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Thursday, June 1, 2017

कली और फूल

सोचता हूँ कि कुछ लिखूं
कि मन में आ गया 
पिछवाड़े लगाया हुआ पौधा
अभी आयी नहीं है उसमें कली
सोचता हूँ
कली और फूल में
सुंदर कौन है
इस पर
मेरे ह्रदय का कवि
मौन है ।
(अप्रमेय)

उसने-तुमने

चाँद को ले लिया उसने
और चरखा को तुमने 
मैंने इधर एक गीत गाया 
और नोच ली एक पंखुड़ी 
मेरे ह्रदय में खिले गुलाब के पुष्प से
खुशबू मौजूद है अभी
कि दी गईं सलामियाँ
कलम किए गए सर को देख कर
एक पंखुड़ी और नोच दी मैंने
कि बन गई एक कविता हमारी
मैंने देखें हजारों देश-भक्त और
चखना चाहा स्वाद देश भक्ति का
हाँ आख़िर तक नहीं समझ पाया
कि अचानक एक दिन नज़र पड़ी
भूख की तलाश में गुम सी
एक बच्चे की लाश
न कोई गीत गाया और
न ही कह पाया कोई कविता
बस नोच डालीं
सभी पंखुड़ियां ह्रदय से
और फिर
झर गईं सभी पत्तियां भी
अंदर ऐसा तूफ़ान आया ।
(अप्रमेय)

माँ

"माँ"
यह शब्द 
काल के पृष्ठ पर 
प्रकृति द्वारा अंकित 
सुंदरतम चित्र है 
जिसके चंद्रबिंदु में
वह तुम्हे ही तो
गोद में लिए बैठी है
जब तुम इसे बुलाते हो
तब यकीं मानों उसी वक्त
सात स्वरों केअकाट्य नियम 

टूटते हैं
और ढहता है 

लय का साम्राज्य
माँ तुम्हारा स्मरण
केवल स्मरण नहीं
एक ऐसा संबल है जिसका साथ
पृथ्वी को रस से और 

जीवन को नियमों के पार की भाषा
बतलाता है
तुम्हारे हाथ मेरे सर पर
अनंत मौन सा आँचल
उढ़ा कर मुझे नींद की लोरी
सुनाता है ।
(अप्रमेय)

एक कहानी

एक कहानी हाथ लिए
ढूंढ रहा हूँ दर बदर
किसको सुनाऊँ 
किसको बतलाऊँ
कोई नहीं ख़ामोश इधर।
(अप्रमेय)

एक शेर ....

देख लो कि तस्वीरों के साथ ज़िंदा हूँ मैं अभी
एक दौर आएगा लोग पूछेगें ऐसा भी था कोई ।
(अप्रमेय)

शाम

शाम लौट आने के लिए 
या होती है किसी की याद में 
उलझ जाने के लिए
चाय की चुस्की एक चुप्पी को 
घोट लेती है हर शाम
मैंने सुबह से ज्यादा हर शाम
चिड़ियों को ज्यादा
चहचहाते या कहें चिल्लाते पाया है
चिड़ियों का घर नहीं
घौंसला हुआ करता है
वैसे ही खाना नहीं
दाना हुआ करता है
हम शाम बिताने के बाद
सुबह की योजना बनाते हैं
वैसे ही चिड़ियों के लिए
योजना के समानांतर कोई
शब्द अबतक गढ़ा क्या ?
(अप्रमेय)

