Thursday, April 26, 2018

सांचा


एक तड़प जो उठी थी
उसे गा दिया
जब कभी भी उसे सुना जाएगा
प्रेम पथिकों के बीच
संवाद हो ही जाएगा,
                   
एक रूप बिना स्पर्श के
गढ़ता जा रहा है अंदर
कोई यायावर प्रकट होगा
श्वेत कागज सा  
जिसपर आँखों की तुलिका
अपने भावों से
भर देगी उसमें आत्मा का रंग,

देर-सबेर
कोई न कोई सांचा
मिल ही जाएगा
जिसमें रूप का अरूप से
मिलन हो ही जाएगा
 (अप्रमेय)

Monday, April 23, 2018

मेरा शहर

है अपने शहर की दोस्तों बात ही कुछ और
रखो यहां कदम इक शहंशाह की तरह।

लोकतंत्र का कुर्ता

लोक तंत्र के कुर्ते के
ऊपर की जेब में 
पड़ा है गांधी का चश्मा
लोकतंत्र के कुर्ते के 
निचले दोनों जेब में पड़ा है
एक तरफ भारत और एक तरफ
पाकिस्तान का नक्शा
लोकतंत्र का कुर्ता
खेतों की मेड़ों सा सिला जा चुका है
लोक तंत्र का कुर्ता
खलियान की तरह गांव से दूर
बसा दिया गया है
लोकतंत्र का कुर्ता
कुएं की जगत पर पानी पी कर
बरम बाबा का भस्म लगाए
बसते जा रहे शहर में
ढूंढ रहा है आदमी
लोक तंत्र के कुर्ता की नाप का
नहीं मिल रहा कोई आदमी।
(अप्रमेय)

गुरूर और सजदा

गुरूर में सर उठा के जो चल दिया था कभी
निगाह खोजती हैं अब के सजदे में सर झुका दे कोई ।
(अप्रमेय)

गिरिजा देवी की याद में

कुछ कह दूं ऐसा मन कहता है
पर कौन इसे सुनता है,

लिखना-पढ़ना सब वाहियात सा हो जाता है
जब प्यार से हमें कोई देख जाता है,

कभी न काम आई ये मैंने आजमा के देखा है
दुनिया ने जिसे जद्दो-जहद से खरीदा है,


ईश्वर है या नहीं कौन इसे ढूंढता है
पर मैंने उसे बाजार में बिकते हुए देखा है,


किस्सा कोताह शायरी सब कुछ एक बहाना है
आदमी को एक दिन बिना कुछ कहे चले जाना है।
(अप्रमेय)

काश

मेरी उदासी काश कुछ काम आती
किसी का दुख मेरी झोली में ला पाती ।
(अप्रमेय)

शब्द

ये शब्द 
आंसू नहीं है 
ये शब्द प्यार नहीं है 
ये शब्द भूख नहीं है 
नई दुनिया में ये शब्द 
दलाल हैं
जो आदमी से आदमी का
परिचय कराते हैं |
(अप्रमेय)

जाने कब

रेत पर लकीरें 
आसमान में टूटते तारे
और कोई अजनबी सी सूरत
रात को अचानक याद आते हैं
कोई सिलसिला सिले धागों के बीच
उघड़ा सा नजर आता है
रात की अंधेरी रौशनी
दिन के स्याह उजाले में
जुगनुओं सा टिमटिमाते हैं
और जाने कब वे मेरे दरवाजे के
ताले की छेद से घुस कर
मेरे घर की दुछत्ती में बैठ जाते हैं ...
(अप्रमेय)

कब्र

रूह कांपती है 
सहारा नहीं मिलता
कोई नास्तिक फिर 
दुआ बन के टकराता है
और मेरी शंका की कब्र 
खोद डालता है….
(अप्रमेय)

घूंघट ओढ़े

एक कविता घूंघट ओढ़े
रोज आती है सपनों में
सपनें में वह दिखती है
पर कुछ कहती नहीं,
मैं उसके पास नहीं जा पाता
और न ही पूछ पाता हूँ
अक्सर उसके आ जाने की वजह,
उसका चेहरा भी नहीं दिखता
और सुबह जब मैं
कोशिश करता हूँ उसे
याद करने की
तो न ही उसकी साड़ी का
रंग याद आता है
और न ही वह जगह
जहां वह रोज आकर
घूंघट के अंदर से निहारती है मुझको,
कविता !!!
बिना तुम्हारे चेहरे के
कितने झूठे हो गयें हैं ये शब्द
ये तुम बता पाती
काश तुम अपना चेहरा लेकर
हम सब के सामने आ पाती।
(अप्रमेय)

