Powered By Blogger

Monday, March 10, 2014

कविता

मेरी नजर में कविता 
रोते हुए बच्चे को 
चुप कराने की विधि हो सकती है 
गर्मी में छाव 
दुल्हन के लिए श्रृंगार 
दुल्हे के लिए 
अपनी साथी का संकल्प 
हो सकती है ,
कविता पन्नो पर लिखी 
तुकबंदी नहीं 
बल्कि 
चिड़ियों की उड़ान 
चूहों का बिल खोदना 
घर में बिखरे अखबार को 
तह कर अलमीरा में रखना
परदेश जाते वक्त बड़ो का 
चरण छूना हो सकती है,
कविता महज 
पेड़ों को देखना हो सकती है 
गुलाब-बेला को छूते वक्त 
हातों का इत्मीनान हो सकती है,
कविता किसी बुजुर्ग के लिए 
खटिया बिछा देना 
उसका परखत माज देना 
रात और दिन में भी 
उसके बिस्तरे के पास 
लोटा भर के पानी रख देना हो सकती है 
और जब वह कुछ बोलें 
बिना जवाब दिए 
उनको सुनना हो सकती है,
कविता चाय बनाना 
खाने के बाद पानी पीना 
और दांत मांजने के बाद 
जिब्भी से जीभ छीलना हो सकती है,
आप जो भी तर्क दे कविता के लिए 
पर मेरी नजर में 
चुप-चाप हाथों में कलम लिए 
आकाश को निहारते 
कही गुम हो जाना भी 
कविता हो सकती है। 
(अप्रमेय )

Wednesday, February 26, 2014

हे भोले

हे भोले 
प्रार्थना का यह मेरा फूल 
स्वीकार करो 
इस धूप-बाती के साथ 
मेरे सारे अपराध 
माफ़ करो ,
शब्द,पाठ ,पद,गान 
मुझे नहीं मालूम 
मेरे अज्ञान के इस मंत्र को 
अंगीकार करो ,
हे भोले 
प्रार्थना का यह मेरा फूल 
स्वीकार करो,
दिन,दुपहर ,शाम ,रात
जो भटक चुका 
उसे याद करो 
अपने इस पागल बालक के 
सत्य पथ का 
निर्माण करो
हे भोले  
प्रार्थना का यह मेरा फूल 
स्वीकार करो 
सत्य,असत्य,धर्म,दर्शन 
जिन्हे चाहिए उन्हें दे दो 
मेरे करुण रुदन पर 
जरा ध्यान धरो 
गोदी में ले लो प्यार करो 
हे भोले 
प्रार्थना का यह मेरा फूल 
स्वीकार करो। 
(अप्रमेय )

Tuesday, February 25, 2014

क्या तुम एक शाम नहीं हो

जिंदगी  …
क्या तुम एक शाम नहीं हो 
खाली कुर्सी 
बंद बालकनी 
सीढ़ियों पर उतरती-चढ़ती 
चाल नहीं हो 
जिंदगी  …
क्या तुम एक शाम नहीं हो 
कॉल बेल सी चिपकी 
फ्यूज बल्ब सी लटकी 
छत पर अरगनी पे सूखती 
विश्वास नहीं हो 
जिंदगी ...
क्या तुम एक शाम नहीं हो 
टूटे पत्ते 
भागती टहनिया 
बाहर टोटी से झरती 
प्यास नहीं हो 
जिंदगी  … 
क्या तुम एक शाम नहीं हो 
बुझी अंगीठी 
औंधे पड़ी कढ़ाई 
डिब्बी में जो है तीली 
आग नहीं हो 
जिंदगी  … 
क्या तुम एक शाम नहीं हो। 

(अप्रमेय )

Sunday, February 23, 2014

काश

काश.… 
मैं तुम्हे बिठा पाता 
अपने शब्दों में 
तुम्हारे होठो को 
सुनहरे शब्दों में पिरोकर 
गुनगुनाता उनको गीतों में ,
काश.… 
मैं तुम्हे सुला पाता 
अपने पन्नो में 
शब्दों के देह में जो अब तक
न जाग सकी सार्थक आत्मा 
उसे जगाते जेब में रख कर 
घूम पाता वादियों में ,
काश..... 
मैं रंग पाता 
तुम्हारे गदराये हथेलिओं पर 
शब्दों की  मेंहदी
नहीं अभी नहीं हैं 
मेरे पास 
मेरे पास नहीं, किसी के पास 
तुम्हारे तरह जीवित शब्द 
इसलिए 
आओ मन बहलाते हैं 
एक गीत गातें हैं 
कोई गजल सुनाते हैं 
तुम्हे याद कर के 
काव्य लिख-लिख कर 
चलो अमर हो जाते हैं। 

(अप्रमेय )


,

Saturday, February 22, 2014

मेरे बच्चे

दिन भर सवाल पूछते हुए 
नींद के बरक्स 
तुम सो जाते हो 
हाथों में कोई टुटा हुआ औजार लिए,
सोते हुए तुम्हारे हाथ में यह औजार 
औजार नही कोई शस्त्र सा दीखते हैं ,
जिसे नींद में तुम 
शायद इसे कहीं 
हम सब से दूर ले जाते हो ,
तुम्हारे तकिये के नीचे से 
मुझे मेरे जूते के यह फीते 
निकालते वक्त 
भय लगता है,  
आदमी की सबसे बड़ी खोज 
रही होगी आग 
पर यह जूता 
और उसमे गुथा हुआ यह फीता 
आदमी की इस खोज से भी आगे   
कही निकल जाने की एक चाल है,
मुझे सम्भालना है 
जो तुमने छितरा दिए हैं 
यह सब पेंच 
यह आदमी के दिमाग से 
ढीले हो कर गिरे 
कारखानो की इजाद हैं ,
मेरे बच्चे 
तुम सो गए 
पर मेरा मन 
तुम्हारी पलकों को देख कर 
उदास है। 

