Saturday, March 22, 2014

उदासी


यह उदासी सरहद की सी
जिसके दोनों तरफ
हम और तुम
हम पार पहुँच नहीं सकते
तुम पास आते नहीं  
तुम कुछ कह नहीं पाते
हम कुछ बताते नहीं
पर यह ख़ामोशी
गूँजती है हवाई जहाज जैसी
सरहद के ऊपर
इस पार और उस पार भी
(अप्रमेय )

Thursday, March 20, 2014

उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के जन्मदिन पर

बिस्मिल्लाह !
तुम्हारे जीते जी 
नही सुन पाए वह 
जो तुम शहनाई से 
हर मंच पर 
बजाते हुए बारात का 
सन्देश देते रहे 
नही समझ पाए वह 
जिंदगी एक बारात है 
और हम सब बाराती। 
तुम जिन्दा जब तक रहे 
बजती रही तुम्हारी शहनाई 
और अब 
जब तुम नहीं हो 
गूंज रही है तुम्हारी शहनाई ,
बिस्मिल्लाह !
काशी वहाँ नही 
जहाँ हम सब लोग जाते हैं 
वह तो हम सब के
ह्रदय में है 
जहाँ हम सब कभी 
पहुँच ही नहीं पाए 
बिस्मिल्लाह !
वहाँ तो तुम अब भी 
भोले की बारात में 
आलाप दे रहे हो ,
हमें माफ़ करना 
जो हम तुम्हे समझ नही पाए 
दुनियाँ के बारात में 
ठीक से शरीक तक न हो पाए। 
(अप्रमेय )

Wednesday, March 19, 2014

षड्यंत्र

शाम ढलते-ढलते 
टूटते हैं सपने 
और चाय की चुस्की के साथ 
धुंध हो जाता है 
उनका चेहरा 
दूर होता जाता है 
ग़ुम होते जाने की शक्ल में 
अपने अंतरतम में 
उतर कर देखता है 
वह ,
बहुत भीड़ है अंदर 
सब रेंग रहे हैं 
धीरे-धीरे 
और जिन्हे बैठने की जगह 
मिल गई है 
वह रच रहे हैं 
एक नया षड्यंत्र। 
(अप्रमेय )

Tuesday, March 11, 2014

माँ

माँ 
यह कैसा है तंत्र तुम्हारा 
जो हमें सीखने नहीं देता 
जीवन की भाषा ,
जहाँ व्याख्याएं ही केवल 
लपेटती हैं पतंग के चरखे की तरह 
सभ्यता को 
और उड़ा देती हैं उन्हें 
संसद के छत के ऊपर 
लोकतंत्र के बादल में,
जाने किस हाथ के 
अँगुलियों के इशारे पर 
बह रहा है यह
उन्हें क्या याद नहीं आती 
तुम्हारे रीढ़ की हड्डियां 
जो चटक चुकी थी कई बार 
तुम्हे पकड़े रहने के साथ,
आँख की पुतलियां 
जो अटक गयी थी 
कई रात तुम्हे सुलाते हुए 
जगने के साथ
हम कौन से हैं तुम्हारे बच्चे ?
जो देखते हैं 
तुम्हारे दूध को 
पसीने में घुलते हुए 
सड़क पर बिकते-नुचते हुए 
माँ तुम माँ हो 
कोई ऐसा लोरी सुनाओ 
जिससे सब-कुछ याद आ जाय 
जो हम भूल चुके हैं।  
(अप्रमेय )

Monday, March 10, 2014

कविता

मेरी नजर में कविता 
रोते हुए बच्चे को 
चुप कराने की विधि हो सकती है 
गर्मी में छाव 
दुल्हन के लिए श्रृंगार 
दुल्हे के लिए 
अपनी साथी का संकल्प 
हो सकती है ,
कविता पन्नो पर लिखी 
तुकबंदी नहीं 
बल्कि 
चिड़ियों की उड़ान 
चूहों का बिल खोदना 
घर में बिखरे अखबार को 
तह कर अलमीरा में रखना
परदेश जाते वक्त बड़ो का 
चरण छूना हो सकती है,
कविता महज 
पेड़ों को देखना हो सकती है 
गुलाब-बेला को छूते वक्त 
हातों का इत्मीनान हो सकती है,
कविता किसी बुजुर्ग के लिए 
खटिया बिछा देना 
उसका परखत माज देना 
रात और दिन में भी 
उसके बिस्तरे के पास 
लोटा भर के पानी रख देना हो सकती है 
और जब वह कुछ बोलें 
बिना जवाब दिए 
उनको सुनना हो सकती है,
कविता चाय बनाना 
खाने के बाद पानी पीना 
और दांत मांजने के बाद 
जिब्भी से जीभ छीलना हो सकती है,
आप जो भी तर्क दे कविता के लिए 
पर मेरी नजर में 
चुप-चाप हाथों में कलम लिए 
आकाश को निहारते 
कही गुम हो जाना भी 
कविता हो सकती है। 
(अप्रमेय )