सदियों से

पहले उन्होंने ने 
ध्वनी में भरा शब्द 
चाशनी सा मीठा और कहा- माँ
धीरे से बताया चाशनी
के पीछे उसे तुम्हारे जबान तक 
लाने वाले का नाम- पिता
बढ़ने लगनी सम्पदा तुम्हारी
फूलों से हुआ परिचय
जिसके साथ जाना तुमने सुंदर
फिर सुंदर शब्द आकृति में
ले आयें तुम्हारे पास
सदियों का भंडार,
शब्द जो लगे गूंजने
तुमने कहा आकाश
और फिर पीछे छूट गया आकाश ,
तुमने सुना शब्दों में पाप
प्रार्थना की ही तरह उसे तुमने आजमाया
और धूँए की तरह उसे तुमने उड़ने दिया
लोगों ने बताया चिड़िया उड़ती है
क्यों कि उनके पंख होते हैं,
तुमने अपने आप को समझाया
शब्दों में जिंदगी
और जिंदगी में शब्द
एक ध्वनि से ज्यादा कुछ और नहीं
इस लिए सदियों से चलता रहा
पश्चाताप !!!
(अप्रमेय)

ईश्वर की लोरी

कुछ भी हो सकता है यहाँ
तुम देखो तो 
आकाश उतर कर चला आता रहा सदियों से 
तालाब के अंदर,
तुमने पहचाना नहीं पेड़ों का 
धीरे-धीरे झूलना उसी
तालाब के अंदर
उसी तालाब में
दर्पण की तरह
उतर आई कितनी बार
तस्वीर तुम्हारी
कितनी बार मन तुम्हारा
तालाब की लहरों में
आगे और आगे की तरफ बढ़ता हुआ
हो गया क्षितिज के पार,
तुम्हे पता नहीं !!!
जाने कितनी बार
उसी तालाब में
तुमने अपने पाँव डालकर
जाने कितनी बार सुनी
बिना स्वर के
ईश्वर की लोरी.....
(अप्रमेय)

बाऊ जी

बाऊ जी ने कहा था
कि जब कुछ अच्छा विचार आए 
तो उसे तुरंत करना 
और जब कुछ बुरा विचार आए
तो उसे थोड़े देर स्थगित कर देना, 
मैं तबसे लगातर
स्थगित करते ही आ रहा हूँ
सब-कुछ
मैंने अगले जन्म तक के लिए
स्थगित कर रखा है प्रेम
लोकतंत्र के इस ढाँचे में
स्थगित कर रखी है करुणा
स्थगित कर रखा है संवाद,
मैंने स्थगित कर रखी है प्रार्थना
स्थगित कर रखा है अपना सत्य
और वह सब-कुछ जिसे
दुनिया ने अच्छा कहा है
(अप्रमेय)

किसी ने कुछ किसी ने कुछ समझा

कोई तार हृदय का 
इतना ढीला हुआ कि 
छेड़ना तो दूर
पकड़ में ही नहीं आया,
एक राग सिलसिले में बज रहा था
पर लोगों ने उसको धुन बनाया
कोई रास्ता फकीर की दाढ़ी सा
उजला दिखा पर सब ने उसे
पहाड़ों की झाड़ बताया,
लोगों ने मुझे समझा
अपनी-अपनी समझ से
किसी ने हैवान तो
किसी ने भगवान बनाया...
(अप्रमेय)

बेतरतीब

सुबह बिस्तर से 
उठने का मन नहीं करता
पढ़ते-पढ़ते जो किताब रात
पड़ी रह गई थी सिरहाने
उसके पन्ने कुछ चिमुड़ कुछ
फट से गये
सुबह बिस्तर की सिलवटें और
बेतरतीब ओढ़नी निद्रा सौन्दर्य का
क्या इतिहास पढ़ा रहे होते हैं!
मैं सुबह-सुबह ईश्वर को
नहीं याद करना चाहता
अच्छा है कि पंडितों और मौलवियों का कारोबार
सुबह बाहर मंदिरों में घण्टा बजाने
और अजान देने का है
आदमी को सुबह अपने
घर में होना चाहिए
अपने बिस्तर के पास
बेतरतीब चीजों के बीच रिश्ता जोड़ते हुए।
(अप्रमेय)

