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Wednesday, July 8, 2015

तुम

रेत पर बैठे पंछी
जैसे सागरों में डुबकी
लगा आतें हैं
वैसे न चाहते हुए भी
ताल-ताल घाट-घाट
तुम याद आते हो,
सालती है अंदर
बराबर ये बंजर भूमि
देखता हूँ कभी-कभी
कुछ फूल खिल आतें हैं,
राह कोई जब-जब न रहा
तुम तब-तब
खेत-खेत मेड़-मेड़
फुनग आते हो,
स्वांस-स्वांस जाती है आती है
कोई महक
ह्रदय के जंगल में
डाल-डाल तुम
लटक जाते हो

(अप्रमेय )

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