013

आज एक शाम


शाम की कोई तस्वीर नहीं होती
वह बस होती है
कभी-कभी
बाहर बरामदे के नीचे
इक्कठे हुए ढेरों पत्तों और
शहर से उड़ कर आये
ढेरों कागजो और मिट्टी के साथ ।
वह होती है पेड़ के नीचे
ताला लगे खड़ी साइकल के साथ
स्वांस लेती किनारे दरवाजे के बहार
पड़े चप्पलो के पास ।
शाम होती है
बच्चो की गेंदों के साथ
दौड़ती इधर-उधर गलियों में
गूंज के साथ ।
कभी-कभी शाम
किन्ही-किन्ही की आँखों में होती है
इंतज़ार के साथ ....
आज सिर्फ केवल शाम है
मुझसे अलग- थलग पड़ी
केवल अपने साथ ।
(अप्रमेय )

Friday, September 20, 2013

राग मारवा


रौशनी के जाने 
और अँधेरे के आने के बीच 
वह कौन था 
जो देख पाया तुम्हारा 
संधि-मिलन या 
संधि-बिछोह,
निःशब्द 
झरता रहा वह 
अनादि  काल से 
उभरता विलुप्त होता 
फव्व्वारे सी शक्ल बनाता 
और जो हथेलियों से छूता उन्हें 
उनके हाथो में बूंद सा 
टपक कर 
हथेलियों की लकीरों में राह बनाता ,
वह चलता रहा 
अपने ह्रदय में असंख्य प्रश्न बटोरे 
झलकता रहा सांझ कहीं नदी किनारे 
जलता रहा ढेबरी सा कहीं ओसारे 
सुलगता रहा चौके में कहीं किनारे 
तुम धन्य हो 
हे भरत पुत्रों 
नंदीपाठ को तुमने 
अपने गले लगाया।
(अप्रमेय) 


Wednesday, September 18, 2013

जिन्दगी


जिंदगी  तुम दिख ही जाती हो
इधर उधर
पलकों पर
मुदती-खुलती हुई
झर-झर बहती हुई
मसलन कहीं भी
नसों में दौड़ती हुई।
मरघट को जाती हुई
राग-विराग का दीपक
ह्रदय में धड़काते
तुम पड़ी दिख ही जाती हो
ओस सी पत्तों पर चिपकी हुई
पेड़ के नीचे छाह सी फैली हुई
छत्तों सी कहीं किनारे
छत के नीचे मधुरस बटोरते
या घर में बचे कहीं किनारे
पड़े आलू में अंकुरित होती हुई।
तुम सुनाई पड़ ही जाती हो
कोयल के कूक के पीछे
नक़ल करते किसी बच्चे की पुकार में
पाठशाला में ककहरो की गूँज में
तुम महक ही जाती हो
घंटियों की आवाज के बीच
गुथी हुई प्रार्थनाओं में धूप-बाती सी
महकती- उड़ती हुई।
डगमगाती हुई धीरे-धीरे
बाबा की लाठी में उपर पंजो के बीच
फ़सी हुई।
(अप्रमेय )




Wednesday, September 11, 2013

राग यमन :


पंछियों का समूह 
जो उड़ चला था सुबह 
वह गोधरी बेला  में 
अपनी चोंच में दाना दबाये 
लौट रहे हैं 
अपने-अपने घोंसलों मे 
उन्हें तय करना है 
बस थोड़ा ही रास्ता और 
उन्हें पता है 
अपने ठीये पर 
पहुँच जाने का सुख। 
उनके ह्रदय में 
आच्छादित है दिन भर की हरियाली 
खेतो के बीच से 
गुजरती बहती-झूमती नदी 
और इन सब के अलावा 
जो बच गए आज फिर 
शरारती बच्चो के ढेलों से 
बहेलियों के जाल से 
चिमनी की लपटों से,
वे पहुँच चुके है अब 
अपने-अपने घोंसलों मे 
उन्हों ने छोड़ दिया है 
ढीला अपने पंख 
अपने घोंसले के अन्दर 
अपनी आवाज को 
पूरी ताकत के साथ 
दूसरे पेड़ के घोंसले तक पहुंचा कर 
चुप चाप रात को निहारते सो जायेंगे । 
(अप्रमेय )