आदमी होने का अर्थ

धूप निकल आई है
और कौवे अपनी चोच से
डाल पर बैठे अंगड़ाई ले रहे हैं
मेरी नजर अटक गई 
कुछ पक्के कुछ कच्चे इमलियों के बीच
मन खट्टा हो गया
पर इस खट्टे होने को
मुहावरे में मत समझना
आदमी ने अपनी सुविधा के लिए गढ़ीं हैं
सूक्तियां,चुटकुले, और न जाने क्या-क्या,
इमलियां लटकी हुई हैं
और कोई भी तोता नजर नहीं आ रहा
तोते पता नहीं इमली खाते हैं या नहीं
मैं नहीं कह सकता,
हरी पत्तियों के ऊपर से पड़ रही धूप
पत्तों के पास कैसा अंधेरा रच रहीं हैं
काले कौवे चुप-चाप
धीरे-धीरे हिल रहे हैं
कुछ-कुछ पीले पड़ गये पत्ते अपने आप
नीचे झर जा रहे हैं
मैंने उठाई एक लकड़ी
कि तोड़ू इमली पर अचानक
रोक लिए अपने हाथ
सोचता हूँ और खोजता हूँ
कि क्यों रोके मैंने अपने हाथ
कुछ जवाब नहीं पाता भीतर
सत्य कहूँ कभी-कभी मैं
अपने आप को कहीं नहीं पाता
आदमी होने का क्या अर्थ है
इमली को देखने भर की तरह
नहीं जान पाता ।
(अप्रमेय)

मैं और तुम

मुझे समझोगे
तो खुद को 
जान जाओगे
अपने बारे में बताना
तुम्हारी तौहीन होगी।
(अप्रमेय)

राख और आग

राख और आग की नस्ल एक है
तुम्हारे हाथ क्या लगा सवाल इसका है
जिन्हों ने उड़ाई राख वे भी
और जिन्हों ने लगाई आग वे भी
दोनों ही आदमी थे
किस्सा यह है कि
जिसके ऊपर पड़ी राख
वह अघोरी हो गया और
जिसके ऊपर पड़ी आग वह
वियोगी हो गया
जिंदगी की पाठशाला में
एक आग जलती रही
सदियों से पेट के अंदर और
एक आग जलती रही चौके के अंदर
एक आग पता नहीं कहां से
बैठ गई शब्द के अंदर
लोग बिना जले जलते रहें
उसमें न कोई आग थी
न कोई राख।
(अप्रमेय

घोंसला

उदासी की चिड़िया
पंख फड़फड़ाती है
मेरे मन के जंगल में
घोंसला बनाती है।
(अप्रमेय)

बात और जान

एक बात लब पर अटकी हुई है
सच कहूँ जान अटकी हुई है।
(अप्रमेय)

तय था

मरना तय था तय कर और कबूल कर के ही आए थे
रोज जान जानी थी यह फरेब यहां आ कर पता लगा।
(अप्रमेय)

वसंत

वसंत की सुबह मुझे नही सुहाती
फिर शाम फुर्सत में गुनता हूँ वसंत
इधर-उधर से
शाम को मैं देख पाता हूँ 
उन बचे हुए फूलों को
जो नहीं चढ़ाए गए किसी देवता के सर पर
मिल पाता हूँ उन चिड़ियों से
जो वसंत के आगमन पर
कतार में उड़ चले थे दिगम्बर पथ पर
वसंत और मैं
मैं और वसंत
दोनों ही एक दूसरे से नहीं मिल पाए
बस खबरें दर्ज करते रहें
सदियों से अपने-अपने
हिसाब के पन्नों पर।
(अप्रमेय)

रोटी

रोटी के निवाले ने 
मुझे स्मृति के दरवाजे पर खड़ा किया
वहां सुनहरे पर्दों पर लिखी थी इबारत
'अन्नम वै ब्रह्म'

मैं उसे धन्यवाद कहता कि अचानक
एक सवाल उस पर्दे के पीछे से
सूर्य की तरह उदित हुआ,
 
उनका क्या दोष था जिन्हें आज
भूखा सोना पड़ा !


मैंने धन्यवाद को स्थगित किया
और थोड़े विराम के बाद
अहं ब्रह्मासि की सत्यता और
और अपनी दयनीयता
दोनों ही परिस्थिति को
थाली में बचे जूठन के साथ
विदा होते देख पाया ।
(अप्रमेय)

शाम ढल रही है

शाम ढल रही है 
और रात गहराने के पहले
इस क्षण की स्मृति मेरे
हृदय के जाने किस जेब में
जगह बनाएगी
मुझे यकीं है ये भी
शाम के किसी ऐसे ही क्षण में
एक अंजान की तरह
सामने आएगी!
(अप्रमेय)

कौन है ?

