Sunday, May 31, 2015

पुनरावृत्ति

मोची की आँख
कभी डबडबाती नहीं
चमचमाती है
भिखारियों का कटोरा
खनकता नहीं टनटनाता है
किसी की जिंदगी में ऐसा
एक बार होता है
पर इतिहास में तो इसकी
पुनरावृत्ति होती है ।

 (अप्रमेय)














गौर से देखो

देखो इसे गौर से देखो
कोई ख़ून का कतरा
या कहीं पसीने की कोई बूंद भी
टपकी क्या ?
देखो और पहचानो 
यह कौन है
औरत है ?
माँ है ?
माशूका भी नही ?
देखो उसकी छाती
कोई मांस का गोला हिला क्या ?
देखो उन्हें भी गौर से देखो
कोई बच्चा ?
कोई बेटा ?
कोई शरारत उठी क्या ?
देखो शब्दों से अलग
किताबों से जुदा
आग को
जो कभी बुझ गयी थी
तुम्हारे अन्दर
वह जली क्या ?

समझो

समझो अभी कि ढल जाएगी रात
ये पर्दा हटाओ कि थम जाएगी बात
उनकी फ़िकरों पे इतना न फ़िक्रमंद होना
आओ तराशे खामोशी से इक राज
कोई किसी पर इतना ज़ोर डाल नहीं सकता कि
हाथ थामो मेरा फिर देखो हर तरफ कैसे फैलेगी आग।

दाढ़ी

उसकी दाढ़ी 
धीरे-धीरे बढ़ी होगी
साल दर साल,
जोड़ते हुए ,सपनों के लिए नहीं
जुगाड़ करते दो पैसे के लिए
ताकि उनसे
चूल्हे में सुलगती रहे आग,
उसकी दाढ़ी यों ही नहीं बढ़ गई होगी
धीरे-धीरे बढ़ी होगी
चिल्लाने के बरक्स
मौन के साथ खड़े होने में
अपने बच्चे को अस्पताल
दाखिल न करा पाने के कारण
अपने हाथो में उसकी दर्द की कराह को
मौत तक जोड़ते हुए
उसकी दाढ़ी
उसके लिए उसके चेहरे की नकाब है
जिसे वह आईने में नहीं देखना चाहता,
आज मंदिर के सामने
गुमटी के अंदर
उसकी आँखें
चाय पकाती हैं बिलकुल कड़क
देखो उसकी दाढ़ी है आज
द्रष्टा...
जो कि उसकी चेतना के साथ
हमेशा बढ़ती और गहराती रही
काली से सफेद होती रही

जो जान सका;

मैं जो जान सका
वह यही कि यहां
समय के पन्नों पर
कुछ-अकुछ के बीच
बीननी है अपने काव्य की कहानी,
बिना अभ्यास के
बीचो-बीच
किन्हीं अन्तरालों में
पूरे जोर से
निभाना है अपना किरदार,
अपने ही निर्देशन में
पूरे का पूरा चाक-चौबंद
यहीं इसी जगह
सुबह उठते हुए
सूरज की रोशनी में
चांद-तारों की झोली में
छुपा देने हैं अपने सवाल,
होगी, फिर वही होती हुई रात
शताब्दियों के साथ
जवाबों की घंटी लिए,
तुम्हें ढूंढना है अपना सवाल
जिसके गीत गाये जा सकें
गुनगुनाएं जा सकें 

भीतर

भीतर अर्थ नहीं
शब्द नहीं 
ऐसा कुछ नहीं
जो तुम्हारे लिए सार्थक हो,
तुमने जब-जब
जानना चाहा उसे आदतन
आँखों के प्रकाश की लाठी लिए
सिर्फ पगडंडी तलाशने का काम किया,
भीतर घर नहीं
चूल्हा नहीं
कोई ऐसा कमरा भी नहीं
जहां बिस्तर के सिरहाने
तुम दबा सको अपनी उदासी,
मैंने भीतर को सुना है
कभी-कभी
स्मृतयों के सहारे
उसके रूप को ध्वनित होते हुए
किसी को पुकारने के बाद
कमरे में कुर्सी पर बैठे
उधर बाहर मैदानों में
खेलते बच्चों की गूँज के पास ,
शताब्दियों की दौड़ में
किसी बूढ़े को अपनी चारपाई पर
बस एक फर्लांग की दुरी पर पहुँचने के पास
लगातार चल रही किन्ही सिसकियों को
धीरे-धीरे हवा की नमी में
घुलते रहने के साथ,
भीतर कुछ होता नहीं
यह सिर्फ कवियों, मनीषियों को
बहलाने जैसा अल्लाद्दीन का चिराग है
जिसकी बाती
जिसका तेल
और उसको दहकाने वाली चिंगारी
बाहर हाँ बाहर
तुम सब के पास है 