प्रेरणा

वहां नहीं मिली मुझे प्रेरणा 
जहाँ पढ़ा था मैंने 
भूख से गई जान
वहां भी नहीं निकली थी आह
जहाँ आदमी को 
पकड़ लिया गया था
जेब काट कर भागते हुए
कल शाम सब्जी मंडी में
देर रात के बाद
बंद होती दूकानों के बीच
वह सभ्य महिला
बीन रही थी
इधर-उधर पड़ी सब्जियां
मैंने पूछ ही लिया बहन
इसका क्या करोगी
उसने कही अपनी बात
और सच कहूँ
मुझे सुनाई पड़ी एक कविता
जिसके स्वर तो मैं यहाँ
नहीं सुना सकता
पर सुना रहा हूँ वह कविता-
बच्चे कर रहे हैं मेरा इंतज़ार
मां पैसा लायेगी और साथ
कुछ मिठाइयां भी और
आज हम सब मिल कर
खाएंगे भात के साथ भाजी भी
अब आप ही बताइये भाई साहब
कुछ काम मिला नहीं
तो पैसे कहाँ से आएंगे
मिठाई न सही
पर मेरे बच्चे भात-भाजी
तो खा पाएंगे ।
(अप्रमेय)

आज-कल

अचानक एक भद्द सी 
आती है आवाज 
और खुल जाती है नींद मेरी
रात को जैसे
गिरा हो पिछवाड़े 
पेड़ से पक कर कोई आम
बिस्तरे पर बाग़ नहीं होता
और कितना भी
कूलर कर ले शोर
आँधिया नहीं आती
अक्सर कई दिनों से
ऐसे ही अचानक
टूट जाती है नींद मेरी
और धड़कन
सीने से खिसक कर
कानों के पास
चली आती है मेरी ।
(अप्रमेय)

यहाँ से

लटकी अटकी हुई टहनियों
को क्या पता 
फल कब आएंगे
और जब आएंगे 
तब क्या वे उनका 
स्वाद भी ले पाएंगे
जो पत्त्ते बन नहीं पाए फूल
उनके पास क्या होता होगा
वृक्ष क़ानून,
जड़ों ने ऊँचाई के साथ
फुनगियों से
कबका नाता तोड़ लिया
अतल गहराई में वह सदियों से
अब किससे मिलना चाहती हैं,
हवाएं काश थोड़ा ठहर पातीं
इन वृक्षों के साथ
तो यकीं मानिए
इस धरती के ऊपर
आकाश का नहीं होता नीला रंग
पेड़ की फुनगियां
धरती की तरफ और उनकी जड़ें
हथकड़ी बन कर
जकड़ रही होती
पूरा सूर्य-मंडल।
(अप्रमेय)

घाट

घाट के तट पर 
बांस का खूंटा 
कब तक तुम्हे 
रोक पाएगा बंधु
एक दिन न सही 
दूसरे दिन वर्षा जल
घेरेगी उसे चारों तरफ़
कब तक रह पाएगी
जमीन सख़्त उसके
चारों तरफ़,
खूंटा है वहां
तो बंधेगी ही कोई
और नांव तुम्हारी तरह
फिर गरजेगा बादल
फिर बरसेगा बादल
आएगा तूफ़ान
और तुम्हारी नांव को
आखिर एक दिन
बहा ही ले जाएगा ।
(अप्रमेय)

इतिभास

चीन की राजकुमारियों 
ने बहुत पहले ठोंके थे 
अपने पैर छोटे बनाने के लिए
हमने ठोंकी तकदीर 
पुराणों में उपनिषदों के बरक्स
आदमी सुंदर की खोज में
देता रहा वक्तव्य
और इतिहासकार उनको
टांकते उघाड़ते बनाते रहे नारे
अनुभव के कितने नजदीक है
यह नया शब्द -'इतिभास'
इसे इस नए समाज में
समझ के समझाना होगा ।
(अप्रमेय)

Tuesday, April 19, 2016

जो होना है *

मैंने अपने लिए 
जिंदगी के पेड़ पर 
भविष्य के घोंसले में 
डाल रखी है
विचारों की घास
ऋतुओं की गर्माहट उसे सेकेगी
आदमी जैसे कौवे के झुण्ड से अगर
बच गया मेरे सपने का अंडा
एक ऊपरी कवच टूटेगी ।
नस्ल तो पता नहीं
कोई पंछी उसमें से निकलेगा
अपने पंख में आकाश को भरे
जीवन का गीत सुन पाएगा |
(अप्रमेय)