(अप्रमेय ) 






Thursday, February 20, 2014

याद

याद को किस जगह उसने छुपा रखा है 
उदासी के इस दिए में ख़ुशी की बाती लगा रखा है। 

हम तो निकले थे चलने को उनके साथ-साथ 
जिंदगी तुमने मुझे यह कहाँ बिठा रखा है । 

दर्द जो ढक चुका है अब आंच बन के सीने में 
कहीं वह उड़ न जाय राख बन के आंधी में। 

मत पूछ सिकंदर से उसकी हार की वजह 
अपनी हार से उनकी जीत की मशाल जला रखा है। 

( अप्रमेय  )


Tuesday, February 18, 2014

मेरा बेटा

मेरा बेटा 
अक्सर मेरे कंधे पर 
बैठना चाहता है 
पूछता हूँ 
तो कहता है 
इस पर बैठ कर मैं 
आसमान के बराबर 
हो जाता हूँ। 
मैं उसे समझाना नही चाहता 
कि बराबरी 
आदमी का सपना है 
और फिर बड़ा या छोटा होना 
जीवन का सत्य। 
मेरा बेटा 
मेरे कंधे पर बैठा है 
वैसे ही जैसे 
सीने पर लिपटी है उदासी 
पीठ पर लदी है तकदीर 
सर पर अटकी सी है बदहवासी 
जीभ पर दुबक गयी है भूख 
और बहुत कुछ 
जिसे मैं उसे नही दिखाना चाहता ,
मैं अपने बेटे को 
जब चाहता हूँ उतार देता हूँ 
अपने कंधे से। 
मेरा बेटा अभी 
मेरे जूतों में अपने 
नन्हे पाँव डाले 
घर में टहल रहा है। 

(अप्रमेय )

बूढ़ा होता बाप

फरवरी की इस सुबह-सुबह
बेटे के ब्याह के सामान को
मजदूरों के साथ
दुमंजिला मकान पर चढ़ाते हुए
डबलबेड का पावा पकड़े
अदृश्य हाथों से
अपने जिम्मेदारियों  के पाँव पकड़ लेना चाहता है 
बूढ़ा होता बाप,
बूढ़ा होता बाप
बूढ़ा नही दिखना चाहता
बूढ़ा होना समाज में
सम्मानजनक है
पर बेटों के सामने आज भी
बूढ़ा बाप शरमाता है। 
उसके जाग जाने के पहले
वह पहुंचा देना चाहता है
सारा सामन
सीढ़ियों पर चढ़ते
लड़खड़ाते हुए कदम
को वह छुपा लेना चाहता है
वह चढ़ता है धीरे-धीरे
मजदूरों के साथ
मजबूर होता हुआ
मजदूर और मजबूर बाप के
पसीने के फर्क को समझता हुआ
वह पंहुचा देना चाहता है सबसे बाद में
बहू का श्रृंगारदान
बेटे के जागने के पहले
उसे उसके कमरे में रखकर
आँखों से आंसू नही बहे पसीने को
पोछ कर छिपाने से पहले
अपने अक्स पर ख़ुशी का
पूरा भरोसा
शीशे में देख लेना चाहता है वह बाप।

( अप्रमेय )

Sunday, February 16, 2014

यकीन मानिये :

यकीन मानिये
चिड़ियों की उड़ान में
मैंने देखा है उन्हें
वर्तुलाकार पद्धति से
रिक्तता को पूरा करते हुए,
गाय के चारा चबाने में
मैंने देखा है
एक वृत्त को बनते हुए ,
कुत्ता जब मुँह खोलता है
मैंने देखा है
उसके मुँह के अंदर
त्रिकोण का बिम्ब बनाते हुए,
हिरण दौड़ते नहीं
प्रश्नवाचक चिन्ह बनाते हैं
चीटियां रेंगती जो
नजर आतीं हैं दरअसल
वह अदृश्य शब्दों के ऊपर
लकीर खींचती जाती हैं,
यकीन मानिये
दिन का उजाला
जो हमें दीखता है
वह सादा पन्ना है
और रात उस पर
लिखी हुई गाढ़ी स्याही।

(अप्रमेय )


Monday, February 10, 2014

कुत्ता :

कुता सिर्फ रखवाली ही नही 
शब्दों को भी 
सार्थक करता है,
कीचड़, जिसे हम कभी भी 
फूल की तरह नही छुपाते 
अपने किताबों के बीच  
वह कुत्ता 
अपनी उस बौखलाये शरीर को  
लोटा कर 
गर्मी से निजात पाते हुए 
कीचड़ को 
शब्द ब्रह्म के अर्थ सा 
सार्थक कर देता है ,
घर जो हम बनाते हैं 
अन्दर कोने कभी 
नितांत अकेले नहीं रह पाते
हम नही तो क्या 
हमारे सामान वहाँ काल से भी भारी 
रखे जाते हैं ,
मैं पूछता हूँ 
कुत्ता कोने में कुछ रखता तो नहीं ?
वैसे बाहर हम कुछ रख नहीं पाते
जैसे क्रोध
प्रेम  
उदासी,
ठीक थोड़े बदले अर्थ में 
कुत्ता आप की चहारदीवारी के बाहर 
कोने में अपनी मौजूदगी 
अपने अंदर समेटे 
वहाँ बैठा रहता है ,
शाम को आप बैठ जाये कहीं 
देख सकते है आप कुत्ते को टहलता 
और फिर आप जान सकते हैं 
कुत्ता उदास हो जाता है 
शाम ढलते-ढलते 
और रात होते-होते 
भयाक्रांत 
हम विदा कर चुके होते है उसे अपने से 
और रात व हमें 