ये कौन है जो आ रही है जा रही है
कैद है कोई अंदर ये खबर बता रही है
(अप्रमेय)

जंगल

दुख जंगलों की तरह
बेपनाह फैल रहे हैं
कभी कोई फूल उग आता है
उन सब के बीच,

दुख को खबर नहीं सुख की
और सुख को कोई मतलब नहीं दुख से
पत्तों का इतिहास
न जंगल जानते हैं न फूल,


उन्हें वंचित रहना पड़ा है
हमेशा से सुख दुख से दूर
सदियों से वे झरते रहे हैं
खाद-मिट्टी बनने के लिए
जंगल के अंधेरों और
सुगंध के चमक के बीच,


जड़े उन्हें सम्हालती रही और
एक कारोबार की तरह
धकेलती रहीं हैं
हम सब के बीच।
(अप्रमेय)

समुद्र तट

कछुए की पीठ 
किसान की पीठ है
समुद्र मंथन देवता और दानव
के बीच संघर्ष है
कछुआ और किसान 
इनसे अलग अपने काम में लगे हुए
समुद्र को देख रहे हैं
और अपने-अपने ढंग से
जिंदगी के समुद्र का तट
गढ़ रहे हैं।
(अप्रमेय)

बच्चा खिलखिलाता है

बच्चे ही गेंद से खेल पाते हैं
आदमी तो बड़ा होता है 
सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के गोल पिंड में 
विचारों की गोंद सा चिपक कर 
वह छिटकता है इधर-उधर,

मुक्ति और बंधन का टप्पा खाते
आदमी जगत के मैदान में
अपने गेंद के चमड़े का रंग छोड़ता है,


बच्चा आदमी से बहुत छोटा है जो
पिंड से दूर गेंद को मैदान से उठा कर
अपनी पॉकेट की जेब में रख कर
छुपा देता है और फिर
जोर-जोर से खिलखिलाता है
(अप्रमेय)

संकट

बच्चा अपने बाप को 
आशान्वित होकर देखता है
और थोड़ा बड़ा होता है,
 
थोड़ा जब और बड़ा होता है 
देश को देख कर आशान्वित होता है,

फिर थोड़ा और बड़ा हो जाता है
भगवान को बिना देखे
आशान्वित होता है
संकट यहीं से
फिर शुरू हो जाता है।
(अप्रमेय)

उत्तर

स्मृति तुम्हारे प्रेम की 
झर गई गुलाब के फूल सी 
गंध रह गई कुछ देर,
 
जीवन एक डगर सा 
चलता रहा साथ-साथ 
वह भी एक शाम
सुबह के बाद
ओझल हुआ भाप सा,


कुछ चिन्ह रह गए शेष
बचे हुए लोगों के साथ
लोगों ने प्रश्नों जैसे बुनी नांव
आते जाते रहें
इस ओर उस ओर,


उत्तर एक ही था नदी के पास
जो उसे देखने पर मिलता था
(अप्रमेय)

वह लड़का

सड़क पर चलते हुए
अचानक भागती भीड़ में मैंने
एक गाड़ीवान को रोक कर पूछना चाहा
वह नहीं रुका,

भाग रहे एक मोटरसाइकल पर 
एक जवान से पूछना चाहा
वह नहीं रुका,


मैंने साइकल वाले टैम्पू वाले को भी रोका
वे भी नहीं रुके,


मैं चलते-चलते रुक गया था

और पैदल आ रहे एक लड़के को
रोकने की अभी सोच ही रहा था
कि वह मेरे क़रीब आ पहुंचा
और दबी चीख को रोकते हुए
उसने भर्राते स्वर में कहा
मुझे भूख लगी है।
(अप्रमेय)

प्रतीक्षा

मुझे महाप्रलय का इंतज़ार है 
जब देह सहित मैं क्रम से और 
काल से पार हो कर 
मैं वही हो जाऊँगा
जिसके लिए योगी बहुत जल्दी में रहते हैं,
 
मुझे फ़िक्र है तुम्हारी
जो जानते नहीं कि वे क्यों
धूप से अग्नि ले कर और पृथ्वी से
जल लेकर लगातार गलते हुए
खड़े हैं जंगलों में, मैदानों में या फिर कहीं भी
जहाँ वे हमारे लिए स्वांस और छाया का
प्रबंध कर सकें,


मुझे नित्य प्रलय, प्राकृतिक प्रलय में
कोई दिलचस्पी नहीं
मुझे प्रतीक्षा में सुख मिलता है
क्योंकि मैं रचता हूँ वहां अपने अंदर एक सृष्टि
जो महाप्रलय के दिन
बगावत करेगी उससे जो एक मात्र
मेरे सामने खड़ा होगा
(अप्रमेय)