कहाँ से आये *

आदमी अपने जीवन में 
कहीं जाता नहीं,
चला आता है 
माँ की पेट से बेटा बन कर 
और उससे पहले 
वे जो आ चुके थें
उसे बुलाने के लिए
वे भी चले आएं थे
शताब्दियों की यात्रा के बाद
तुम्हारे लिए 
मैं देखता हूँ वह चक्र
आदमी से पहले 
पशुओं से पहले 
जीवों से पहले
पेड़-पौधों से पहले
पानी से पहले
हवा-आकाश से पहले, 
अनंत यात्राओं के बाद 
तुम्हारे लिए वे आ गए थें
गीतों में छंद बन कर 
ध्वनि में भाषा का रूप लिए 
और न जाने किस -किस विधा में
कि तुमसे मिल सके,
सोचता हूँ जब ऐसी यात्रा
जो बिना किसी पहिये से चली हो
कैसी होगी
सोचता हूँ बदलते रूप की बैचनी
और काँप जाता हूँ 
ऐसे में कोई चेहरा नहीं दिखता 
जिसे माँ कह कर पुकार सकूँ |
(अप्रमेय)

Friday, March 25, 2016

तुम्हारे लिए

मैं तो राजी हूँ
तुम्हे स्वीकार करने के लिए
और जानता हूँ
तुमने अब तक 
सिर्फ जिंदगी को
किताबों में समझा है
और डरने की खुराक तुम्हे
जो आध्यात्मिक बनाती है
उसे तुमने मंदिर, गिरजाघरों
या फिर मस्जिद की चौखट पे
नाक रगड़ते हुए समझा है
तुमने जिस प्यार में
कुर्बानियों की कसमे खायीं हैं
वह देह से देह तक की यात्रा से
ज्यादे कुछ और नहीं
मैं तो कह दूँ
और इसके बावजूद भी
तुम्हे स्वीकार कर लूँ
पर तुम्हारे लिए
ये सब कहना तुम्हे खो देने जैसा होगा
मुझे मालूम है कि मेरी यह समझ
कितनी भी सत्य क्यों न हो
तुमसे ज्यादे कीमती नहीं
(अप्रमेय)

राजी

हम हो रहे हैं धीरे धीरे राजी
और इसे ही हम अपनी 
क़िस्मत समझ लेंगे 
कोई अचानक नहीं कहता है सच
धीरे धीरे परखता है 
वह तुम्हारा तापमान
उसे मालूम है
हलुआ बनाने की विधि
आदमी को गुलाम बनाने में
कैसे काम में लायी जा सकती है
आदमी के सपने बहुत पुराने हैं
यहाँ तक कि आदमी से भी पुराने
उसकी तड़प मुर्दा होने के पहले
थोड़ी साँसों की बची छटपटाहट है
जिंदगी उन्ही के पास हैं
जिनके हाथों में
पानी से भरा गिलास है
वो जानते हैं इसे और
वो भी छटपटाते हैं
कि गिलास पानी का
वह खुद भी नहीं पी पाते
न पिला पाते हैं
(अप्रमेय)

प्रार्थना

वह प्रार्थना करता है 
पुकारता है भगवान् को 
गाता है गीत 
बजाता है वीणा,वंशी और करताल 
सदियों से ,
अपनी समझ से
रचता है वाक्य
करता है प्राण प्रतिष्ठा
जीवन में भाषा की ,
किसी ने अब तक
नहीं देखा ईश्वर को
सदियों से इसे समझता है
कितना असहाय है
और कोई उपाय भी तो नहीं
यह जानता है
शायद इसी लिए
वह ईश्वर को मानता है ।
(अप्रमेय)