पुकारता रह जाता है। 

(अप्रमेय )

Saturday, February 8, 2014

आजाद मुल्क की मंडी में :

बासठ साल के इस
आजाद मुल्क की मंडी में
मेरा शरीर जनाना नही
जिसे मैं बेच सकूँ
कि मैं बेच सकूँ
अपना मर्दाना शरीर
इस मुल्क में
इसके सिवा
मेरे पास कुछ है भी नही ,
कौन खरीदेगा यह
पुराना शरीर
जिसका उपभोग
इस परम्परित समाज ने
पहले ही मेरे आत्मा की किताब पर
लगा कर एक धर्म का लेबल
बांच लिया है ,
बोलो कहाँ बेचू 
इस मुल्क में यह घिसी हुई किताब,
इस दर्द से अभी-अभी
जो उभर आया हैं यह गीत
इसकी कहाँ करू नुमाईश
कि बिक सके यह गीत
कि सड़को पर अब वो कहते हैं
बिकते नहीं ऐसे कोई गीत,
कि गीत हो मर्दानगी के
जिससे जल सके मशाल
कि गीत हो दीवानगी के
जिससे मिट सके दिलों के मलाल
कौन खरीदे मेरे यह गीत
जो पहले ही गा दिए गए
कि इस मुल्क की मंडी में
कहा जाए यह
आजाद तकदीर।

(अप्रमेय )

Thursday, February 6, 2014

गाँव और माँ :

गाँव शहर से दूर
माँ सी एक
इंतज़ार करती गोद है
जहाँ आप की तरक्की नही
आप का होना सिर्फ महत्वपूर्ण है।
गाँव शहर की सड़को से दूर
माँ सी एक
खलिहान है
जहाँ जिंदगी भागती नही
सुनती भी है और सुना भी जाती है
वह गीत जो मन के खेत में फैला है 
जिसे प्रेम से वह किनारे कहीं सरिया जाती है।
गाँव निश्चित ही शहर नहीं
माँ की तरह
तुम्हारी समझ से थोड़ी देहाती औरत है
जिसे जीने का सौर नहीं
बेटों को जिला पाने में ही
पूरी जिंदगी खपा जाती है।
गाँव शहर नही गाँव है
पूरी तरह माँ के गंध सी
कहीं बगीचे में पत्तो के बीच
छुप कर पक रहे आम सी
कुछ पकाती हुई
तुम्हारे लिए कुछ छुपा कर बनाती हुई,
मैं देख पाता हूँ माँ
गाँव और तुमको
पर हिम्मत नही जुटा पाता
तुम्हे शहर में बुला कर
शहराती बनाने की। 

(अप्रमेय )

Tuesday, February 4, 2014

चक्की

चक्की की लय पर
सरकता है मन का घूँघट
अंदर वहाँ खलिहान है
जहाँ उसने मन मुताबिक
चला दिया  मशीन ,
वहाँ नहीं करेगा कोई मोल-भाव 
वहाँ से नहीं जायेगा
बाहर उसके घर आटा,
वहाँ अंदर हाँ अंदर
उसका पति है
पर वह नहीं जो बाहर है
उसका समाज है
पर वह नहीं
जो छिटका है इधर-उधर
अंदर जिसे वह चाहती है
उसके लिए घूँघट घूँघट नहीं
एक शान है।
(अप्रमेय )

Monday, February 3, 2014

वसंत

सुबह उठते ही भागा मैं
खुले आसमान के नीचे
रात पता चला था मुझको
आने को है वसंत ,
कुछ देर देखा बादल को
पूछा मैंने उससे सवाल
सो कर अभी उठा था
दे न पाया वह जवाब ,
मैं जगाता अभी उसे
कि गुलाब मुझसे बोल पड़ा
पड गये चक्कर में तुम भी
कविताएँ लिखने को ,
मैंने कहा वसंत में तो
सभी कवि कविता लिखते हैं
पढ़ा है मैंने वसंत में
भौरे आकर तुम्हे गीत सुनाते हैं ,
सुन जवाब मेरा
गेंदा मुझसे बोल पड़ा
गौर करो उस पेड़ पर
जो सूख गया है
झाड़ ली सब पत्तियां उसने
चुप-चाप खड़ा रह गया है
अब जाता नही कोई पास उसके
वसंत हो या ग्रीष्म ऋतु ,
लिखना ही है, लिख देना उसपर
अब क्यों खड़ा है वह वहाँ ,
बादल भी अब जग गया
मुझे देख
एक गीत गाने लगा ,
हम सब की आँखों में
अब भी बची है कुछ नमी
तुम मनाओ वसंत
हम मनाएंगे फिर कभी।

(अप्रमेय ) 