हम हैं ही विराट

हम हैं ही विराट :
कविता जन्म ही नहीं लेती
विराट के साथ
ऐसा मुझे उसके बरक्स खड़े होकर 
कुछ कहने के वक़्त समझ आया,
समझ आया ड्राइंगरूम का फूल
फूल नहीं प्लास्टिक से भी बत्तर
फूल की आकृति लिए भ्रम,
समझ आया लहराता शब्द
खड़ा होता हुआ शब्द
समझ आई परिभाषा
हमसे जो निर्मित हुई भाषा...
भाषा नहीं शब्द....
शब्द नहीं ध्वनि....
ध्वनि भी नहीं.....
तुम्हारे अहिर्निश झरते
संवाद को दरकिनार करती
अतृप्त अभिलाषा,
हमने सुना नहीं
सुनाया
देखा नहीं
दिखाया
समझा भी नहीं
समझाया,
हमने रचे इतिहास
जहाँ हम खड़े हैं वहीं से
पीछे और पीछे
अपनी उपस्थिति का निर्जीव बीज डाले
हमने रची आकांक्षाएँ
जहाँ हम खड़े हैं वहीं से
आगे और आगे
तकनीक से अंकुरण का खयाल भरते,
हमारा होना तो तय था, तय है
तय रहेगा भी
पर विश्वास से नहीं
विज्ञान से नहीं
और ज्ञान से भी नहीं,
कुछ होने के लिए नहीं
नहीं ; कुछ नहीं होने के लिए भी
हम हैं, बस अपने आप
निपट अपने लिए विराट के साथ
नहीं ...
हम हैं ही विराट ।

आत्मा

जहाँ-जहाँ 
मेरी कविताओं ने 
लय पकड़ा है 
समझना वहीं-वहीं
मैंने अपनी आत्मा का 
गला घोटा है  ।

( धूमिल की तर्ज पर )

अतिथि

अतिथि तुम कब आए
ध्वनि में शब्द का रूप भरते
ताप से आग होते 
धीरे-धीरे वैश्वानर फिर दावाग्नि 
बड़वाग्नि होते 
सिगड़ी-चूल्हे में गुनगुनाए
अतिथि तुम कब आए
सर सर सर पत्तों को नचाए
पंछी के पंख को भर-भर लुटाए
गगन चुम्बन का पाठ सुनाए
अतिथि तुम कब आए
माटी की किताब पर
फूल घाँस और जाने क्या-क्या
कविता लिख लाए...
अतिथि
तुम्हारे आँख फिर
क्यों भर आए
बताओ
कहाँ-कहाँ मंडराए
घुमड़ाए
झर झर झर
झर आए
बताओ अतिथि
तुम क्यों नहीं फिर आए

वसंत

कहाँ आता है वसंत
वह तो समय लाता है
अँधेरा किवाड़ को बंद कर
दुःख लाता है,
हम अपने-अपने दरबों में बंद
जिंदगी तलाशतें हैं
कहाँ आती है जिंदगी
यह कौन समझ पाता है ?

कथा

कथा जब-जब लिखी जाएगी
किसी की अपूर्ण व्यथा कही जाएगी
झूठ हैं शब्द 
मानोगे इसे एक दिन 
भरेगी आँख जब आँसू से
किसी शब्द को भीगा न सकोगे तुम,
हम रहे न रहे
जिंदगी को कभी
पन्नों पर उतार न सकोगे तुम ।

पहले-पहल

पहले-पहल
अनायास ही मिलता है सब कुछ
जैसे हींग 
जायफल 
लौंग
आलू
और स्वाद...
जैसे आकाश
हवा,धूप, पानी का वरदान ...
जैसे चमड़ा
देखती आँख
साथ चलती किसी देह का साथ
फिर अकस्मात प्यार...
सदियाँ बहुत बाद में
ले आ पातीं हैं
बहीखाते में उनका हिसाब
धीरे-धीरे
शब्द की तिजोरियाँ
ज़ब्त कर देती हैं
उनकी कीमत
उँगलियों के रोज़नामचे का
मंडी-बाजार में नही देता कोई जवाब
फिर पीढ़ियाँ
चुकती जाती हैं बेहिसाब
कोई है...? मैं पूछता हूँ चीख कर
बार
बार
कोई नहीं देखता अनायास
बचे हुए यह लोग
हमेशा बचे रह जाना चाहते हैं
किसी नायाब मसीहा की तलाश में
जो उनको
गणित समझाए गा
कविता के पद सुनाए गा
व्याकरण से
विस्मृत वैतरणी को
पार करवाए गा

मंजिल

कोई शिकवा न कोई गिला 
कुछ भी न मिला
कोई वफा न कोई बेवफा
यादों में रहा 
हम तो निकले ही नहीं
जिंदगी के सफर में कभी
न कोई राह न मंजिल
न कोई खुदा ही मिला 

इतिहास

देखो 
शिल्पियों का हुनर
अब शिलाओं में 
नहीं उभारतें
देवी-देवताओं का रूप,
उन्हें 'वाह' नहीं
'आह' की ज्यादे ख़बर है
इसलिए
लोढ़ो और सिल बट्टों में
लिखतें हैं वह
करीने से
हुनर और गरीबी का
इतिहास
(अप्रमेय)

कविता

तुम इसे समझते रहे कविता
और मैं खोजता रहा भाषा
कभी दो दिन
कभी चार 
और कभी महीनों बाद
लिखता रहा चूकते-चुकते
कलम से निकलती स्याही की तरह
धीरे-धीरे भाषा ,
हमनें तो खोजी है
सिर्फ ध्वनि में भाषा
या कभी-कभी
आँखों में
पर
जिंदगी की भाषा
खेतों में पकते बालियों के लिए
चूल्हा हो जाती है
पकते आम के लिए चीनी
शरीर के लिए गर्मी
और सड़ते उच्छिष्ट के लिए
अदृश्य टेक्नोलॉजी,
तुम पढ़ो इसकी भाषा
इसका बजता छंद
मात्राओं में दिन-रात की तरह
पूरी आवृत्ति में
ऋतु-मास की तरह
जीते, दौड़ते, सुस्ताते,
उड़ते, बतियाते
पशु-पक्षियों मनुष्यों में
राग की तरह,
और मृत्यु से गूँजते
स्वयंभू
तानपुरे से निकलते
गांधार की तरह ।
(अप्रमेय)