जी लेना चाहता हूँ

दोपहर के बाद
शाम होने के बाद 
वो कहते हैं रात हो गई
रात हो गई होती है,
जैसे हो जाती है सुबह 
रात हो जाने के बाद ,
तुम्हारे हो जाने के बाद
वे तुम्हारे सामने
दोहराते हैं बार-बार एक नाम
तुम हो जाते हो नाम
हो जाना जरूरी है
ये तुम नहीं वे सब कहते हैं
जो हो गए हैं एक नाम ,
वे कहते हैं गांघी था एक नाम
वे कहते हैं भगत था एक नाम
वे कहते हैं भारत है एक नाम
जिसकी आकृति
खींची होगी कभी किसी चित्रकार ने
अपना चूल्हा जलाने के लिए ,
शाम के ढलने के बाद
रात होने के पहले,
धीरे-धीरे मरने के पहले
मैं लौटा देना चाहता हूँ
अपना नाम
यह देश जिसे बताया गया मेरा देश
उसे तुम्हे ही मुबारक कर
मैं जी लेना चाहता हूँ
एक शाम |
( अप्रमेय)

Saturday, January 23, 2016

सच-झूठ

मेरे सच में 
झूठ बस इतना है
तेरे झूठ में 
सच भर जितना है 
(अप्रमेय)

कि

गुजरना किसी का 
याद न रहा कभी
पर किसी का आना
मेरे लिए जरूर ले आता है
अजुरी भर सवाल,
मेट्रो शहर के माफ़िक
आकाश से मग्गे में
पानी सा मिलती है धूप
कतरा-कतरा,
कि अटकी रहती हैं सांस
बारहवीं मंजिल पे
खिड़की से किसी गुमनाम
पेड़ के पत्ते को ताकते ,
हमें पता है
सीढ़ियों से चलने की आती आवाज
नहीं रुकेगी हमारे दरवाजे पे
पर आना किसी का
इस शताब्दी में
गिलास भर पानी की तरह
गले को आँखों सा
नम कर जाता है |
(अप्रमेय)

आह सा...!

मेरे लिए लिखना 
न जानते हुए उसे
भूल जाना है 
मेरे लिए भूल जाना 
उस गुमनाम के सामने 
प्रार्थना है और
आँख न मिला पाना
वेदना है
शब्दों में
फूल सा
कि
सुगंध सा
कि
आह सा...!
(अप्रमेय)

जिंदगी है

छोड़ देना है 
या छूट जाएगा
कोई उपाय है ?
तलाशते हुए 
धीरे-धीरे 
इन सब के बीच
ज़िन्दगी को जीना
ज़िन्दगी है,
तुम भी नहीं
मैं भी नहीं
कोई भी तो नहीं
जो दिलासा दे सके
फिर भी
भरोसे की आँख टटोलना
ज़िन्दगी है,
फ़ेहरिस्त का हिसाब
झूठा है
जानते हैं सब यहाँ
फिर भी ज़ोर से
आवाज़ लगाना
मिट जाएगी जो पहचान
उसे निभाना
ज़िन्दगी है ।
(अप्रमेय )

वह जो

मैं कुछ लिख दूँ
क्या !
मालूम नहीं 
लो
आ गया ख्याल 
फूल का
कि वह तो मुरझा गया होगा
किताब में रखा हुआ ।
(अप्रमेय)

ये भी बस

कोई कह दे कि रात तालाश की सी स्लेट नहीं 
उजाले सा यह चौक अरसे से परीशां करता है 

रात अपनी जिद में ही डूबे चली जाती है
मेरी आदत में शुमार है इसे चुपचाप देखना 

जिंदगी का हिसाब नहीं मिलता मुझको 
कि इक कतरा भर जो देख लिया तुमको 

कोई मिल गया राह चलते यों ही 
मंज़िले ख़याल फिर बौना निकला

सुना तुमने वही जो तुम्हे बतानी थी
कह न सका वही जो तुम्हे सुनानी थी

सुनो

कभी पूछ लोगे जो हाल मेरा
कुछ बिगड़ तो न जाएगा
इस राह में दीवाने को
कुछ सुकूँ तो मिल जाएगा
(अप्रमेय)

