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Tuesday, June 23, 2015

कृष्ण

कृष्ण
तुम द्रौपदी के ह्रदय में
सूर्य की तरह मत उगो
दुशासन की कंठ से
रुधिर की तरह बहो
कहानियाँ जिन्होंने लिख डालीं
बंधे-बंधे से शब्दों में
उनके हाथों में धनुष बन
जिंदगी के इस कर्ण मंच को बधो
आओ कृष्ण
श्रद्धावान आलसियों की श्रद्धा
और परंपरा से ऊबे नास्तिकों को
पार-अपार की फांसी से छुड़ाओ
जिंदगी को महकाओ
विवेक की पतवार थमाओ
( अप्रमेय )

Wednesday, June 10, 2015

कुछ फुटकर शेर 2

उदासी इस कदर कि दबाई न जाय                                                                                                
वो आएँ न आएँ उन्हें बताई न जाय ।।

बीते बीते बीत गई एक रात और
होते होते हो उठी एक सुबह और

(अप्रमेय)







कुछ फुटकर शेर

1-  सीयसतें मशगूल थी जब इल्म के कहकहों में 
      कोई भूखा रात आवाज़ दे दे कर सो गय ।।

2-   तमतमाते चहरे गर्म साँसे टपकते ख़ून आँखों से
       वह सहम गया देखो होठों से आवाज नहीं आती ।।     


3   कोई भी बात अब नई नहीं होती                 
     जिंदगी फिर बयां क्यों नहीं होती ।।
(अप्रमेय)