Saturday, February 1, 2014

यह सब किसलिए

यह सब किसलिए
जहाँ देखते हो तुम
इतनी बेपरवाह दुनिया में
आदमी का बच्चा
दम तोड़ देता है रोटी के लिए
और तुम कि
रोटी के जुगाड़ के पीछे
अपनी तिजोरी भरे जा रहे हो ,
जहाँ सूखता ही है पसीना
समय के झुर्रियों के बीच
जहाँ पसीजती ही है जवानी
खटिया पर दम तोड़ते हुए
वहाँ अपनी कमीज की खिड़की से
एक बटन खोले
किसके लिये अपनी जवानी को
कुदा देना चाहते हो ,
यह सब किसके लिए !
जहाँ बदल दी जाती है बैल की तरह तुम्हारी मर्दानगी
जो जुतती नहीं हलों में
न ही देखी जाती है खींचती बैलगाड़ियों को ,
तुम मर्द के कौन सा बाय प्रोडक्ट हो
जो अपने बीवी बच्चो के साथ
बड़े-बड़े मॉलो में कुछ खरीदते
पीछे की जेब से पैसा निकलते
अपनी अकड़ का झंडा
स्वतंत्रता के जश्न सा फहराते हो ,
यह विमर्श किस लिए
जहाँ जबर्दस्ती द्रौपदी की तरह
राजभवन के अंदर नहीं उतारी जाती साड़ी 
एक षड्यंत्र के तहत
उन्हें मुक्त कर दिया गया है
लोकतंत्र की सड़को पर
फुटपाथ पर डाले नयी टाईल्स की
चमकती खूबसूरती की तरह ,
वहीँ तुमने वहीँ
उतार दिया स्वेच्छा से
परम्पराओं से जकड़े
दम घोटते अपने कपड़े ,
यह सब किस लिए !
अनायास
किसी बूढ़े की लाठी सा
कोने में खड़ियाये प्रश्न सा जो लगता है
अचानक दिख जाने पर
चाबुक की तरह
हमारी पीठ पर
सटाक से पड़ता है
तो हम दौड़ पड़ते हैं
अपने रथ में प्रश्नों को लादे
किसी दलदल की तरफ।

(अप्रमेय )

Friday, January 31, 2014

मैंने पढ़ रखा है


मैंने पढ़ रखा है किताबों में 
कि मुझे मुक्त होना है 
दुनिया से दुनिया में रहते हुए,  
मेरे जैसा आदमी इस पंचायत में 
सिर्फ जज का 
मेज पर पड़ा हथोड़ा है,
जो ठुकता है  
अपने सत्य को खंडित करता हुआ  
अपने ही विरुद्ध 
मैं डर जाता हूँ 
जी हाँ मैं निहायत 
डरपोक इंसान हूँ 
दुनिया में रहते हुए 
मुझे दुनिया से मुक्त होने की इच्छा है 
अपने शरीर को साबुन से रगड़ते 
साफ़ करते, आत्मा को झाँकने की तमन्ना है 
मकान के बेडरूम के साथ 
घर के कोने में 
मंदिर बनाने की मंशा है,
जी हाँ यह बातें निहायत असम्बद्ध लग सकती हैं 
उन बड़ी-बड़ी प्रार्थनाओं में 
या फिर दिख सकती हैं 
मामूली सी जयकारा लगाते हुए 
किसी बड़े धर्म रथ को खीचते हुए  
पर मुझे बूढी माँ के चश्मे के साथ 
पिता की लाठी के साथ 
बहनों के बच्चों के साथ 
और थोडा सा ज्यादे 
अपने बच्चों के साथ 
जलेबी खाते हुए 
उन अनाथ भगवान् के 
बच्चो की भी चिंता है। 
( अप्रमेय )

Tuesday, January 21, 2014

जिन्दा रहना है

उसे महज
जिन्दा रहना है
अपनी स्वांसों के खिलाफ
कपकपाये पैरों के
घुटनों के खिलाफ
उसे जिन्दा रहना है
जिन्दा रहने के खिलाफ
अपने ही पीठ को ढोते
छाती के हड्डियों में
घुसपैठ किये
ठण्ड के खिलाफ
अपनी ही आवाज़ के खिलाफ
जो भाषा के स्तर पर
इस अधेड़ उम्र में
गाली की तरह निकलती है
और कहीं से
ला नहीं पाती अनाज
वह जिन्दा है सुई की तरह
बीचो-बीच
भुत ,भविष्य की घडी में कसा
बीतता हुआ
बीतने के खिलाफ
वह महज
जिन्दा है
और इसीलिए
आज दो जून के बाद
उसे कभी कहीं से
मिल जाती है खुराक
जो उसे जिलाती रहती है
धूप से आती
अपनी ही परछाई के खिलाफ
मैं सोचता हूँ
मैं किस आर. टी. आई.
के दफ्तर में जाऊं
और इसके इल्जाम
का पता लगाऊं।

(अप्रमेय )






Thursday, January 16, 2014

ओवर-कोट

उसे इसकी फिक्र नहीं
कि वह जो उसने
पहना है ओवर-कोट
उसका यहाँ
इस वीरान रस्ते पर
जो शहर के पीछे
और नाली के बगल से
गुजरता है
कोई वास्ता नहीं बना पायेगा ,
महाशय ;
उसे कौन समझाए कि
जैसे कोट में
चिपके रहते हैं जेब
वैसे ही
कोट चिपके रहते हैं
बड़े-बड़े होटलों से ,
आप के स्वांसों की
लयबद्धता का गला घोटते
अचानक चिचियाते हुए
उसके पहिये
लोकतंत्र के तारकोल पर
रुकते हैं और
हवा-सिंघासन से उतर कर
लम्बी-लम्बी फरलांग लेते
घुस जातें हैं बंगलों में ,
महाशय ;
तुम्हे ठण्ड लगी
और तुमने
पता नहीं कहाँ से
पहन लिया यह कोट
उतार दो इसे
यह जचता ही नहीं
तुम्हारे इस गंदे शरीर पर ,
आदमी के तंत्र में
बने औजारों का
गरीबों से क्या लेन-देन ,
फर्क है आदमी-आदमी में
गरीब-गरीब में नहीं ,
तुम इस देश में
उनके अस्त्र-शस्त्र
भी नहीं हो सकते
जंगल के टूटे-सूखे हुए टहनियों
तुम्हे ओवर-कोट पहनने का
कोई अधिकार नहीं
(अप्रमेय )