बस यों ही

ये सफ़र असां नहीं इतना भर जान लीजिए
रुक रुक के चलना और कहीं चल के रुक जाना

आँखों में उनके देखता हूँ सुकूं मिल जाता है
है दर्द दबा जो इधर छिपा उधर मिल जाता है
(अप्रमेय)

सच

मेरे सच में 
झूठ बस इतना है
तेरे झूठ में 
सच भर जितना है 
(अप्रमेय )

कुछ छोटे-मोटे

१-एक शाम कोई मेरी ऐसी भी गुजर जाए
मैं सच कहूँ और वो इसे मान भी जाए ।।


२-सिमटा कि फ़ैल गया 
है यही मेरा फ़साना,
लबे तरन्नुम जो कभी गजल रही
गा रहा उसे अब जमाना ।।

३-खुद कह दूँ तो भरोसा हो न पाएगा
तुम्ही कहो कि फिर कह दूँ कैसे 

४-गुजर रहा है वह सरे जिंदगी में ऐसे 
बरस रहा हो सावन झील में जैसे
 
५-तुम दूर हो कर भी पास ऐसे हो मेरे
जैसे धड़कता है दिल दूर तेरा मुझमें

६-अपने होने को धुआं सा समझता मैं रहा
ये अलग बात है कि उम्र भर धूँ धूँ कर जलता ही रहा 

७-अब क्या बताए कि बताए क्या 
है वही बात कि बात बताए क्या 

(अप्रमेय )

Friday, December 4, 2015

भाप बनते हैं सपने

कहीं से लौट कर आना 
कभी-कभी 
कहीं चले जाना होता है 
समय की आंच 
बहुत धीरे धीरे पकाती है जिंदगी 
भाप बनते हैं सपने
सतत
मस्तिष्क की प्लेट के नीचे
कोई हटाए ढक्कन
नहीं तो
भात की तरह
उबलता ही रह जाएगा
जीवन |
(अप्रमेय)

Monday, November 16, 2015

क़ाबलियत

क़ाबलियत एक ऐसा हथियार है
जिसे सामूहिकता का आशीर्वाद है
देखो कैसे मरता है आदमी 
ज़िन्दा रहते हुए भी
पुर्ज़े की तरह,
हम जिसे रहनुमा समझते हैं
और जिससे गुहार लगाते हैं
उसने भी क़ाबलियत का सर्टिफिकेट
इन्ही व्यवस्थाओं से अर्जित किया है,
आदमी का ज़िन्दा रहना
आदमी की तरह गुनाह है ,
तुम दरिंदे हो तो क़ाबलियत
तुम्हारे लिए दो कौड़ी की चीज़ है
इस व्यवस्था में इन सब की तरह
जीना चाहते हो तो समझो ...
क़ाबलियत एक काग़ज़ का नाम है
जिसे ट्रांसफर करने का अधिकार
पुरखों के पास है ।
(अप्रमेय )

मेरी नहीं

जो लिख दिया वो मेरा नहीं 
जो कह दिया वो मेरा नहीं
जो बात ह्रदय में टीस रही 
वो भी मेरी नहीं ..मेरी नहीं ।।
(अप्रमेय )

रात रात में

कोई कैसे खोलता है अपने दिल का राज धीरे धीरे
जैसे कोई कली अपना ही फूल गुनती हो धीरे धीरे
खिलें बाग़ में दिखें और चुभ भी गएँ उनकी आँखों में
मलाल बस यह रहा रंग छोड़ न पाएँ उनके हाथों में 
जिंदगी जिंदगी का मतलब कुछ यों बताती है 
रात रात में जैसे और रात ढल सी जाती है ।
अप्रमेय