देश

देश की हालत देख रहा हूँ
पढ़ा है इसके पहले का 
इतिहास,
देख पा रहा हूँ आगे भी
इसी की होगी
पुनरावृत्ति,
हमारे जैसे लोगों की
कौन सुना है, सुनेगा
इसी लिए खोज रहा हूँ
कोई वृक्ष जहां ले सकूँ
चुप-चाप मौन
शरणागति!
(अप्रमेय)

बच्चा

सड़क पर गेंद से खेलते
कंधे पर बस्ता लिए 
स्कूल जा रहा है बच्चा,

छोटे कंकड़ पर अचानक 
पड़ती है गेंद
और छटक कर चली जाती है
नाली के अंदर,


वह ठिठक कर रुक जाता है
पहुंचता है गेंद के पास
पहले देखता है अपनी गेंद फिर
औचक इधर-उधर, आगे पीछे
ऊपर नीचे और

 टप्प से उठा लेता है अपनी गेंद,

छोटी-छोटी उगी दूब में उसे
सलीके से पोंछ कर
अपने किताबों के बीच रखकर
वह चला जा रहा है,


मैं उसे देख रहा हूँ
और सोच रहा हूँ,


किताब,बस्ता,गेंद,सड़क,नाली और
बच्चे के बीच घटित हुई यह कविता
जिसे भाषा में ला पाना
कठिन है पर यकीन मानिए
दूब पर लिपटा पानी
मेरी जन्म-जन्मान्तर की
प्यास बुझा रहा है।
(अप्रमेय)

आसिफा के लिए

उनके शरीर लगातार 
श्मशान घाट की तरफ बढ़ रहे हैं 
जिसमें से निकल रहा है धुंआ,
 
उन्होंने अब आग शब्द को
अपनी कल्पना से
मूर्त कर दिया है,


उनकी आँखें पर्त दर पर्त
चट्टानों की तरह
कठोर और नुकीली हो गई हैं,


उन्होंने इस शब्द को
अब अपनी आँखों में
साकार कर लिया है,


बहुत पहले किसी ने
कहा था जिसकी लिखावट
अब पीली पड़ चुकी है
के डरो वह देख रहा है,


आदमी ने अब डरना बंद
जीना शुरू कर दिया है.
(अप्रमेय)

चाँद और आँख

डूब गया चाँद
बादलों के पार
बची रही रात
आंखों के साथ
(अप्रमेय)

सत्य

सत्य सब जानते हैं और 
झूठ वे बिल्कुल नहीं समझते
जिसे वे नहीं जानते-समझते
उसी के आस-पास वे रहना चाहते हैं
वे जो कुछ भी करते हैं उसे देखकर
सभी को ऐसा लगता है
ये तो मेरा सत्य था
जिसकी लौ ने उसे जला डाला।
(अप्रमेय)

अपना अर्थ

किताबों में शब्द के अर्थ नहीं होते
जबतक कि उन्हें पढ़ा न जाए,
कैनवास पर चिड़िया उड़ नहीं सकती
जबतक कि उन्हें देखने वाला न मिल जाए,
तबले पड़े रह जायेंगे
महाप्रलय तक बिना कुछ कहे
जबतक कि उसपर कोई
हाथ फेरने वाला न मिल जाए पर,
मनुष्य एक ऐसा यंत्र है
जिसपर अनंत का सन्नाटा
अर्थ के जाल बुनता है,
कुछ विशेष भार को जाल
संभाल नहीं सकता और
जो हल्के-फुल्के कीड़े-मकौड़े हैं
वे उसमें अटक कर
अपना अर्थ गँवा देते हैं |
(अप्रमेय)

शब्द और समझ

एक शब्द खाली है मेरी कविता में आज
तुम भर देना उसे अपनी समझ के साथ
(अप्रमेय)

घाटी और शान्ति

वे वहां से यहाँ चले थे
बताने कि
प्रेम एक प्रतीक्षित घाटी है जिसमें
शांति का जल फैला है
लबालब असीम,
वे राहगीर थें और चलते-चलते
वे भूल ही गएँ चलना
अब वे दौड़ रहे थे अपने साथियों के साथ,
आगे वे बिछड़ गए
और धीरे धीरे
प्राण त्यागते वक्त वे बस
बुदबुदा रहे थें
घाटी-घाटी शांति-शांति ,
शब्दों में शास्त्रों में लिख दी गई
एक कथा कि
घाटी और शान्ति एक
मंत्र है जिन्हें जपा जाना चाहिए
जब तक कि स्वांस चलती रहे.
(अप्रमेय)