Tuesday, December 31, 2013

नए वर्ष ३१/१२/१३

तुम आना नए वर्ष
कुछ इस तरह
जैसे गाँव से अनाज लादे
बाबा चले आते हैं
कूवों पे कुछ फूल
यूँही निकल जाते हैं
जैसे नए चश्मे पर
माई के हाथ उसे पोछते
कम्बल से धीरे-धीरे
बाहर निकल आतें हैं ,
आना तुम कुछ तरह
जैसे दुल्हन के धीरे-धीरे
घूँघट उतर जाते हैं
बच्चों के धीरे-धीरे
दाँत निकल आतें हैं
आना कुछ इस तरह
जैसे धीरे-धीरे फल
पक के मीठे हो जाते हैं।
( अप्रमेय )
आप सभी को नए वर्ष की मंगल कामना
३१/१२/१३



Monday, December 30, 2013

पाती-२

उस दिन दस का नोट गिरा हुआ मिला था उसे। ठीक थोड़े दूर आगे बढ़ने पर एक बच्चा सड़क पर भीख माँगते उसके सामने आ गया। अभी वह तय नहीं कर पाया था की इन दस रुपयों का वह क्या करेगा पर शायद उस चौराहे और उस लड़के तथा जेब में पड़ा दस रुपये के नोट ने उसे तत्काल निर्णय लेने के लिए मजबूर किया। चाय पी लेने के बाद भी पाँच रुपये बचे थे उसके पास जिसे उसने टाल दिया था इस ख्याल के साथ की कल फिर मैं जब इस रास्ते से गुजरूंगा तो कुछ पैसा दे दूंगा। इनका काम ही है सड़कों पर भीख मांगना।पता नहीं क्यों पूरी रात उस भीख मांगने वाले लड़के का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूमता रहा।दो दिन बीत जाने के बाद जब वह उस रास्ते से गुजर रहा था तो वह भिखारी बच्चा उसे नहीं दिखा।अगले दिन फिर वह नहीं दिखा। साल भर बीत जाने के बाद एक पागल बच्चे की लाश पर तमाम लोंग खड़े होकर कई तरह की बात कर रहे थे कि इसकी माँ दवा के अभाव में मर गयी। सुनते हैं की भीख मांग-मांग कर ये अपनी माँ की दवाइयाँ खरीदता था। माँ के मर जाने के बाद ये पागल हो गया और जरा इसका नसीब देखिये कि किसी पागल कुत्ते के काटने के कारण इसकी आज इतनी दर्दनाक मौत हो गयी। उसके लाश की जेब से कुछ चमकती हुई दवाईंयों का टुकड़ा लोंगो से अपनी आँख को चुराता आकाश से कुछ बातें कर लेना चाह रहा था।
( अप्रमेय )


Sunday, December 29, 2013

उदासी :

अब खिड़कियों से
नहीं झांकती उदासी
चमकती है कौवों के बीच से
छत के ऊपर ,
अब बिस्तर पर
लिपटी नहीं रहती उदासी
टंगी रहती है चौराहों पर
सिग्नल के अंदर ,
उदासी अब बांची नहीं जाती
और न ही रखी जाती है जेब में
वह फहरती है झंडा गाड़े
मेरे देश के धरती के ऊपर।
(अप्रमेय ) 

Friday, December 27, 2013

पाती-१

प्रभु उस रात मैं चुप-चाप वहाँ से चला आया था। मुझे तो सिर्फ अपने वादे के मुताबिक वह फूल चढ़ाना था जिसे बहुत शिद्दत के बाद एक सार्वजनिक स्थल पर कविता पाठ करते हुए मैंने पाया था। सेठ का परिवार उस मंदिर में मुझे नहीं जानता था पर उस पुजारी ने भी तो मुझे घुसने नहीं दिया। उसी ने  तो कहा था यह एक सिद्ध मंदिर है जो मांगोगे मिल जाएगा। अवसर तो मिल गया पर उसका प्रमाण तो मेरे पास ही रह गया। मैं चुप-चाप सो गया उस रात पर वह गुलाब का फूल सुबह तक मुरझा गया था।
(अप्रमेय)


Thursday, December 26, 2013

चहारदिवारी के अंदर :

चहारदिवारी के अंदर
आँखे बदलती रहती हैं हर-पल
बार-बार
झाँकती-चौंकती हैं
उजाले को चीरती
परछाई को देखकर
हवा बहती है तो लगता है
आ गया कोई बसंत लेकर
चहारदिवारी के अंदर ....
कान सुनना चाहता है
खटखटाने की आवाज़
मन फिर अटक गया
सिटकनी के पास
मेरे घाटी के ऊपर।