ऐसा संसार पाया

हमने जंगल में आग पाई
बची राख भी माथे से लगाई
हमने देहरी पर दीप जलाएँ
अपने हाथ जुड़े पाएँ
हमने ध्वनि में शब्द की चिंगारी पाई
शास्त्र के धुएं सुलगाए
धीरे धीरे समझा हमने
अपने भीतर की आग को
जिसके ताप से
हो सकती थी दुनिया
प्यार सी गुनगुनी
पर हमने उसे दबाया
जिसके एवज में
ऐसा संसार पाया ।
(अप्रमेय)

कुछ फुटकर शेर ३

दूर मैदानों में जुगनुओं सी चमकती हैं बस्तियां
दिल के अंधियारे से जैसे बोलती हो स्मृतियां ।।

कुछ बोलिए कि ढल न जाए सूरज 
रात किसी ठिकाने पर नहीं होती ।।


इन आँखों का क्या कहिए कोई भरोसा नहीं
अपनी आँखों से देख लिया उनकी आँखों से भी ।।


ये शाम भी कुछ इस तरह अलग पड़ी पड़ी
तुम होते ढलती रात पलकों पर मुंदी मुंदी ।।


कोई रास्ता बता दीजिए
या फिर उस तक पहुँचा दीजिए।।
ये क्या हुआ इस जगह पहुँच कर
कि ये मुक़ाम गिरा दीजिए।।


अप्रमेय

अपने होने में

रात जब जब आई 
ख़ामोशी लाई
फाड़ डाला उजालों ने
कान का पर्दा
जिंदगी ने दिया अपना अर्थ 
सवालों में
मैं सुनता रहा
बुनता रहा
राह पर चलता रहा
अपने होने में
अपने मिटने को
दिन ब दिन
गुदड़ी की तरह
बुनता रहा ।
(अप्रमेय)

साथ हुआ सो

मन का फूल
वन के फूल से 
मिल गया
साथ हुआ सो 
बिछड़ गया।।
(अप्रमेय)

उसी तरह

कोई शब्द
कुछ रंग
एक बात
जिसे कह न सका कभी
वह मैंने कहा 
रात के अंधरे में
पूछा अगली रात
कि जोड़ो कुछ सिलसिला
वह चुप था
उसी तरह
जैसे उसने सुना था
उसी तरह जैसे मैं उसे
सुनाने को आतुर था ।।
(अप्रमेय)

जिंदगी का कारोबार

रात कैसे पसर जाती है
देह के बाहर से धीरे धीरे
आत्मा के अंदर
यही कही यहीं से 
जाने कब से 
सिलसिले में गा रहे हैं
झींगुर सामवेदी गान,
जाने कौन सुनता है
झाड़ियों के बीच से इनको ,
तितलियाँ जाने किन घरौंदों में
चली जाती हैं वापस,
मैं देखना चाहता हूँ
जब जब गौर से इनको
कोई अनादि मीठी लोरी
मेरे कानो में गुनगुना जाता है
सतत जिंदगी का कारोबार
अपनी धार में चला जाता है ।।
(अप्रमेय )

कहीं दूर ले जाए

आह 
शब्द 
स्वर 
रूप
अपने में गहन
मुझे पहचाने
बार बार गले लगाए
कहीं दूर ले जाए ।।
(अप्रमेय)

मेरे हिस्से

मेरे हिस्से में जो है 
उसी का इंतजार है
या खुदा 
क्या यही तेरा चमत्कार है !
(अप्रमेय)

हम चले जाएंगे

हम चले जाएंगे एक दिन
जैसे चला गया वसंत
फूल झर गए,
जैसे चली गई बरसात
नदी-तालाब सूख गए,
मैं खोजता हूँ अपना हेतु
और जैसे के स्थान में
किसी का भी नाम नही रख पाता
पर मैं झर रहा हूँ
कि मैं सूख रहा हूँ
अपने अस्तित्व में
आत्म का नाम गढ़े
अपनी तड़प
सुन रहा हूँ |
(अप्रमेय)

