Sunday, September 14, 2014

वसन्त

वसन्त:
तुम्हारे गमले में भी तो
उतरा होगा वसन्त
अपनों से कटा हुआ
चम्मच भर वसन्त
तुम्हे कितनी ख़ुशबू देता होगा ?
मैं तो देख न सका
उसे उतरते-पसरते
जंगलों- पहाड़ों और
मरघटों में…
पर इस उलझन में बुन गया
एक पद--- वसन्त 
यह पद एक पद नहीं
वसन्त है 'वसन्त'
तुम उतरो वसन्त 
उनके लिए भी
जो सिर्फ़ चाहते हैं
छटाक-भर वसन्त,
और उनके लिए भी पूरा का पूरा
लबालब गड़ही-पोखरा, तालाब
भर कर
जो सुबह- साँझ 
साझे की आस लिए
तुम्हारे लिए भर-पेट  गीत  गाते हैं

(अप्रमेय )

Tuesday, September 9, 2014

रात हुई

अब चलो सो जाओ कि रात हुई
क्यों न रूबरू हो जाओ कि रात हुई
इतनी शिद्दतों के बाद मिले भी कि रात हुई
रात हुई की सी मुलाक़ात कि फिर रात हुई

(अप्रमेय )

उदासी सिर्फ एक कहानी है

यह उदासी लपक कर कूद पड़ी
कनाट प्लेस में फुटपाथ के किनारे
उड़ी-पड़ी कथरी के उपर,
यह उदासी हाथ नहीं मिलाती
गोद में चढ़ बैठती है
पत्थरों को फोड़ती
उस औरत के आँचल को पकड़ कर,
ये उदासी कभी पूरी टूटती नहीं
न गिर कर पूरी हो जाती है बेहोश
तुम नाप सकते हो
इंच टेप से कभी-कभी उदासी
झरते डाल से उन पत्तों को अलग होने के ठीक बाद
और गिरते भूमि पर उसके न सटने के जड़ो-जहद के ठीक पहले
उदासी आँखों में पानी नहीं
उसकी आँखों में डबडबाने के पहले
और गिर जाने के बाद की
कहानी है |

(अप्रमेय)

पूरा सवाल

कभी-कभी
मैं हाथ डालता हूँ जब
अपने झोले में
तो उसका कोना
मुझे पकड़ा जाता है
एक-सकून, एक-ठंडक
जहां मुझे घर बसाने की इच्छा होती है
जिंदगी का घर
इतना छोटा हो सकता है क्या ?
जहां रहा जा सके
खाना पकाया जा सके
या फिर अपनी इच्छाओं का
सामान रखा जा सके
कभी-कभी
ऐसा  सोचना
सिर्फ सोचना नहीं
जिंदगी का पूरा सवाल
बन जाता है

_ अप्रमेय _

यह देश

इस देश में पिता चुप हैं
और माताएं अगोर रही हैं
अपने-अपने पतियों का अनुपस्थित आदेश
भगवान् तो कभी भी यहाँ नहीं आया
हिन्दुओं के पास
मुसलमानों और इसाईयों के पास
हाँ उसका झंडा था उनके पास
जो टेक्नोलौजी से भी सूक्ष्म
एक ऐसा बटन था
जिसका होना उनके लिए
सम्मान के साथ-साथ
भोजन का जुगाड़ था
मुझे परिस्थिति को
अब भगवान् नहीं कहना
क्यों कि उसने कभी
सरकारी नौकरी नहीं दी किसीको
इस देश में
राजस्थान के राजपूत
अब कहते हैं
चुपके से
हम उस जाति के नहीं
सिर्फ कागजों में
चस्पा हैं
सरकारी दफ्तरों में
फाइलों के बीच
दबे हुए,
बाहर कपड़ा पहने हुए
जो हम करते हैं नौकरी
सिर्फ उसके लिए
हमने बदला है अपना रूप,
हमारा खून
राजपूत का ही खून रहेगा
चाहे किसी भी
सदी के लैब में इसे टेस्ट करा लेना,
मुझे पंडितों से नहीं
और न ही राजपूतों से
पूछना है यह सवाल
मैं सुनना चाहता हूँ उनसे
जिनके लिए यह"शब्द " बना
और सरकारी नौकरी दिलाने का गुलेल बना
कि इस शब्द का प्रतिबिम्ब तुम्हे दिखा क्या
औरत होने के आईने में
माँ होने के आईने में
पिता होने के आईने में
या फिर बेटा, बेटी होने के आईने में
सब कुछ होने के सन्दर्भ में
तुम अपने को सभ्यता के किस पार
देखना चाहोगे ?

(अप्रमेय )

पेड़

पेड़ तुम पेड़ रहोगे कबतक ?
आदमी के शब्दकोष से
कभी कटते कभी झरते-फ़ुनगते
तुम्हारा नाम
समय के पन्ने में
अर्थ बदलता रहता है ।
चिड़ियों के लिए तुम घर हो
और बहती हवा में
उससे इठलाती  मदमस्त झूमती प्रेमिका
खेतो के लिए तुम परदेश गए पिता हो
जो बादलों को अपनी हरियाली
बेचकर पानी का जुगाड़ करता है ।
पेड़ आदमी की समझ में
तुम सिर्फ पेड़ हो
कभी-कभी एक झोले की तरह
जिसमे वह अपने वीश्वास को 
प्रमाणित करता है
एक- एक मुहावरे
निकालते हुए ।
पेड़ तुम पेड़ न रहो
तभी आदमी , आदमी नही रहेगा ।
सभ्यता को अभी ख़ारिज होना है
आदमी और आदमियत
अभी गाली नहीं समझे जा रहे हैं
यह तो सिर्फ चल रही
न्यायलय की एक बहस है
जिसका फैसला होना अभी बाकी है
पेड़ मुझे फैसलों और कानून की फिक्र नहीं
तुम्हारी ज्यादे है
तुमने जो उगाई थी  कल
मेरे घर के बगल में वह गुलाब सी कविता
वह आज फिर सुना रही है
वही गुलाबी कविता

(अप्रमेय )