उसे पता नहीं

उसे पता नहीं
शहर से दूर
अपने ह्रदय के अंदर
मैंने बसा ली है बस्ती
और जोड़ दिया  
हवाओं से उसकी स्वांस ,
मैंने खंडहरों में
जला दिया है दीप
और अपनी परछाई में
ढूँढ लिया है उसका साथ ,
उसे पता नहीं
सन्नाटों से
आती है उसकी आवाज
जिसमे मिला दिया है
मैंने अपने मन का राग ,
उजाले हर तरफ से
देखतें हैं मुझको
उसे पता नहीं
मैंने देख ली है उसकी आँख ,
उसे पता नहीं
धीरे-धीरे ठण्ड सी
आती उसकी लज्जा को
चिपका लिया है मैंने
स्वैटर के साथ
गर्मी में मुझे मालूम है
तुम झरोगी
मेरे माथे से
प्यास के साथ।
( अप्रमेय )

Friday, January 10, 2014

दे देना चाहता हूँ :

कुछ निकाल कर दे देना
चाहता हूँ तुमको
बहुत कुछ तो नहीं
पर थोड़ी नमी के साथ
अभी बची है गहराई
थोडा खुरदरा
बचा है सन्नाटा
थोडा सा दुबका लेकिन
हाँ अब भी बचा है प्यार,

कुछ निकाल कर
दे देना चाहता हूँ तुमको
बहुत कुछ तो नहीं
पर फिर भी
हताश ही सही
बची है उत्कंठा
आकाश को निहारने की
वीरान अनगढ़ जंगल की तरह
हाँ बे-हिसाब बची है तन्हाई ,

कुछ निकाल कर
दे देना चाहता हूँ तुमको
बहुत कुछ तो नहीं
थोड़ी बची है प्यास
पानी की तरह ठंडी
थोड़ी बची है याद
जीवन की तरह अनसुलझी
हा, अब भी बची है आस 
तुम्हे कुछ दे देने की। 

(अप्रमेय )

Wednesday, January 8, 2014

मेरा शहर :

मेरा शहर उदास दिखता है
जब मैं वहाँ नहीं रहता
वहाँ तब कोई नहीं जोड़ता
रास्ते पर थूके
पान की पीक का
लहू से गहरा सम्बन्ध ,
कोई नहीं दिखाता
आकाश से शहर में
उड़ाई हुई
ठहाकों और लफ्फाजों
की नयी क्रांति ,
जब मैं वहाँ नहीं रहता
उसे कोई बताता नहीं कि
शहर के रंगमंच पर
कोढ़ियों का रूप धरते
विज्ञान की लढ़िया को धकेलते
करम कर बाबू ऐ भइया .......
वही पुराना गीत गाते और
कितने घट गए भिखारी ,
जब मैं वहाँ नहीं रहता
तो उसे कोई नहीं समझाता
चौराहों के शक्ल में बदलती
और घटती वह गुमटियां
मेरा शहर उदास है
क्योंकि अब उसके
आँगन में नहीं फुदकती
गौरइया-चिड़िया

(अप्रमेय )

Tuesday, January 7, 2014

परदा और आदमी :

घर में टंगे परदे की तरह
कभी-कभी यूँ ही
बीत जाता है दिन ,
परदों का झूलता रहना
दुनिया में आदमी का
झूलते रहने की तरह है
और परदों पर बने सुन्दर फूल
आदमी के दिमाग में
चिपके सुन्दर सपनों की तरह हैं ,
मैं सोचता हूँ …
अगर ये सपने न होते
तो शायद ये परदे न होते ,
आदमी और परदे का रिश्ता
बहुत करीबी है
यह तब पता चलता है
जब कभी-कभी
यूँ ही बीत जाता है दिन ,
मसलन शांत कमरे में
लटका हुआ परदा
किसी बूढ़े की दाढ़ी सा दीखता है
और उसका टंगा रहना
आप को दुनिया में
टंगे रहने की खामोश हिदायत देता है ,
वैसे परदा मेरे ख्याल से
टंगा रहना चाहिए
हर खिड़की पर
ताकि आप देख न सकें बाहर
आज किसी को फुर्सत नहीं है
आप के घर के अंदर झाकनें में
सभी व्यस्त हैं कुछ ढकने में
अपने-अपने घर के
खिड़कियों पर परदा लगाने में।
( अप्रमेय )  

Friday, January 3, 2014

आदमी :

जो जान सका
वह यही कि
तुम बेहतर हो
जो तुम्हे नहीं चाटने पड़ते
जूठे पत्तल
और न ही खानी होती है लात
मेज के नीचे बैठ जाने पर,
मान ही नहीं
यह स्वीकार कर लिया
आदमी अपनी क्षमता से
रेंगता हुआ छिपकली है
कभी-कभी
दूसरे शहर में दुम दुबकाये
वह कूकुर है
जिसकी मंजिल पर दृष्टि नहीं
भागने में ही सृष्टि है ,
अद्भुत हैं तम्हारी आँखे
जो चील की तरह
चिपकी हैं तुम्हारे पास
तुरंत उड़ कर नोच ले आती हैं
कानून को ठेंगा दिखाते
गोरी-सांवली चमड़ियां,
तुम्हारे हाथ की लकीरे-लकीरे नहीं
भगवान् का दिया एक सर्टिफिकेट है
जिसे तुम जागते हुए ही नहीं
सोते हुए भी एक अनशन की तरह
इस सरकारी दुनिया में
इस्तमाल करना जानते हो
आओ हम-सब अपना सम्मान करे
एक दूसरे का गुणगान करे।
(अप्रमेय )








Tuesday, December 31, 2013

नए वर्ष ३१/१२/१३

तुम आना नए वर्ष
कुछ इस तरह
जैसे गाँव से अनाज लादे
बाबा चले आते हैं
कूवों पे कुछ फूल
यूँही निकल जाते हैं
जैसे नए चश्मे पर
माई के हाथ उसे पोछते
कम्बल से धीरे-धीरे
बाहर निकल आतें हैं ,
आना तुम कुछ तरह
जैसे दुल्हन के धीरे-धीरे
घूँघट उतर जाते हैं
बच्चों के धीरे-धीरे
दाँत निकल आतें हैं
आना कुछ इस तरह
जैसे धीरे-धीरे फल
पक के मीठे हो जाते हैं।
( अप्रमेय )
आप सभी को नए वर्ष की मंगल कामना
३१/१२/१३