छोटे फुटकर शेर

कोई मिल गया राह चलते यों ही 
मंज़िले ख़याल फिर बौना निकला ।।

वो उधर करते रहे इंतज़ार 
इधर मैं राह देखता रह गया ।।

और क़रीब और क़रीब और क़रीब आ जाओ
फ़ासलों के दरमियां सिर्फ बात बना करती हैं ।|


सुना तुमने वही जो तुम्हे बतानी थी
कह न सका वही जो तुम्हे सुनानी थी ।।



(अप्रमेय)

Monday, October 26, 2015

कोई कैसे कहे

कोई कैसे कहे कि क्या कहूँ उनसे
न कहना ज्यादे सुकून दे जाता है !!
(अप्रमेय)

खुदा भी बन सकते हैं

हम कर सकते हैं
कुछ इन चींटियों के लिए
हम पत्तों को काँटों से
हवा में छितिग्रस्त होते बचा सकते हैं,
रुके संडास के जल को ईंट हटा कर 
बहाव दे सकते हैं ,
हम सूखती दूब को
पानी की कुछ बून्द डाल कर
हरा रख सकते है
अगले बसंत के लिए
हम जुगनुओं को इतिहास से
गोरैया को घर के आँगन से
बूढ़ों की बीतती जिंदगी में
जवानी का साथ दे कर
थोड़ी और गहरी सांस भर सकते हैं
हम खुदा को याद करते
किसी न किसी का खुदा भी बन सकते हैं ।।
(अप्रमेय )

इतिहास !

रात है या गुलदस्ता....
याद !
जिंदगी है या मंच....
नाटक !
आदमी है या हथियार...
क़त्ल !
ईश्वर है या समाचार..
स्वप्न !
सवाल है या जवाब...
इतिहास !
(अप्रमेय)
ज़िंदगी से कर ली आँखे दो चार
मौत से इश्क लड़ाना चाहता हूँ
(अप्रमेय)

उतर आओ

उतर आओ सांझ सी मेरी रूह में
कि मैं अब डूब जाना चाहता हूँ ।।
(अप्रमेय)

स्वर मंगल

मैं लिख सकूँ
कोई गीत
तुम्हारे लिए
जिसमे छंद क्या,पद क्या,
स्वर क्या !
किसी की प्रतिबद्धता न हो,
तुम गाओ उसे
बिना किसी संकोच के
कि सुन सके तुम्हारा हृदय
कि डोल सके तुम्हारे
अंतस का जंगल,
कोई चिड़िया
कोई जुगनू
कोई भी पतंगा
बिना आहट के
मिला सके तुम्हारे गीत में
सृष्टि का स्वर मंगल
(अप्रमेय)

मैं खोजता रहा

मैं खोजता रहा 
अपना सहचर
बाद बहुत बाद में
खुला अर्थ
बंद मुट्ठी के खुल जाने जैसा,
मैं समझता रहा
प्यास सूखे गले को नम करती है
उधर खुली मुट्ठी ने जब पकड़ा हाथ
जाने का समय नजदीक था
इच्छा के दानव ने
घोटी मेरी सांस
सहचर का पुनः
छूट गया साथ ।
(अप्रमेय)
ये कौन ठहरा सा दिख गया था कभी
उसके पाने की ख्वाइश ने ठहरने न दिया।।
अप्रमेय

कोई सुबह सा शाम हो जाता है

कोई सुबह सा शाम हो जाता है
कोई धुआँ सा आग हो जाता है।
अपनी हस्ती को भी बिखरता देख
है कोई जो बाग़-बाग़ हो जाता है।
ज़िंदगी मिली तो सभी को इक ही मगर
हिस्से-हिस्से में कोई ख़ाक हो जाता है।
कोई कहा किसी ने सुन लिया
कुछ अनकहा राज हो जाता है।।
(अप्रमेय)

