Thursday, February 19, 2015

ऐसा सोचना

कभी-कभी
मैं हाथ डालता हूँ जब
अपने झोले में
तो उसका कोना
मुझे पकड़ा जाता है
एक-सकून, एक-ठंडक
जहां मुझे घर बसाने की इच्छा होती है
जिंदगी का घर
इतना छोटा हो सकता है क्या ?
जहां रहा जा सके
खाना पकाया जा सके
या फिर अपनी इच्छाओं का
सामान रखा जा सके
कभी-कभी
ऐसा सोचना
सिर्फ सोचना नहीं
जिंदगी का पूरा सवाल
बन जाता है

_ अप्रमेय _

देखो इसे गौर से देखो

देखो इसे गौर से देखो
कोई ख़ून का कतरा
या कहीं पसीने की कोई बूंद भी
टपकी क्या ?
देखो और पहचानो
यह कौन है
औरत है ?
माँ है ?
माशूका भी नही ?
देखो उसकी छाती
कोई मांस का गोला हिला क्या ?
देखो उन्हें भी गौर से देखो
कोई बच्चा ?
कोई बेटा ?
कोई शरारत उठी क्या ?
देखो शब्दों से अलग
किताबों से जुदा
आग को
जो कभी बुझ गयी थी
तुम्हारे अन्दर
वह जली क्या ?(अप्रमेय )
समझो अभी कि ढल जाएगी रात
ये पर्दा हटाओ कि थम जाएगी बात
उनकी फ़िकरों पे इतना न फ़िक्रमंद होना
आओ तलाशे कि असल है क्या बात, 
कोई किसी पर इतना ज़ोर डाल नहीं सकता कि
हाथ थामो मेरा फिर देखो हर तरफ कैसे फैलेगी आग।

अप्रमेय

दाढ़ी

उसकी दाढ़ी
धीरे-धीरे बढ़ी होगी
साल दर साल,
जोड़ते हुए ,सपनों के लिए नहीं
जुगाड़ करते दो पैसे के लिए
ताकि उनसे
चूल्हे में सुलगती रहे आग,
उसकी दाढ़ी यों ही नहीं बढ़ गई होगी
धीरे-धीरे बढ़ी होगी
चिल्लाने के बरक्स
मौन के साथ खड़े होने में
अपने बच्चे को अस्पताल
दाखिल न करा पाने के कारण
अपने हाथो में उसकी दर्द की कराह को
मौत तक जोड़ते हुए
उसकी दाढ़ी
उसके लिए उसके चेहरे की नकाब है
जिसे वह आईने में नहीं देखना चाहता,
आज मंदिर के सामने
गुमटी के अंदर
उसकी आँखें
चाय पकाती हैं बिलकुल कड़क
देखो उसकी दाढ़ी है आज
द्रष्टा...
जो कि उसकी चेतना के साथ
हमेशा बढ़ती और गहराती रही
काली से सफेद होती रही
(अप्रमेय)

जो जान सका


मैं जो जान सका
वह यही कि यहां
समय के पन्नों पर
कुछ-अकुछ के बीच
बीननी है अपने काव्य की कहानी,
बिना अभ्यास के
बीचो-बीच
किन्हीं अन्तरालों में
पूरे जोर से
निभाना है अपना किरदार,
अपने ही निर्देशन में
पूरे का पूरा चाक-चौबंद
यहीं इसी जगह
सुबह उठते हुए
सूरज की रोशनी में
चांद-तारों की झोली में
छुपा देने हैं अपने सवाल,
होगी, फिर वही होती हुई रात
शताब्दियों के साथ
जवाबों की घंटी लिए,
तुम्हें ढूंढना है अपना सवाल
जिसके गीत गाये जा सकें
गुनगुनाएं जा सकें
(अप्रमेय )