Monday, December 30, 2013

पाती-२

उस दिन दस का नोट गिरा हुआ मिला था उसे। ठीक थोड़े दूर आगे बढ़ने पर एक बच्चा सड़क पर भीख माँगते उसके सामने आ गया। अभी वह तय नहीं कर पाया था की इन दस रुपयों का वह क्या करेगा पर शायद उस चौराहे और उस लड़के तथा जेब में पड़ा दस रुपये के नोट ने उसे तत्काल निर्णय लेने के लिए मजबूर किया। चाय पी लेने के बाद भी पाँच रुपये बचे थे उसके पास जिसे उसने टाल दिया था इस ख्याल के साथ की कल फिर मैं जब इस रास्ते से गुजरूंगा तो कुछ पैसा दे दूंगा। इनका काम ही है सड़कों पर भीख मांगना।पता नहीं क्यों पूरी रात उस भीख मांगने वाले लड़के का चेहरा उसकी आँखों के सामने घूमता रहा।दो दिन बीत जाने के बाद जब वह उस रास्ते से गुजर रहा था तो वह भिखारी बच्चा उसे नहीं दिखा।अगले दिन फिर वह नहीं दिखा। साल भर बीत जाने के बाद एक पागल बच्चे की लाश पर तमाम लोंग खड़े होकर कई तरह की बात कर रहे थे कि इसकी माँ दवा के अभाव में मर गयी। सुनते हैं की भीख मांग-मांग कर ये अपनी माँ की दवाइयाँ खरीदता था। माँ के मर जाने के बाद ये पागल हो गया और जरा इसका नसीब देखिये कि किसी पागल कुत्ते के काटने के कारण इसकी आज इतनी दर्दनाक मौत हो गयी। उसके लाश की जेब से कुछ चमकती हुई दवाईंयों का टुकड़ा लोंगो से अपनी आँख को चुराता आकाश से कुछ बातें कर लेना चाह रहा था।
( अप्रमेय )


Sunday, December 29, 2013

उदासी :

अब खिड़कियों से
नहीं झांकती उदासी
चमकती है कौवों के बीच से
छत के ऊपर ,
अब बिस्तर पर
लिपटी नहीं रहती उदासी
टंगी रहती है चौराहों पर
सिग्नल के अंदर ,
उदासी अब बांची नहीं जाती
और न ही रखी जाती है जेब में
वह फहरती है झंडा गाड़े
मेरे देश के धरती के ऊपर।
(अप्रमेय ) 

Friday, December 27, 2013

पाती-१

प्रभु उस रात मैं चुप-चाप वहाँ से चला आया था। मुझे तो सिर्फ अपने वादे के मुताबिक वह फूल चढ़ाना था जिसे बहुत शिद्दत के बाद एक सार्वजनिक स्थल पर कविता पाठ करते हुए मैंने पाया था। सेठ का परिवार उस मंदिर में मुझे नहीं जानता था पर उस पुजारी ने भी तो मुझे घुसने नहीं दिया। उसी ने  तो कहा था यह एक सिद्ध मंदिर है जो मांगोगे मिल जाएगा। अवसर तो मिल गया पर उसका प्रमाण तो मेरे पास ही रह गया। मैं चुप-चाप सो गया उस रात पर वह गुलाब का फूल सुबह तक मुरझा गया था।
(अप्रमेय)


Thursday, December 26, 2013

चहारदिवारी के अंदर :

चहारदिवारी के अंदर
आँखे बदलती रहती हैं हर-पल
बार-बार
झाँकती-चौंकती हैं
उजाले को चीरती
परछाई को देखकर
हवा बहती है तो लगता है
आ गया कोई बसंत लेकर
चहारदिवारी के अंदर ....
कान सुनना चाहता है
खटखटाने की आवाज़
मन फिर अटक गया
सिटकनी के पास
मेरे घाटी के ऊपर।

(अप्रमेय )

Monday, December 23, 2013

आज-कल राजनीति :

यह जो हाथ पकड़ा है उसने आप का
रकीब बन गया हजारों दिले कुर्बान का

यकायक बुलंदियों पर दीप जब जल पड़े
परवानों के भीड़ में वह गुम गया चुप-चाप सा।

शमा जली है जो क्या फिर वह बुझ जायेगी
तमाशा जिंदगी है ख़ामोशी फिर सबब बन जायेगी। 

जिंदगी शामो-सहर यह जमाने से जो ढलती रही
इस रीत की टीस आँखों में क्या फिर डबडबाएगी।

वह कौन चुप है दो टूक कभी कुछ कहता नहीं
यह बात इस जहाँ में क्या फिर सूली पर लटक जायेगी।

(अप्रमेय )




Sunday, December 22, 2013

नया वर्ष

तुम्हे मनाना है यदि नया वर्ष
तो तुम्हे भुलाना पड़ेगा 
पिता की आँखों पर
लगा हुआ मोटा चश्मा
माँ के चहरे पर
सिमटी हुई झुर्रिया
तुम्हे भुलाना होगा
आँगन के फूटे पत्थर
टप-टप गिरता
बाथरूम के टोटी का बूंदयोग,
तुम्हे मनाना है यदि नया वर्ष
तो तुम्हे बचाना ही होगा
अपना जेब-खर्च
रास्तो पर थरथराये
माँगते हाथो में उनकी किस्मत
का बनना होगा मूक दर्शक,
तुम्हे मनाना है यदि नया वर्ष
तो तुम्हे खींचनी ही पड़ेंगी
भविष्य की चोटी और 
अतीत की खाई
वह कौन थें जिन्हे तुम
पकड़ न सकें गिरते वक्त
और वह कौन होंगे
जिनकी कमीज पकड़ कर
तुम चढ़ोगे ऊपर ,
इसके बावजूद
न भूलते हुए भी
यदि तुम मनाने चले हो नया वर्ष
तो मेरी तरफ से तुमको
बधाई।
( अप्रमेय )



