Tuesday, January 21, 2014

जिन्दा रहना है

उसे महज
जिन्दा रहना है
अपनी स्वांसों के खिलाफ
कपकपाये पैरों के
घुटनों के खिलाफ
उसे जिन्दा रहना है
जिन्दा रहने के खिलाफ
अपने ही पीठ को ढोते
छाती के हड्डियों में
घुसपैठ किये
ठण्ड के खिलाफ
अपनी ही आवाज़ के खिलाफ
जो भाषा के स्तर पर
इस अधेड़ उम्र में
गाली की तरह निकलती है
और कहीं से
ला नहीं पाती अनाज
वह जिन्दा है सुई की तरह
बीचो-बीच
भुत ,भविष्य की घडी में कसा
बीतता हुआ
बीतने के खिलाफ
वह महज
जिन्दा है
और इसीलिए
आज दो जून के बाद
उसे कभी कहीं से
मिल जाती है खुराक
जो उसे जिलाती रहती है
धूप से आती
अपनी ही परछाई के खिलाफ
मैं सोचता हूँ
मैं किस आर. टी. आई.
के दफ्तर में जाऊं
और इसके इल्जाम
का पता लगाऊं।

(अप्रमेय )






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