(अप्रमेय )

Monday, December 23, 2013

आज-कल राजनीति :

यह जो हाथ पकड़ा है उसने आप का
रकीब बन गया हजारों दिले कुर्बान का

यकायक बुलंदियों पर दीप जब जल पड़े
परवानों के भीड़ में वह गुम गया चुप-चाप सा।

शमा जली है जो क्या फिर वह बुझ जायेगी
तमाशा जिंदगी है ख़ामोशी फिर सबब बन जायेगी। 

जिंदगी शामो-सहर यह जमाने से जो ढलती रही
इस रीत की टीस आँखों में क्या फिर डबडबाएगी।

वह कौन चुप है दो टूक कभी कुछ कहता नहीं
यह बात इस जहाँ में क्या फिर सूली पर लटक जायेगी।

(अप्रमेय )




Sunday, December 22, 2013

नया वर्ष

तुम्हे मनाना है यदि नया वर्ष
तो तुम्हे भुलाना पड़ेगा 
पिता की आँखों पर
लगा हुआ मोटा चश्मा
माँ के चहरे पर
सिमटी हुई झुर्रिया
तुम्हे भुलाना होगा
आँगन के फूटे पत्थर
टप-टप गिरता
बाथरूम के टोटी का बूंदयोग,
तुम्हे मनाना है यदि नया वर्ष
तो तुम्हे बचाना ही होगा
अपना जेब-खर्च
रास्तो पर थरथराये
माँगते हाथो में उनकी किस्मत
का बनना होगा मूक दर्शक,
तुम्हे मनाना है यदि नया वर्ष
तो तुम्हे खींचनी ही पड़ेंगी
भविष्य की चोटी और 
अतीत की खाई
वह कौन थें जिन्हे तुम
पकड़ न सकें गिरते वक्त
और वह कौन होंगे
जिनकी कमीज पकड़ कर
तुम चढ़ोगे ऊपर ,
इसके बावजूद
न भूलते हुए भी
यदि तुम मनाने चले हो नया वर्ष
तो मेरी तरफ से तुमको
बधाई।
( अप्रमेय )



Saturday, December 21, 2013

शहर और गाँव के बीच :

शहर और गाँव के बीच
के फासलों को जोड़ती  हैं
वह क्वामा सदृश्य बस्तियां
जिनका अस्तित्व
वाक्यों के बीच
पन्नो के ऊपर
लेखकों के मन से
कुछ अनमनी सी टंकित
हो कर छुप कर
उठाती रहती हैं
महाकाव्यों के भारी-भारी शब्द ,
भाषा में जैसे
आ ही जाते हैं
कुछ विदेशी शब्द
उसी तरह
हमारे भाव संसार को
चमत्कृत करती स्वांस लेती
ठेंगा दिखती यह रेलगाड़ी
जब कहीं यूँही रुक पड़ती है
गोधूलि बेला में
खेतों और बस्तियों के बीच
तब सपाट किसी
संत की सफ़ेद दाढ़ी की तरह
फैले मैदान
आप को लोटा ही देते हैं
हाथ जोड़े या फिर
झरा ही देते हैं
पतझर की तरह
आप के मन के फूल ,
गाँव अपने आप में
और आप अपने पास
एक गुमसुम सा संवाद
उड़ाते हैं हवन के धुएँ की तरह
और रेलगाड़ी निकल पड़ती है
शहर की तरफ ,
आप को उतर जाना है
शहर में
तारकोल की तरह
पसर जाना है शहर में।
( अप्रमेय )






Thursday, December 19, 2013

बचा रह जाता है

कितनी अजीब है यह जिंदगी
सबको पकड़ा ही देती है
हाथो में कोई न कोई झुनझुना।
गवैये को दे देती है
एक बचा हुआ तान
रोज रगड़ने के लिए।
मास्टर को दे देती है एक पाठ
जो बची रह जाती है
क्लास ख़त्म होने के बाद।
जेब कतरे के दिमाग में
बची रह जाती है
भीड़ से निकलती सेठ की मोटी जेब।
भिखारी का हमेशा
बचा रह जाता है
सिक्को से कटोरा।
बच्चे को उढाने के बाद भी
बचा ही रह जाता हैं
माँ का आँचल।
बचा ही रह जाता है
प्रेमी-प्रेमिकाओं का संवाद।
कवियों की
बची ही रह जाती है उत्कंठा।
मैं पूछता हूँ आप सब से
ये झुनझुना है या कोई खिलौना ?

(अप्रमेय)