Saturday, December 21, 2013

शहर और गाँव के बीच :

शहर और गाँव के बीच
के फासलों को जोड़ती  हैं
वह क्वामा सदृश्य बस्तियां
जिनका अस्तित्व
वाक्यों के बीच
पन्नो के ऊपर
लेखकों के मन से
कुछ अनमनी सी टंकित
हो कर छुप कर
उठाती रहती हैं
महाकाव्यों के भारी-भारी शब्द ,
भाषा में जैसे
आ ही जाते हैं
कुछ विदेशी शब्द
उसी तरह
हमारे भाव संसार को
चमत्कृत करती स्वांस लेती
ठेंगा दिखती यह रेलगाड़ी
जब कहीं यूँही रुक पड़ती है
गोधूलि बेला में
खेतों और बस्तियों के बीच
तब सपाट किसी
संत की सफ़ेद दाढ़ी की तरह
फैले मैदान
आप को लोटा ही देते हैं
हाथ जोड़े या फिर
झरा ही देते हैं
पतझर की तरह
आप के मन के फूल ,
गाँव अपने आप में
और आप अपने पास
एक गुमसुम सा संवाद
उड़ाते हैं हवन के धुएँ की तरह
और रेलगाड़ी निकल पड़ती है
शहर की तरफ ,
आप को उतर जाना है
शहर में
तारकोल की तरह
पसर जाना है शहर में।
( अप्रमेय )






Thursday, December 19, 2013

बचा रह जाता है

कितनी अजीब है यह जिंदगी
सबको पकड़ा ही देती है
हाथो में कोई न कोई झुनझुना।
गवैये को दे देती है
एक बचा हुआ तान
रोज रगड़ने के लिए।
मास्टर को दे देती है एक पाठ
जो बची रह जाती है
क्लास ख़त्म होने के बाद।
जेब कतरे के दिमाग में
बची रह जाती है
भीड़ से निकलती सेठ की मोटी जेब।
भिखारी का हमेशा
बचा रह जाता है
सिक्को से कटोरा।
बच्चे को उढाने के बाद भी
बचा ही रह जाता हैं
माँ का आँचल।
बचा ही रह जाता है
प्रेमी-प्रेमिकाओं का संवाद।
कवियों की
बची ही रह जाती है उत्कंठा।
मैं पूछता हूँ आप सब से
ये झुनझुना है या कोई खिलौना ?

(अप्रमेय)

Monday, October 28, 2013

परमात्मा स्टेशन की तरह है

परमात्मा स्टेशन की तरह है 
विशेष अर्थों में 
वियोग के साथ, 
घट जाने में आलोकित 
आप के बगल 
स्थिर ट्रेन के रेंगने से
अपनी ट्रेन को घिसकते
महसूसना,
खड़ा स्टेशन ही
पकड़ता है आप को
या रोकता है
लाल बत्ती की तरह,
स्मृति और निरंतर
के बीच
हर जगह
हर मोड़
स्टालो पर लटका हुआ
कहीं जाने के पहले
सीटी बजाता हुआ
वह पसरा है
हर जगह,
हमें ट्रेन में
नहीं फुलाना है तकिया
उसके हाथ पर ही
सर रख कर
सो जाना है


(अप्रमेय)




Sunday, October 27, 2013

नंबर प्लेट वाला रिक्शा

जाने कहाँ से
किस गाड़ी का
लगा था नंबर प्लेट
बैरिंग के पास
टंगा हुआ,
उसका रिक्शा भारत के
रंग-बिरंगे नक़्शे जैसा
चस्पा था फुटपाथ के उपर,
गाँव से शहर आई
उन औरतों की लिपस्टिक जैसा
लाल गद्दी सी सीट
तैयार थी उस दिन खड़ी
धकियाने के लिए
शहर की भीड़,
पहियों पर झालर लटके
नयी दुल्हन की नथुनी की तरह
हुड सा घूघट चढ़ाए
उर्दू के सारे अदब को
वह खड़ा पेश कर रहा था,
दोनों हैंडिलों के बीच डोलची में
रेडियो बजते-सुनते
वह पड़ा था
रिक्शे के उपर
भारत के संतों के
पेट की तरह पसरा
मुझे जाना ही पड़ा उसके पास
पर मैं उसे जगा न सका
वह शांत पड़ा था
भगत सिंह की तरह
सूली सा
अपने रिक्शे पर लटका।

( अप्रमेय )






Thursday, October 24, 2013

चाय बेचता आदमी

ठेले पर चाय पकाता
चाय बेचता आदमी
आदमी-औरत के भेद को
लात मार कर
चाय पकाता आदमी'
पतुरियों की तरह
ग्राहकों की आव-भगत
करता-बुलाता
चाय बेचता आदमी
चाय पकाते आदमी की
मूछे कभी न मिलेंगी
सिपाही की तरह खड़ी-तनी
अपनी मर्दांगनी को उबालता
कप में ढाल कर पिला देता
चाय बेचता आदमी
पतीले को घिसते-माजते
अपनी शर्म को ट्रे में सजाकर
ग्राहकों के सामने
ले जाता है
चाय बेचता आदमी
हर रात अपनी इज्जत को
फुटपाथ पर लुटाकर
गालियों से थैला भर-भर
अपने बीवी-बच्चो के सामने
उसे परोस देता
रात को घर लौट कर आया हुआ
चाय बेच कर आदमी।