Friday, July 31, 2015

वह ब्याहता

वह ब्याहता
जो ला सकी
उसके बाप की कुल जमा-पूंजी थी
पैसे से ही नहीं
इज्जत की भी पगड़ी
जगह-जगह
सेठ,सुनार,मित्रों
और गुरुवों के चौखट पर
उसके बाप ने उतारी थी,
वह ब्याहता अपने होने का अर्थ
न ही माँ के आँचल में ढूंढ सकी
न ही बाप के कंधे पर,
धरती उसके विराम की नहीं
यात्रा की सड़क है
जिस पर ससुराल का रथ
दौड़ता है
कोई भी सवार हो सकता है
कोई सारथि  भी
वह पहियों  की कील  की तरह धुरी बन
काल को निहारती रहती है,
ब्याहता का
ससुराल और  मायका
गड़े बांस की तरह दो छोर हैं
जहाँ वह अपने होने को
अरगनी के मानिंद
बाँध देती है
 दोनों मुहाने कोई कपड़ा
गीला हो गन्दा हो
उसे अपने आँखों के गड़ही  में धोकर
टांगते हुए सुख देती है।
(अप्रमेय )

Wednesday, July 29, 2015

गरीब

गरीबों की झोंपड़ी
टट्टीयों से ढंकी जाती है
तुमने गुस्लखाने में
अपनी  विष्ठा के त्याग का
नाम 'टट्टी ' दिया,
कोई क्रान्ति इसके विरुद्ध
कभी छिड़ी; तुमने सुनी ?
ग़रीब बिना नुख़्ते के भी
गरीब लिखे जा सकते थें
लिखा नहीं गया,
जिन्होंने नुख़्ता नहीं लगाया
उन्हें शब्दों से गरीब समझा गया
शब्दों के दलालों को
आदि -अंत के बीच संबंधों से
क्या लेना -देना
वह तत्काल का मुँह देखते हैं
शब्दकोश की कचहरी में
जज के शब्द दुहराते हैं
इसी का पैसा पातें हैं
नई दुनिया में
किसी बड़े शहंशाह ने
गरीबों को मंत्र दिया है -
"गरीब पैदा होना गुनाह नहीं : गरीब होकर
मर जाना गुनाह है"
मैं चीख कर पूछता हूँ
अमीरों से
गुनाह क्या है ?
जरा इसको जोर से चिल्लाना।
(अप्रमेय)   

Wednesday, July 8, 2015

तुम

रेत पर बैठे पंछी
जैसे सागरों में डुबकी
लगा आतें हैं
वैसे न चाहते हुए भी
ताल-ताल घाट-घाट
तुम याद आते हो,
सालती है अंदर
बराबर ये बंजर भूमि
देखता हूँ कभी-कभी
कुछ फूल खिल आतें हैं,
राह कोई जब-जब न रहा
तुम तब-तब
खेत-खेत मेड़-मेड़
फुनग आते हो,
स्वांस-स्वांस जाती है आती है
कोई महक
ह्रदय के जंगल में
डाल-डाल तुम
लटक जाते हो

(अप्रमेय )

Monday, July 6, 2015

एक-क्षण, तत-क्षण

 बेला  गुलाब जूही चंपा चमेली
और भी जाने क्या-क्या
ये महज फूल नहीं
अस्तित्व प्रदत्त सनद हैं
तुम्हारे
कि तुम प्रेम कर सको ,
महज इनमे से गुलाब कभी
तय कर लें किसी सुबह
न खिलने का
तो सूर्य नहीं उगेगा पूरब से,
ये भरोसा नहीं दावा है
जिसे दुनिया का कोई ग्रन्थ, विज्ञान
झुठला नहीं सकेगा
मेरे रहने न रहने के बाद,
ये वचन सूर्य के लिए भी ढाल  बनेगा
और तुम सब के लिए
हौसले की उड़ान,
आजमाना  हो तो कभी आजमा लेना
सभी सांस भर न लेना एक-क्षण
मुरझा जाएंगे सभी फूल तत-क्षण
( अप्रमेय )