(अप्रमेय-दिल्ली विश्वविद्यालय के पास )

Sunday, October 20, 2013

बेलवहीँ

उम्र बिताया
सामने वहां
दिख पड़ता है कुआँ
जिसके मुखाने अगल-बगल
उगी रहती है छुई-मुई,
सबकी आस्था बटोरे
धूप-छाँव ,बरसात
और आसमान को ताकते
बराबर चौकी लगाये
तगद के पेड़ के नीचे
पहरा देते रहते हैं
वहां बरम-बाबा,
कोई भी जाये
वहां से खाली हाथ नहीं लौटता
नौजवान हो तो छिम्मी
औरत हो तो अमरुद
बूढ़े हो तो बेल
बच्चा हो तो कहीं न कहीं से
निकल ही जाता है
उसके लिए
कोई न कोई लरिकासन,
अजब खुटियाये बाल
सर्दियों में पैरों में झुलसे
वहां जीवित रहने की
कथा सुना जाते हैं,
रह-रह कर उठती बैठती सी
घुल ही जाती है
वहां कोई सोंधी महक,
सुनाई पड़ ही जाता है
वहां गोधरी बेला में
झिगरों का सामगान
जिसे ताल देती रहती है
आंटे की पुक-पुक मशीन,
वहां जीवित हैं
दिल के ताखे पर
भोग लगाये-बिठाये
ठाकुर बाबा,
ओसारे वहां कभी खाली
नहीं पड़ा रहता बिड़वा
और इन सब के बावजूद
मैं कहीं भी रहूँ
मेरे ह्रदय में
जलती रहती है
इतने बल्बों के बीच
बुढ़िया के मड़ई की
वह ढेबरी
जी है यही है
मेरा प्यारा गाँव
बेलवहीँ
(अप्रमेय )  









Friday, October 11, 2013

चिड़िया

तुम दृश्य हुए 
सुबह 
अपनी आवाज के पास 
मेरे ह्रदय के बाहर
मंगल गान करते- चहचहाते
फुदक ही आये
खिड़की से
पर्दों को हटाते अन्दर
ऐसे में
तुम्हारे साथ
हो लेने चाहती है आत्मा
यहाँ भी और वहां भी
निकल जाने के लिये
रात भर डूबती हुई
इस जल-लीला से ,
स्मृति शेष
बची ही है कहीं
किसी संघर्ष से विचलित
अतिरेक एकांत में,
धैर्य स्वांस लेता है
फुदकने की ताकत
बटोरते हुए।
उड़ना ही है
उड़ना पड़ेगा ही
तुम अपनी कहानी न लिखो
फिर भी
अपनी उड़ान में
तुम लिख ही जाओगे
अपनी कहानी।
(अप्रमेय)



Tuesday, October 8, 2013

नैनीताल


आतें हैं जाते हैं
इन पहाड़ो को देख
क्या वे कभी समझ पाते हैं
यह जो ताल है
पहाड़ो के बीच 

संकेत देते हैं तुम्हे
तुम ऐसे बनो जैसे
बाहर से कठोर और
अन्दर से तरल,
सदियों से खड़े पहाड़
पेड़ पौधे और झाड़
चिड़ियों को उड़ते देखते हैं
वह जो घुघुती
कभी बैठी थी
देवदारू की डाल पर
और उड़ चली थी
कहीं सुस्ता कर
क्या दी थी इजाजत
उस डाल ने उसे वहां बैठने की,
तुम आये हो यहाँ
बिना इनसे आज्ञा लिए
सहज ही समेट लिया है
यह नमी और सतरंगी मौसम,
सुनो ... यह तुम्हे कुछ
बता रहे हैं कि
तुम भी बन सकते हो इसी तरह
बिना फिक्र किए
बैठा सकते हो कोई बुलबुल
अपने ह्रदय में
और अगर यह सब
न हो सके
तो ख़ामोशी से
बस में बैठ कर
घर जाते वक्त
मेरे बारे में सॊच सकते हो
(अप्रमेय)


थोड़ी-थोड़ी


थोड़ी-थोड़ी बटती
ही चली गयी जिंदगी
रिक्शा खोजने के साथ
बटुए से पैसा निकलने के साथ
उतरते हुए गाड़ी से
बच कर रास्ते पार करने के साथ,
थोड़ी-थोड़ी बटती
ही चली गयी जिंदगी
मोल-भाव करते
आलू-प्याज के साथ
किनारे दूकान पर सजी
गरम-गरम-जलेबी के साथ,
बटती ही चली गयी जिंदगी
सुबह से शाम तक
उठने के साथ
बच्चों की गेंद खोजने के साथ
ट्रेन की टिकट खरीदते
काउंटर के साथ
गुम सी हुई कोई कविता
आकाश में निहारने के साथ
जी हाँ
बटती ही चली गयी जिंदगी
अपने को बटते हुए
देखने के साथ।
(अप्रमेय)

Friday, October 4, 2013

छोटी कविताएँ


  १

वह भी था जरुरी
यह भी है जरुरी
कभी था जो दर्द-दर्द बन के
आज है धुआं-धुआं
चेहरा अब यह किसका-किसका ?
आँखों में है बसा-बसा।

          २
कल भी और आज
उम्मीद और इंतजार
बैठे-बैठे नींद
यह- आदत
अब पुरानी हो गयी।
         ३
एक छोटी सी जिंदगी
जिसमें आदमी
समेटता है
अतीत
बोता है
बीज
मुझे अक्सर
अब जिंदगी से घबराहट होती है।
        ४
कल बोला उसने
जो कुछ भी अब
गौरतलब है
मरम्मत-तलब है।
        ५
जो नहीं लिख सका
केवल वही कविता
तुम्हारे लिए थी।

(अप्रमेय )